रविवार, 22 अगस्त 2021

अपनी- अपनी लड़ाई

 





दो बच्चे मेरे और दोनों जैसे उत्तरी घ्रुव और दक्षिणी ध्रुव।


बेटी नर्सरी में थी तो प्राय: आनन्दिता की सताई हुई बिसूरती हुई घर आती।

-आज आनन्दिता ने थप्पड़ मारा।

-आज  आनन्दिता ने नोचा।

-आज  आनन्दिता ने पेंसिल छीन ली।

-आज  आनन्दिता ने टिफिन खा लिया ।


मेरा दिल डूब-डूब जाता अपनी मासूम राजकुमारी के आँसुओं में। मैं कहती कि उसकी शिकायत मैम से कर दिया करो। पर वो कहती कि-

-मम्मी उसे कोई कुछ नहीं कह सकता मैम भी नहीं, क्योंकि उसकी दादी का ही तो स्कूल है और दादी ही तो प्रिंसिपल हैं। वो सभी बच्चों को मारती है।


वो बेहद मासूमियत से हाथ नचा कर कहती।

मुझे बहुत ही गुस्सा आता कि ये क्या बात है ? बच्ची की शिक्षा की शुरुआत ही एक गलत व्यवस्था और अन्याय सहने से हो रही है।


मैं बेहद टेंशन में आ गई। कई बार स्कूल में जाकर टीचर को शिकायत भी की, परन्तु वो आँखें फैला बेचारगी से एक ही बात दोहरातीं कि,

-क्या करें वो तो प्रिंसिपल की पोती है…!


खैर फिर नर्सरी के बाद एल के जी में दोनों का दूसरे  स्कूल में एडमिशन हुआ।दोनों एक ही रिक्शे से जाती थीं।परन्तु उसकी हाथ चलाने की इतनी आदत थी कि वो रिक्शे में भी दादागिरी करती। सब बच्चों को चाँटे मारती रहती थी। 


एक दिन फिर  बेटी रोते हुए घर आई, क्योंकि गेम्स पीरियड के बाद उसका नया ब्लेजर छीन कर आनन्दिता ने अपना पुराना ब्लेजर उसे दे दिया था। उसने काफी कहा पर वो कहती रही ये ही मेरा है।


यूँ तो मैं रोज रात को सोने से पहले उसे कहानियों में लपेट कर दया, अहिंसा,करुणा, क्षमा, सहनशीलता, देशभक्ति, भगवान पर आस्था, जैसे मानवीय मूल्यों की घुट्टी पिलाती थी, लेकिन मैंने उस दिन उसको बैठा कर वो समझाया जो मैं बिल्कुल नहीं चाहती थी।मैंने सख्ती से कहा -

-तुम पिटती क्यों रहती हो, तुम्हारे हाथ नहीं हैं क्या? तुम भी मारो उसको पलट कर। और एक हाथ पकड़ कर दूसरे गाल पर लगाना थप्पड़ जोर से। यदि कोई कुछ कहे तो कह देना ये रोज मारती है इसीलिए मारा।डरना मत कोई कुछ कहेगा तो मैं देख लूँगी।


खूब सिखा- पढ़ा कर भेजा। चाह तो यही रही थी कि मैं ही जाकर मसला निबटाऊँ, लेकिन मुझे खुद अपनी जॉब पर जाना होता था। फिर लगा कि मैं कहाँ तक इसको सपोर्ट करूँगी, कब तक दुनिया से बचाऊँगी आखिर में तो इसे अपनी लड़ाई अपने शस्त्रों से खुद ही लड़नी होगी।


दूसरे दिन वो बहुत खुश कूदती- फाँदती आई,

-मम्मा ले आई अपना कोट।पता है आज जब उसने मारा तो मैंने उसका हाथ पकड़ कर जोर से चाँटा मारा और कहा मेरे हाथ नहीं हैं क्या ? तुम मारोगी तो मैं भी मारूँगी।मम्मी वो एकदम से डर गई। फिर मैंने उसके पापा से भी कहा कि अंकल ये मुझे रोज मारती है और मेरा कोट नहीं दे रही जबकि अन्दर मेरा नाम लिखा है आप देख लीजिए। पता है मम्मी फिर उसके पापा ने उसको डाँटा और एक चाँटा भी मारा और कहा सॉरी बोलो उसे और कोट वापिस करो ...मम्मी बड़ा मजा आया आज!”


मन कुछ कुड़बुड़ाया -गलत शिक्षा नही दे रही हो तुम बच्ची को ? हिंसक होना सिखा रही हो ...तुमको तो ये कहना था न कि, कोई एक चाँटा मारे तो बेटा दूसरा गाल भी आगे कर दो। दुर् कह कर मैंने घुड़की दी और राहत की साँस ली।


वैसे बाद में वे दोनों बहुत अच्छी दोस्त बनीं, आज भी हैं।


उस दिन मेरी बेटी ने मुझसे बेदर्द , असभ्य , अधिकारों का हनन करने वाले समाज के बीच सर्वाइव करने का पहला पाठ पढ़ा। और जाना कि  आप कितनी भी मजबूत या कमजोर जमीन पर क्यों न  खड़े हों लेकिन अपनी लड़ाई आपको  अपने हौसलों से खुद तो लड़नी ही पड़ेगी। बिना लड़े जीत  कोई दूसरा आपको तश्तरी में रख कर भेंट नहीं कर सकता ।


फिर उसके बाद जिंदगी में वो कभी भी, किसी से भी नहीं पिटी।

                                                —उषा किरण 

19 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 22 अगस्त 2021 शाम 3.00 बजे साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. रवीन्द्र जी चर्चामंच के लिए मेरी रचना का चयन करने के लिए आपका हृदय से आभार 🙏

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. यशोदा जी मेरी रचना का चयन करने के लिए आपका हृदय से आभार 🙏

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  5. बहुत सुन्दर एवं सटीक... सच कहा कभी कभी हमारे आदर्श ही हमें सही और गलत में पहचानने में मुश्किल खड़ी कल देते है..समयानुसार समयानुकूल व्यवहार करना ही चाहिए।

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  6. सशक्त माँ की जैसी ही बेटियाँ भी बन जाती हैं । सुन्दर रचना ।

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    1. और कई बार बच्चों के कारण ही माँ सशक्त बन जाती हैं…बहुत शुक्रिया

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  7. बहुत सुंदर और सराहनीय सृजन।

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  8. बहुत सुन्दर और सार्थक सृजन , इंसान को सदा वक्त की नब्ज को पढ़ना चाहिए और फिर तदनुरूप क्रियान्वन करने की कोशिश होनी चाहिए। राधे राधे।

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  9. बहुत ज्ञसीख देता संस्मरण, अहिंसा का पाठ एक सीमा तक ठीक है उसे कमजोरी न बनने दिया जाय ,और जीवन की उबड़-खाबड़ राहों पर संभलना आना अनिवार्य है।
    बहुत सुंदर।

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