ताना बाना

मन की उधेड़बुन से उभरे विचारों को जब शब्द मिले

तो कुछ सिलवटें खुल गईं और कविता में ढल गईं

और जब शब्दों से भी मन भटका

तो रेखाएं उभरीं और

रेखांकन में ढल गईं...

इन्हीं दोनों की जुगलबन्दी से बना है ये

ताना- बाना

यहां मैं और मेरा समय

साथ-साथ बहते हैं

सोमवार, 27 जुलाई 2020

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 11 (अंतिम) रश्मि प्रभा

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 11 (अंतिम) 


 ताना-बाना
उषा किरण 
शिवना प्रकाशन 
















कितना कुछ हम मुट्ठी में भरकर चलते हैं, कितना कुछ रेत की तरह फिसल जाता है । मुड़कर बहुत से कणों को फिर से सहेजने का दिल करता है, जो अपने थे, जीने की वजह थे, जिनसे बचपन और युवा मन के तार जुड़े थे ।
दिन,महीने,सालों का क्या है, बीत ही जाते हैं, लेकिन कोई कोई लम्हा रह जाता है, कोई चाह ठिठक जाती है ।
"आशीष के,दुआओं के
धागों से बुनी
....
बाँध देती हूँ मैं भी,
राखी अब !
अपनी कलाई बढ़ाओ तो
भैया"
प्रत्यक्ष शून्य ही सही, पर सच है कि कुछ भी कभी शून्य नहीं हुआ । एक का रहना,दूसरे को रोक ही लेता है ...

"सुन लो-
जब तक कोई
आवाज़ देता है !'
एक हँसी,एक सुकून,एक बेफिक्री चेहरे पर टांक लेने से बेचैनी,घबराहट,उदासीनता की सच्चाई खत्म नहीं होती,
"कई मुखौटे बदलता है आदमी
परंतु कहाँ बदलती है फ़ितरत!!!"
अनकही रह जाये ज़िन्दगी तो ख़ुद से बातें करने लगता है आदमी, एकांत से निकलकर वही बातें जब सबके बीच आ जाएं, तो जितने लोग,उतनी समझ ! शब्द सोंधे होते हैं,शब्द नाज़ुक स्पर्श होते हैं तो शब्द विषैले भी होते हैं, चयन बहुत ज़रूरी है । कई बार तो विषहीन शब्द भी अनर्थ कर जाते हैं ...
"मैंने सोचा था-
मेरे बोलों की तपिश से
पिघल जाएगी सालों की
अनबोले शब्दों की बर्फीली चट्टान
पर .....
कभी भी पीछा छोड़ते नहीं,
रक्तबीज जैसे उपजे
ये कहे-अनकहे शब्द ...।"
व्यक्ति हो या व्यक्ति की परछाईं, एहसास हों या एहसासों की परछाईं ... एक न एक दिन थकान होती ही है ।
"धीरे-धीरे चुकती साँसों की डोर
खींच-तान कर जबरदस्ती
कोशिश कर रही थी बुनने की
ताना-बाना,"
बुना भी, पर अब भी संशय है - हूबहू बुन पाई या नहीं !
"ऐसा क्यों लगता है
जैसे-
भीतर का घट
कुछ रीत गया है
कुछ छूट गया है !"
कभी यादें मन के दरवाजे पिटती हैं, कभी सपने उलाहने देते हैं,
"तुम्हारी आवाज़ मेरे कानों में
बहुत पास गुनगुनाती है
पर तुम ...
कहीं नज़र नहीं आते
या शायद
हर कहीं नज़र आते हो ...!"
फिर भी, रिश्ते बोनसाई हो चले हैं, बरगद बौना हो गया है, उफ्फ- फिर भी, सौंदर्य की तलाश में भटकते आदमी ने एक छोटे से हिस्से में चाहतों के बीज लगा दिए हैं ।
तभी तो,
"जब सारी कायनात
काली चादर ओढ़
सो जाती है
तब-
जुगनुओं को
हाथों में लेकर,
खुद को साथ लिए
निकलती हूँ हर रोज़..."
यही तो है जिजीविषा .....
इसी इच्छा के आगे फंदे डाले जाते हैं, प्रतीक्षित आँखों से बुना जाता है ताना-बाना, कुछ अपने लिए, कुछ औरों के मौन के लिए ...जो कहता है जीवन की हर क्यारियों से,
"ऐ दोस्त
अबके जब आना न
तो ले आना हाथों में
थोड़ा सा बचपन
. . .
बो देंगे मिलकर
...
छू लेंगे भीगे आकाश को"
और नाप लेंगे एक दूसरे की कद, .... क्योंकि, यह संग्रह मात्र जिये गए शब्दों की पुनरावृति नहीं, एक गुज़ारिश है लंबे रास्तों पर साथ चलने की, बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण में यशोधरा होने की ।
समापन नहीं -
अल्प विराम है यह
अगली यात्रा के लिए,
कुछ तुम बुनना
कुछ हम बुनेंगे
एक-दूसरे का दर्द बांटकर
मुस्कान का ताना-बाना
रंगों से भरकर फिर लाएंगे .... आमीन ।

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2 टिप्‍पणियां:

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