गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

चाह



मत देना मुझे

कभी  भी 

इतनी ऊँचाई 

कि गुरुर में  गर्दन

अकड़ जाए 

और सुरुर में भाल

झुके न कहीं,

नाक उठा दिखाऊँ 

हरेक को 

उंगली की सीध में

बस अपने ही फलक 


हरेक बात के मायने 

अपनी ही 

डिक्शनरी में तलाशूं,

हरेक का कद 

खुद से बौना लगे

हरेक ऊँचाइयों को

खुद से ही मापने लगूँ


दिखे न मुझे कोई बड़ा 

अपने सिवा,

सबका खुदा 

खुद को ही मान

मैं  खुद को  ही सजदे

करने लगूँ...

नहीं ! मत देना मुझे 

इतनी ऊँचाई


ऊँचे पर्बत से 

जहाँ गिरता हो झरना

उसी अतल गहराई में 

नदिया के किनारे

बना देना मुझे 

बस एक अदने से 

पौधे पर अधखिला

इक नन्हा सा  जंगली फूल....!!


                    — उषा किरण 🍁🍃🌷


चित्र; Pinterest से साभार

बुधवार, 16 दिसंबर 2020

" तुम कौन “




दूर हटो तुम सब

यदि नहीं भाता ,

मेरा तरीका तुमको

मत सिखाओ मुझे

ये करो

ये न करो

ऐसे बोलो

ऐसा न बोलो

वहाँ जाओ

यहाँ मत जाओ

ये देखो

वो मत देखो

इससे बोलो

उससे मत बोलो

ये खाओ

वो न खाओ

ये लिखो

ये न लिखो

शऊर नहीं 

ये क्या बेहूदगी

उम्र का लिहाज़ नहीं 

बड़ी उड़ रहीं 

बड़ी बन रहीं 

जाने क्या गम हैं

जाने किस ख़ुशी में 

उड़ी जा रहीं

बाल तो देखो

झुर्री आ गईं 

बुद्धि न आई....

हाँ तो नहीं आई 

क्या करें तो ?

ये मेरी जिंदगी 

तुम कौन ?

सबकी पुड़िया बना 

रखो न अपनी जेब में

और हटो एक तरफ

आने दो जरा

कुछ ताजी हवा 

कुछ खुशबू

सतरंगी किरणें

कुछ उजास

भरने दो लम्बी साँस

चन्द दिन

कुछ पंख,

ओस से भीगे  

ये जो हैं न 

मेरी मुट्ठी में

जी लेने दो मुझे

अब उन्मुक्त....!!

                —उषा किरण

मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

जेब



दो गज कपड़ा लेकर

सिलवा लेना 

बहुत सी जेबें 

भर लेना उसमें फिर

अपनी पद- प्रतिष्ठा 

मैडल-मालाएं

मेज- कुर्सी 

कोठी-कार

किताबें-फाइलें

बैंक- बैलेंस

नाते- रिश्ते

बोल-बातें

कपड़े- लत्ते

खाने-पीने

गाने-बजाने

जेवर- कपड़े 

चाबी-लॉकर

तेरा- मेरा

गर्व-गुरूर

और.....

अपना  "मैं “भी

तो क्या हुआ

जो आज तक

कोई भी

नहीं ले जा पाया

साथ कफन

शायद 

तुम ले जा सको...!!

                         — उषा किरण 


#सोया_मनवा_जाग_जरा.......

फोटो; Pinterest से साभार

रविवार, 6 दिसंबर 2020

पुस्तक - समीक्षा (ताना-बाना)


                           

 सुप्रसिद्ध ब्लॉगर एवम् सम्वेदनशील लेखिका आदरणीय Sangeeta Swarup जी को कौन नहीं जानता ! उन्होंने ताना-बाना पढ़ कर "शाह टाइम्स “ पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की हैं ! बहुत आभार आपका और संपादक शाहिद मिर्जा जी का भी...देखिए वे क्या लिखती हैं-

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

शाह टाइम्स के संपादक शाहिद मिर्ज़ा जी का हार्दिक धन्यवाद ।


पुस्तक - परिचय --

ताना - बाना  ( डॉ0 उषा किरण ) 


यूँ तो उषा जी की ताना बाना पर बहुत समृद्ध पाठकों और लेखकों की प्रतिक्रिया आ चुकी है फिर भी हर पाठक का अपना अलग दृष्टिकोण होता है इसलिए मैं भी एक सामान्य पाठक की हैसियत से इस पुस्तक और इस पुस्तक की लेखिका पर अपने विचार रखना चाहूँगी ।

  हिंदी साहित्य के आसमान में उषा किरण एक ऐसा नाम जो उषा की किरण की तरह ही दैदीप्यमान हो रहा है । यूँ तो हर क्षेत्र में ही अपने अपने मठ और मठाधीश हुआ करते हैं जो नए लोगों को बामुश्किल आगे बढ़ने में सहायक होते हैं लेकिन जो इन सबकी परवाह न कर अपनी पगडंडी पकड़ अपना रास्ता बनाता चले वो निश्चित ही अपनी मंज़िल पर पहुँचने में सक्षम होता है । और यह निश्चय डॉ ० उषा किरण के व्यक्तित्व में झलकता है । डॉक्टर उषा किरण  गद्य और काव्य लेखन, दोनो में ही सिद्धहस्त है ।कहानियाँ ऐसे बुनती हैं कि लगता है कि घटनाएँ सब आंखों के सामने घटित हो रही हैं ।लेकिन इस समय केवल इनके काव्य संग्रह  ताना -  बाना पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं । यह पुस्तक मुझे उषा जी के हाथों प्रेम सहित भेंट में मिली ।  यह संग्रह इतने खूबसूरत कलेवर में है कि कुछ देर तो मैं पुस्तक के सौंदर्य को ही देखती रह गयी । इस पुस्तक को इस रूप में प्रस्तुत करने में जिन लोगों का सहयोग मिला वह सब बधाई के पात्र हैं ।यह काव्य संग्रह शिवना प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है । शिवना प्रकाशन को बधाई ।

इस पुस्तक में केवल काव्य ही संग्रहित नहीं वरन चित्र  भी समाहित है । हर रचना के साथ उन भावों को समेटे उसके लिए एक चित्र देख यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि डॉक्टर उषा किरण  में  बेहतरीन  कवयित्री और उम्दा चित्रकार का संगम है । जैसे जैसे उनका ताना बाना पढ़ती गयी उनके भावों की अभिव्यक्ति से अभिभूत होती गयी । हर रचना में जैसे सहज सरल भाषा में अपने भावों को ज्यों का त्यों उड़ेल दिया गया हो । उनकी  कविताएँ उनके आस पास के लोगों , उनकी स्मृतियों ,समाज में घटित घटनाओं , व्यवस्थाओं पर आधारित हैं । 


      इस काव्य संग्रह में हर तरह की कविता का समावेश है । कुछ क्षणिकाएँ हैं जो जीवन दर्शन को कहती प्रतीत होती हैं -

हमारी बातों की उँगलियाँ 

देखो न

बुनती हैं कितने वितान 

*********

सोच की सलाइयों को 

आदत है बुनने की 

रुकती ही नहीं ।


इस पुस्तक को पढ़ते हुए यह अहसास होता है कि कवयित्री  अपने परिवार और हर रिश्ते के प्रति सहज सरल निष्ठावान हैं ।अपनी काव्य यात्रा में उन्होंने हर रिश्ते को संजो लिया है । इनकी रचनाओं की ख़ासियत है कि जैसा जिसके लिए मन से महसूस किया वैसा ही कागज़ पर अंकित कर दिया । 

माँ के लिए लिखती हैं - 

सारे दिन खटपट करतीं

लस्त पस्त हो 

जब झुंझला जातीं

तब.....

तुम कहतीं - एक दिन 

ऐसे ही मर जाऊँगी ... 


आज स्वयं माँ बन वही सब याद कर रही हैं । उनकी कविताओं में हर रिश्ता अपनी झलक दिखला रहा है । उनकी स्मृतियों में सब सिमटा  हुआ है  । मुझे उनकी लिखी कविता "राखी" विशेष आकर्षित करती है  जिसमें उस भाई से निवेदन कर रही हैं जो इस संसार से विदा ले चुका है ।अपने दर्द को छिपा दुनियादारी निबाह कर अपने मन की बात कही है ,---


मना कर उत्सव पर्व 

लौट गए हैं सब 

अपने अपने घर .....

......

तारों की छांव में 

विशाल गगन तले

खड़ी हूँ बाहें फैलाये.....

......

अपनी कलाई बढ़ाओ तो 

भैया । 


इस पुस्तक के माध्यम से जान पाते हैं कि उनके लिए हर रिश्ता बहुत अज़ीज़ है ।फिर चाहे वो पिता को हो या पति का , बच्चों का हो या फिर दोस्ती का । लेकिन जब बात स्वयं की हो तो  अपना ही परिचय दूसरों से मांगती हैं । क्यों कि उनके अंदर तो एक धमाचौकड़ी करती बच्ची भी है तो ख्वाब बुनती युवती भी । 

उनकी सोच के ताने बाने हर समय और हर जगह चलते रहते हैं । पर्यटन के लिए एतिहासिक स्थलों पर वहाँ की इमारतों से भी संवाद स्थापित कर लेती हैं - 


सुनी हैं कान लगा कर 

उन सर्द, तप्त दीवारों पे

दफन हुईं वे

पथरीली धड़कने .... 


जहाँ उनका हृदय कोमल भावनाओं से भरा हुआ है वहाँ कहीं अत्याचार या किसी का शोषण उनको आक्रोशित भी कर देता है ।बाह्य जगत में होने वाले सामाजिक सरोकार से भी सहज ही जुड़ जातीं हैं । ऐसी ही कुछ कविताएँ  स्त्री के प्रति किये गए अत्याचार के विरुद्ध बिगुल फूँकने का काम कर रही हैं --


औरत ! सुनो, बात समझो 

इससे पहले कि बहती पीड़ाओं के कुंड में डूब जाओ 

इससे पहले कि सीने जी आग राख कर दे तुम्हें

पहला पत्थर तो उठाना होगा तुमको ही ...

**********

 जो अत्याचार सह चुप रहतीं हैं उन औरतों को व्यंग्यात्मक शैली में लताड़ा भी है -


चुप रहो 

खामोश रहो 

सभ्य औरतें , चुप रहती हैं । 

********** 

उन स्त्रियों पर करारा प्रहार है जो पुत्रों द्वारा किये गए कुकर्मों पर पर्दा डालती हैं --


क्यों नहीं दी पहली सज़ा तब 

जब दहलीज़ के भीतर 

दी थी औरत को पहली गाली ? 

.............उठो गांधारी 

अपनी आँखों से 

अब तो पट्टी खोलो ।

*********


इस काव्य -  संग्रह की एक बात विशेष रूप से प्रभावित करती है कि डॉ 0 उषा किरण कहीं भी निराशा से ग्रसित नहीं हैं । सकारात्मकता ही उनकी ऊर्जा है । "मुक्ति " कविता में सच ही मुक्ति का मार्ग खोज लिया है । हिसाब किताब का हर पन्ना फाड़ मुक्त हो जाना चाहती हैं ।  तो दूसरी ओर स्वयं के  हर बंधन को  हर तरह से काट दिया है और उन्मुक्त हो ज़िन्दगी जी रही हैं -

इन दिनों 

बहुत बिगड़ गयी हूँ मैं 

अलगनी से उतारे 

कपड़ों के बीच

खेलने लग जाती हूँ घंटों 

कैंडी क्रश ...

झांकते रहते हैं ठाकुर जी 

पूजा घर से 

स्नान - भोग के लिए ...


इतनी जीवंत कविता पढ़ पाठक भी ऊर्जावान हो उठता है और बरबस ही उसके  चेहरे पर एक स्मित की रेखा खिंच जाती है ।  कहीं खिली धूप से बात करती हैं  तो कहीं  एक टुकड़ा आसमाँ अपनी पिटारी में रख लेना चाहती हैं । यूँ तो बहुत सी कविताओं को यहाँ उध्दृत किया जा सकता है लेकिन पाठक स्वयं ही कविताओं को पढ़ अनुभव करें और पुस्तक का आनंद लें । 

ताना -  बाना अलग अलग अनुभव का पिटारा है । जिसमें कवयित्री ने शब्दों को ताना है और अपने भावों के बाने से कविताओं को बुना है । पुस्तक को पढ़ते हुए पाठक सहजता से लेखिका के भावों के साथ बहता चला जाता है ।साथ ही हर कविता के साथ जो रेखांकन है उसमें खो जाता है । 

कुल मिला कर यह काव्य संग्रह संग्रहणीय है । डॉक्टर उषा किरण को मेरी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ । उनके द्वारा लिखी और पुस्तकों का  इंतज़ार रहेगा । 


   

ताना - बाना 

डॉ0 उषा किरण 

ISBN : 978-93-87310-71-1

मूल्य - ₹ - 450/

शिवना प्रकाशन ।


पुस्तक का लिंक-


https://www.amazon.in/dp/B083V21F3G


http://geet7553.blogspot.com/2020/10/0.html?m=1





मंगलवार, 17 नवंबर 2020

खिलाड़ी



रे खिलाड़ी 

ये कैसी बिसात 

ये कैसी बाजी..?


तन का तेल 

रूह की बाती 

सब कुछ जला

सब निछावर कर

औरतें हरती है तमस

लाती है उजास

और उस उजास में 

देखभाल कर

तुम बिछाते हो

बिसात !


बिछी बिसात पर 

बिठाती हैं वे 

पूरे दिल से

लूडो की गोटियाँ 

सब रंग की

लाल, पीली, नीली, हरी

भाग्य की डिब्बी में डाल

टिकटिकाती रहती है 

पासा  ताउम्र !


तीन- दो- पाँच

या छै: पाकर ही

रहती है खूब मगन 

और चतुर - सुजान

मंजे खिलाड़ी 

तुम बिठाते हो

उसी बिसात पर 

गोटियाँ शतरंजी

खेलते हो चालें शातिर...!


वो जान ही नहीं पाती 

इस भेद को

साज़िशों के तहत

एक- एक कर

उसकी सारी गोटियाँ

पीट दी जाती हैं !


प्यार के नाम पर 

उसके हिस्से आते हैं

जाने कितने भ्रम 

कितने झूठ 

कुछ धूप

और कुछ घुप्प अँधेरे !


काँच पर चमकते 

सतरंगी आभास को 

हर्षित हो

इन्द्रधनुष जान 

आँजती है आँखों में !


शह और मात के बीच 

फंसी औरतें

हाशियों पर बैठी

पाले रहती हैं 

जाने कितने भ्रम 

अनगिनत ...!!

                           - उषा किरण


फोटो . पिन्टरेस्ट से साभार

गुरुवार, 12 नवंबर 2020

बेटी का पिता





तेरे नन्हें पावों की रुनझुन से 

झंकारित

तेरी हथेलियों के बूटों से 

अलंकृत

तेरी बातों की गुनगुन से 

गुँजारित

तेरे पहने रंगों से 

झिलमिल

और तेरे हाथों की

चूड़ियों से खनकता है

मेरा घर - आँगन

आँगन के नीम पर झूलते-झूमते

जोर से खिलखिलाती है

और ऊंचा पापा

और ऊँचा

मैं लगा देता हूँ 

पूरा जोर अपनी बाजुओं का

अपनी हसरतों का

चाहता हूँ तू हाथ बढ़ा कर

तोड़ लाए अपना इन्द्रधनुष 

पर कहीं मन में सहम जाता हूँ मैं

जब देखता हूँ आकाश में झपटते

गिद्धों और चील कौओं को

हाथों का जोर 

और मन का उत्साह थक जाता है

मैं चाहता तो हूँ  तेरे हौसलों को 

परवाज देना

पर मेरे हाथ इतने भी लम्बे  नहीं 

सुन मेरी बच्ची 

तुझे खुद बनना होगा 

अपना शक्ति -पुँज

गढ़ना होगा स्वयम् 

अपना रक्षा- कवच

और बढ़ानी होगी खुद अपनी पींगें

मैं तो हूँ न साथ सदा 

बन कर तेरा

धरती और आकाश 

फिर बढ़ाना हाथ और तोड़ लाना 

फलक से चमकते सितारे

और सूरज, चाँद

सारे के सारे.....!!!


                       — उषा किरण

              फोटो : पिन्टरेस्ट के सौजन्य से

बुधवार, 4 नवंबर 2020

करवाचौथ

         


   कैलेण्डर में करवाचौथ की तिथि

             ढूँढते देख मुझे

            बाजार से लौटते

करवे , दिया, कलैन्डर ले आए सब

     जानते हैं न भुलक्कड़ हूँ ,फिर

लसड़- पसड़ उसी दिन भूखी प्यासी

             बाजार भागूँगी !

     मेंहदी लगाए देख हाथों में

              समेट दिए कप

             `चाय पी लो तुम

               अब उम्र हो गई

            फल खा लिया करो

       आज रहने देतीं ये अलमारी

        फिर कभी कर लेतीं ठीक !’

       वॉक से लौटते दो चार गेंदे की 

            मालाएं भी उठा लाए

            जानते हैं न त्योहार में

      मन्दिर सजाना पसन्द है मुझे !

 `सुनो आज चाँद पौने आठ निकलेगा’

        सुबह ही पेपर में पढ़ जोर से

                  बता दिया है !

    व्याकुल हो घड़ी निहारते देख मुझे

अमेजॉन पर फ़िल्म `अक्टूबर ‘ लगा दी है

        कब से देखना चाह रही थी !

             चाँद को निकलने में

               है अभी घन्टा भर

    पर छत पर कई चक्कर लगा आए !

अर्घ्य देते, कहानी सुनते, खाते- पीते देख

     तुम्हारा चेहरा कुछ भीग सा गया है

                फिर से कहते हो-

    अब उम्र हो गई फल खा लिया करो

       कहीं तबियत खराब न हो जाए !

        `तुम न बात कितना दोहराते हो

                चल जाता है अभी....’

                    बड़बड़ाती हूँ 

            अगली सुबह चाय पीते

           कुछ सोच कर आँखों की 

            मुस्कान छिपा छेड़ती हूँ-

        `क्यों जी कई बार से देख रही

            ये हर करवाचौथ जो तुम

      कहीं बाहर जाते हो, चक्कर क्या है ?

           झटके से पेपर से मुँह उठा

             घूर कर चेहरा देखते हो

             पुन: पेपर में डुबकी मार

                     बुदबुदाते हो

              तुम भी न...कुछ भी...!

    चाय की ट्रे उठा अँदर जाते कहती हूँ

                   अच्छा सुनो

    आज बच्चों को फोन जरूर कर लेना

                  भूलना नहीं...!

          जाने क्यूँ ऐसा लगता है 

       जैसे व्रत अकेले मेरा नहीं था कल...!!


                                   — उषा किरण

                           काव्य-संग्रह " ताना- बाना” से

सोमवार, 2 नवंबर 2020

जन्मदिन मुबारक....

 तुम्हारा जन्मदिन हमें मुबारक भैया.....यदि जन्म हो अगला तो हम बहनों के भाई तुम ही बनना🥰


सोए जाने कितनी गहरी नींद 

मन तो करता है बस कहीं से भी 

तुम्हें ढ़ूँढ़ के ले आऊँ

ऐसे भी सोता है कोई भला?

अम्माँ कहती थीं 

बचपन से ही सोतू थे तुम

एक बार सोते तो

भूख- प्यास का कुछ होश नहीं 

अब मैं क्या करूँ 

कहाँ ढूँढूँ

जाने कहाँ जाकर सोए तुम

तुम्हारी नगरी का कोई नाम ही नहीं

पता भी नहीं ....

भागते बादलों को थमा दी हैं 

कुछ किरणें सतरँगी 

शायद तुम तक 

पहुँच जाएं

दुआएँ हमारी...!!

🌸🌼🌸🌼🌸


😒


मंगलवार, 27 अक्तूबर 2020

पुस्तक- समीक्षा ( सात समंदर पार)





पुस्तक—  सात समंदर पार


"दोस्त प्रतिध्वनि की....”


"न जाने कौन रोया है

कि अब तक

गगन का आँगन

क्षितिज का कोर भीगा है

न जाने कौन रोया है....!”


 इस छोटे से गीत की एक प्रतिलिपि पितृतुल्य,श्रद्धेय पन्त जी के पास इस पुस्तक की लेखिका ,उनकी मानस पुत्री श्रद्धेय सरस्वती प्रसाद जी ने लिख कर भेजी थी ।उनका जवाब आया-".....तुम्हारा गीत पढ़ा ।एक बार नहीं कई बार ,किस मनस्थिति में इस गीत को तुमने लिखा था बेटी।धरती ,आकाश को भिगोती आँसू की बूँदें ,कि मेरी भी आँखें भर आईं ।”

हर किसी में ये सामर्थ्य नहीं होती कि वो अपनी पीड़ा व रुदन से कायनात को भिगो दे ...सुमित्रानन्दन पन्त जैसे महान कवि की आँखें नम कर दें !

" सरस्वती प्रसाद घर की इकलौती बेटी ,बड़े से घर के कई खाली कमरों से आवाज देती बन गईं दोस्त प्रतिध्वनि की...!”

" सात समंदर पार” पावन त्रिवेणी है ...इसमें तीन पीढ़ियों का संगम है ,गंगा-यमुना सी बेटियों व नातिन के प्रयासों का और लुप्त-प्राय माँ सरस्वती की ममतामयी स्मृतियों के लहराते आँचल की धारा व उनकी कल्पना से सृजित हुई परतन्त्र राष्ट्र के प्रति भाव भरी कहानी का !

ये पुस्तक नहीं बल्कि बेटियों व नातिन के द्वारा दिया गया भावभीना तर्पण है ...भावभीनी श्रद्धांजलि है ,जिसमें शीतल माहेश्वरी ने भी अपनी अंजुलि जोड़ कर इसे सतरंगी रंगों से सजा धनक सा  मोहक बना अपनी भी भावान्जलि समर्पित की है ।

दो पीढ़ियों के संस्कार व कृतज्ञता जो उन्हें पुण्यात्मा माँ सरस्वती से विरासत में मिले 

और स्व० माँ ने कमाए जो पुण्य, दिव्य भावों व कर्मों से उनको महसूस किया अगली पीढ़ियों ने ...उसी का सुपरिणाम है यह पुस्तक जो बहुत सुन्दर बन पड़ी है ।

मुझे नहीं लगता कि अपनी कविहृदया माँ व नानी को कोई इससे बेहतर श्रद्धांजलि दे सकता है ।माँ जहाँ भी होंगी उनकी आत्मा सुकून पा रही होगी और गौरव मिश्रित संतुष्टि की अनुभूति उनको अवश्य हो रही होगी ।

नातिन `अपराजिता कल्याणी ‘के मानस की परिकल्पना ने `सात समन्दर पार’ की कथा को इसके आवरण- चित्र में उकेरा है तथा बहुमुखी प्रतिभा की धनी `शीतल माहेश्वरी ‘ ने खूबसूरत चित्रों से पुस्तक की रोचकता-ग्राह्यता में वृद्धि की है ।खूब ब्राइट कलर से बने चित्र बहुत कलात्मक हैं और हमारी कल्पना को पंख देते हैं ।

 लाल सुहाग के जोड़े में सिमटी सी  बैठी  नव- वधु के सामने की जमीन को भी लाल सिंदूरी रंग से चित्रित कर शीतल ने अपनी अनोखी कल्पना की कूची से कायनात पर भी सिंदूरी अनुराग छिड़क मानो प्रकृति को भी उसी रंग से रंग दिया है !

इसी तरह बच्चों के खेलते हुए रंग- बिरंगे चित्र 

बेहद बोल्ड रेखाओं से सुंदर बनाए है । सात समंदर पार जाता बादलों से बात करता हवाई जहाज और समन्दर में डूबी- डूबी सपने देखती आँखें चित्रित करते शीतल के चित्र से उनकी कल्पना शक्ति का परिचय मिलता है। शीतल की सकारात्मकता व क्रिएटिविटी प्रशंसनीय है ।वे विभिन्न क्षेत्रों में नित नूतन प्रयोग व सृजन करती रहती हैं ।

भूमिका लिखी है सरस्वती प्रसाद जी की बड़ी बेटी `नीलम प्रभा’ ने। वे लिखती हैं - 

" दो की एक होकर अपनी दुनिया को बसाना,

फिर उस दुनिया को और सजाने और संवारने का ख्वाब अपनी पलकों पर पालना...वो प्रवासी सपना वापिस नहीं आता...ऐसी लाखों जोड़ी आँखों में देखे गए अन्तहीन कराह का, आँसुओं से तर बयान है `सात समन्दर पार ‘की कथा ।”

पुस्तक हाथ में लेकर  उलटते - पलटते रेशम सा हाथ से फिसलता है ...रंगीन चिकने उम्दा पन्नों पर टंकण-कार्य बहुत उत्तम हुआ है ।तीन पीढ़ियों के भाव- सागर में से गुजरता पाठक का मन भी जैसे अगर- कपूर सा सुवासित हो उठता है ।अक्षर- अक्षर भावान्जलि हो जैसे ! निश्चित ही लिविंग- रूम की बुक- शेल्फ में संजो कर सहेजने लायक है ये कॉफी टेबिल बुक !

लेखिका माँ सरस्वती प्रसाद की दोनों बेटियों को भी विरासत में माँ की अद्भुत, प्रभावशाली काव्यमयी चिन्तनधारा का प्रसाद मिला है ।सिर्फ लेखनी पर ही नहीं स्वरों पर भी अद्भुत पकड़ रखने वाली विलक्षण गायिका व प्रतिभाशाली कवयित्री उनकी छोटी बेटी रश्मिप्रभा भावुक हो कह उठती हैं -

  "यह सब कुछ मेरे लिए त्रिवेणी का जल रहा है

           जिसे छूकर कहती हूँ तर्पण, अर्पण

               निरंतर, हर दिन, हर पल !”

माँ का जीवन, उनका हर पल, हर दिन पावन है बेटी के लिए ...कह उठती हैं -

       " तुम्हारा जन्मदिन

          तुम्हारी शादी का दिन...

           तुम्हारे जाने का दिन

            सब पुण्य है...!”

इस पुस्तक में उकेरी गई कहानी गुलाम भारत की एक तस्वीर प्रस्तुत करती है जब हर भारतवासी का सपना देश की आजादी के सपने के बिना अधूरा था।

अंग्रेजियत और देश- भक्ति की दो धाराएं बहती हैं शुरु में दो बच्चों के संस्कारों में ,जो हमें गुलाम भारत में ले जाती है परन्तु धीरे- धीरे किशोर से युवा हुए युगल  के हर राग- अनुराग में देश-भक्ति शामिल है ...उनके हर सपने में देश की  आजादी का सपना भी शामिल है।

दूसरी पीढ़ी के फिर अपने सपने हैं ...क्या हैं वे,ये तो आप किताब पढ़ कर ही जानेंगे ।

मैं इतनी सुंदर किताब के लिए जो इसमें शामिल हैं उन सभी को बधाई देती हूँ ...और श्रद्धेय माँ को सादर एक भावान्जलि समर्पित मेरी तरफ से-🙏🌺🌿☘️

            

                                       — उषा किरण


पुस्तक- सात समन्दर पार ( लघु उपन्यास)

लेखिका-सरस्वती प्रसाद

प्रकाशन-रुझान 

मूल्य -Rs.195







रविवार, 25 अक्तूबर 2020

पुस्तक समीक्षा- ताना- बाना

  लेखिका—शिखा वार्ष्णेय 




दि. 14 जून 2020 में  स्वदेशन्यूज में मेरे काव्य- संग्रह #ताना_बाना पर शिखा वार्ष्णेय की लिखी समीक्षा छपी ...पढ़ कर प्रोत्साहन तो मिलता ही है ...आप सबसे शेयर करना भी बनता है ...शुक्रिया Shikha Varshney और शुक्रिया Suresh Hindustani जी 😍


https://www.swadeshnews.in/full-page-pdf/epaper/gwalior-weekly/2020-06-14/saptak/261?fbclid=IwAR0eCRggA_vOhJcxzlTFx-90gTn7mPjSClWMBJbQP6R8CbPVkrHf3Os4xoo

पुस्तक -समीक्षा (ताना-बाना)

                             ~   पुनीत राठी~

                               ~~~~~~~~~~~



धन्यवाद मैम इस अमूल्य उपहार के लिये.........

आपका  काव्य संग्रह ताना-बाना सचमुच एक ताना- बाना ही है आपके जीवन का लेकिन जब पाठक इसे पढता है तब आपकी कविताओ मे अपनी संवेदनाओ के धागो को पाता  है और फिर एक ताना -बाना चलता है । जीवन मे एक धागा सुख  तो कही दो धागे दुख और भी न जाने कितने संबन्ध उनसे मिलने वाले अनुभवो के धागो से जो जीवन का ताना - बाना बनता है पूरी किताब को अन्त तक  पढने पर यही धागे बार- बार छुए जाते है और छू जाते है दिल को भी.....

 पुस्तक मे कविताये और उन पर बनाये गये आपके चित्र दोनो है जो नयी कविता के दौर मे शायद एेसा पहली बार है जो पाठक के आनन्द को द्विगुणित करते है ।  माना चित्र कविताओ पर आधारित है लेकिन कविताओ और चित्रो का अपना अलग - अलग अस्तित्व भी है। यदि कविताये बिना चित्रो के पढे तब भी एक चित्रात्मकता है और यदि चित्र ही देखे तब लगता है मानो किसी कला- विथिका मे घूम रहे हो।

" आपकी पुस्तक एक एेसी दीर्घा है जिसमे कला प्रदर्शनी और काव्य पाठ का आनन्द एक व्यक्ति को पाठक और दर्शक बनकर एक साथ मिलता है।"

सभी कविताये मुझे बेहद पसन्द आयी लेकिन कुछ कविताओ ने मन को बान्ध लिया जैसे परिचय , मुक्ति, मिलन , एकलव्य, पथराया पल ,फितरत और थाली का चांद ।

फरियाद , ताता, अभी भी, राखी और मां जैसी कविताये जो पारिवारिक संबन्धो से मिलने वाले सुख-दुख के विषय मे लिखी गयी है दिल को छू जाती है।

धूप, नदी, इन्द्रधनुष,रेत , बारिश चान्द और भी न जाने कितने उपमानो से सजी आपकी कविताये अपने आप मे धरती से लेकर अम्बर तक को समेटे है...!

                                   एक बार पुन: धन्यवाद🙏

 —  पुनीत राठी


पुस्तक समीक्षा ( ताना- बाना)

 

         


                              ~  रन्जु भाटिया~

                                ~~~~~~~~~

ताना बाना ( काव्यसंग्रह )

सुन लो              

जब तक कोई

आवाज देता है

क्यूँ कि...

सदाएं  एक वक्त के बाद

खामोश हो जाती हैं

और ख़ामोशी ....

आवाज नहीं देती!!

   डॉ उषा किरण


कितनी सच्ची पंक्तियां है यह। हम वक़्त रहते अपने ही दुनिया मे रहते हैं बाद में पुकारने वाली आवाज़ों को सुनने की कसक रह जाती है । शब्दों का यह "ताना बाना" ,ज़िन्दगी को आगे चलाता रहता है । यही सुंदर सा शब्दों का" ताना बाना "जब मेरे हाथ मे आया तो घर आ कर सबसे पहले मैने इसमें बने रेखाचित्र देखे ,जो बहुत ही अपनी तरफ आकर्षित कर रहे थे , कुछ रचनाएं भी सरसरी तौर पर पढ़ी ,फिर दुबई जाने की तैयारी में इसको सहज कर रख दिया ।
     यह सुंदर सा "काव्यसंग्रह "मुझे "उषा किरण जी" से इस बार के पुस्तक मेले में भेंटस्वरूप मिली । उषा जी 'से भी मैं पहली बार वहीं मिली ,इस से पहले फेसबुक पर उनका लिखा पढ़ा था और उनके लेखन से बहुत प्रभावित भी थी । क्योंकि उनके लेखन में बहुत सहजता और अपनापन सा है जो सीधे दिल मे उतर जाता है ।
     पहले ही कविता "परिचय " में वह उस बच्ची की बात लिख रही हैं जो कहीं मेरे अंदर भी मचलती रहती है ,
नन्हे इंद्रधनुष रचती
नए ख्वाब बुनती
जाने कहाँ कहाँ ले जाती है
उषा जी ,के इस चित्रात्मक काव्य संग्रह में बेहद खूबसूरत ज़िन्दगी से जुड़ी रचनाएं हैं ।जो स्त्री मन की बात को अपने पूरे भावों के साथ कहती हैं । औरत का मन अपने ही संसार मे विचरण करता है ,जिसमे उसकी वो सभी  भावनाएं हैं जो दिन रात के चक्र में चलते हुए भी उसके शब्दों में बहती रहती है और यहां इन संग्रह में तो शब्दों के साथ रेखांकित चित्र भी है जो उसके साथ लिखी कविता को एक  सम्पूर्ण अर्थ दे देते हैं जिसमे पढ़ने वाला डूब जाता है।
डॉ उषा जी के इस संग्रह को पढ़ते हुए मैंने खुद ही इन तरह की भावनाओं में पाया , जिसमे कुछ रचनाएं प्रकृति से जुड़ी कर मानव ह्रदय की बात बखूबी लिख डाली है ,जैसे सब्र , कविता में
थका मांदा सूरज
दिन ढले
टुकड़े टुकड़े हो
लहरों में डूब गया जब
सब्र को पीते पीते
सागर के होंठ
और भी नीले हो गए

पढ़ते ही एक अजब से एहसास से दिल भर जाता है। ऐसी ही उनकी नमक का सागर ,बड़ा सा चाँद, एक टुकड़ा आसमान, अहम ,आदि बहुत पसंद आई । इन रचनाओं में जो साथ मे रेखाचित्र बने हुए है वह इन कविताओं को और भी अर्थपूर्ण बना देते हैं।
   किसी भी माँ का सम्पूर्ण संसार उनकी बेटियां बेटे होते हैं , इस संग्रह में उनकी बेटियों पर लिखी रचनाएं मुझे अपने दिल के बहुत करीब लगी
बेटियां होती है कितनी प्यारी
कुछ कच्ची
कुछ पक्की
कुछ तीखी
कुछ मीठी
वाकई बेटियां ऐसी ही तो होती है ,एक और उनकी कविता मुनाफा तो सीधे दिल मे उतर गई ,जहां बेटी को ब्याहने के बाद मुनाफे में एक माँ बेटा पा लेती है। जो रचनाएं आपके भी जीवन को दर्शाएं वह वैसे ही अपनी सी लगती है । लिखने वाला मन और पढ़ने वाला मन  कभी कभी शायद एक ही हालात में होते हैं । कल और आज शीर्षक से इस संग्रह की एक और रचना मेरे होंठो पर बरबस मुस्कान ले आयी जिसमे हर बेटी छुटपन में माँ की तरह खुद को संवारती सजाती है ,कभी माँ के सैंडिल में ,कभी उसकी साड़ी में , और इस रचना की आखिरी पँक्तियाँ तो कमाल की लगी सच्ची बिल्कुल
आज तुम्हारी सैंडिल
मेरी सैंडिल से बड़ी है
और .....
तुम्हारे इंद्रधनुष भी
मेरे इंद्रधनुष से
बहुत बड़े हैं !
इस तरह कभी बेटी रही माँ जब खुद माँ बनती है तो मन के किसी कोने में छिपी आँचल में मुहं दबा धीमे धीमे हंसती है  ( माँ कविता )
बहुत सहजता से उनके लिखे इस संग्रह में रोज़मर्रा की होने वाली बातें , शरीरिक दर्द जैसे रूट कैनाल में बरसों से पाले दर्दों से मुक्ति का रास्ता सिखला देती है ।
इस संग्रह की हर रचना पढ़ने पर कई नए अर्थ देती है । मुझे तो हर रचना जैसे अपने मन की बात कहती हुई लगी । पढ़ते हुए कभी मुस्कराई ,कभी आंखे नम हुई । सभी रचनाओं को यहां लिखना सम्भव नहीं पर जिस तरह एक चावल के दाने से हम उनको देख लेते है वैसे ही उनकी यह कुछ चयनित पँक्तियाँ बताने के लिए बहुत है कि यह संग्रह कितना अदभुत है और इसको पढ़े बिना नहीं रहा जा सकता है ।
"ताना बाना "डॉ उषा जी का यह संग्रह  इसलिए भी संजोने लायक है ,क्योंकि इसमें  बने रेखाचित्रों से भी पढ़ने वाले को बहुत जुड़ाव महसूस होगा  ।
  डॉ उषा जी से मिलना भी बहुत सुखद अनुभव रहा । जितनी वो खुद सरल और प्यारी है उनका लिखा यह संग्रह भी उतना ही बेहतरीन है । अभी एक ग्रुप में जुड़ कर उनकी आवाज़ में गाने सुने ,वह गाती भी बहुत सुंदर  हैं । ऐसी प्रतिभाशाली ,बहुमुखी प्रतिभा व्यक्तित्व के लिखे इस संग्रह को जरूर पढ़ें ।
धन्यवाद उषा जी इस शानदार काव्यसंग्रह के लिए और आपको बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं
                       ~ रन्जु भाटिया
ताना बाना
डॉ उषा किरण
शिवना प्रकाशन
मूल्य 450 rs

पुस्तक-समीक्षा ( ताना- बाना)

                                    ~रश्मि कुच्छल~

                                  ~~~~~~~~~~~

                               ~ ताना- बाना~

                              ~~~~~~~~~~~~

 इस सफरनामे का आवरण ही लेखिका यानी  Dr . उषाकिरण दी का व्यक्तित्व है ,घनी कालिमा को चीरकर उभरता सुनहरा सूरज ।

रेखाओं की चितेरी जादू भरी उंगलियां कब इन रेखाओं को शब्द बना देती हैं और कब ये कवितायों की भावभूमि के उड़ते मेघ से कागज पर चित्र बनकर उतर आते हैं ,ये अद्भुत संयोजन और कारीगिरी इस किताब को विशेष बनाती है व दीदी को एक विशिष्ट गरिमामयी काव्यचित्र संकलन "ताना - बाना " की जननी ।

स्त्री मन की नजर से जीवन के हर रंग को छूती , विषाद, विसंगति और विडंबनाओं पर तंज करती , कभी निरुपाय तो कभी दृढ़ होकर राह बनाती हर कविता उनके नजरिये से मिलवाती है ।

आज कुछ कविताओं से रूबरू होते हुए एक कविता पर रुक गयी हूँ ।

आप सबके लिए ---🙏😊

                                 ~~   रश्मि कुच्छल 

                                  


पुस्तक - समीक्षा (ताना- बाना)

डॉ०

सीमा शर्मा


   



   सुप्रसिद्ध समीक्षक डॉ ० सीमा शर्मा ने मेरी पुस्तक 'ताना- बाना’ की बहुत सुँदर समीक्षा Shivna Sahityiki में लिखी है ... सीमा जी आप किताब की रूह तक पहुँचीं ...शुक्रिया...प्लीज आप सब भी पढ़ें 🥰


मित्रों, संरक्षक एवं सलाहकार संपादक, सुधा ओम ढींगरा, प्रबंध संपादक नीरज गोस्वामी, संपादक पंकज सुबीर, कार्यकारी संपादक, शहरयार, सह संपादक शैलेन्द्र शरण Shailendra Sharan , पारुल सिंह Parul Singh के संपादन में शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 5 अंक : 17 त्रैमासिक : अप्रैल-जून 2020 का वेब संस्करण अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल है- आवरण चित्र / नीरज गोस्वामी, आवरण कविता / अजंता देव Ajanta Deo , संपादकीय / शहरयार Shaharyar Amjed Khan , व्यंग्य चित्र / काजल कुमार Kajal Kumar । पिछले दिनों पढ़ी गई किताबें- निष्प्राण गवाह, क़तार से कटा घर AnilPrabha Kumar , बंद मुट्ठी, प्रवास में आसपास, वारिसों की ज़ुबानी Geeta Shreee - सुधा ओम ढींगरा Sudha Om Dhingra । शोध-आलेख- सुबह अब होती है... तथा अन्य नाटक / जुगेश कुमार गुप्ता Zugesh Mukesh Gupta , जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था / दिनेश कुमार पाल Dinesh Pall , खिड़कियों से झाँकती आँखें / अफ़रोज़ ताज Afroz Taj , बंद मुट्ठी / डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह । पुस्तक समीक्षा- ताना-बाना / डॉ. सीमा शर्मा / डॉ. उषा किरण Usha Kiran , कुबेर / दीपक गिरकर Deepak Girkarr / डॉ. हंसा दीप Hansa Deep , धर्मपुर लॉज / राजीव कार्तिकेय @rajiv kartikey / प्रज्ञा Pragya Rohini , सच कुछ और था / रेखा भाटिया @Rekha Bhatia / सुधा ओम ढींगरा, भूत भाई साहब और अन्य कहानियाँ / डॉ. सीमा शर्मा / प्रियंका कौशल Priyanka Kaushal , ख़ुद से गुज़रते हुए / पंकज मित्र Pankaj Mitra / संगीता कुजारा टाक Dolly Tak , निन्यानवे का फेर / पंकज सुबीर / ज्योति जैन, सुबह अब होती है तथा अन्य नाटक / पंकज सोनी Pankaj Sonii / नीरज गोस्वामी, दसवीं के भोंगा बाबा / डॉ. हंसा दीप / गोविंद सेन Govind Sen , बारह चर्चित कहानियाँ / प्रो. अवध किशोर प्रसाद / सुधा ओम ढींगरा, पंकज सुबीर, कुछ दुख, कुछ चुप्पियाँ / शहंशाह आलम Shahanshah Alam / अभिज्ञात Abhigyat Hridaya Narayan Singh , परछाइयों का समयसार / कादम्बरी मेहरा / कुसुम अंसल Dr. Kusum Ansall , राम की शक्ति पूजा और कामायनी का नाट्य रूपांतरण / अशोक प्रियदर्शी Ashok Priyadarshii / कुमार संजय Kumar Sanjay , हरी चिरैया / मनीष वैद्य Manish Vaidya / संजय कुमार शर्मा, होली / प्रो. अवध किशोर प्रसाद / पंकज सुबीर, विचार और समय / पंकज सुबीर / सुधा ओम ढींगरा। पुस्तक चर्चा- मेरी दस रचनाएँ / डॉ. प्रेम जनमेजय, आशना / डॉ. योगिता बाजपेई ‘कंचन’ @Yogita Bajpai , मेरी दस रचनाएँ / लालित्य ललित Lalitya Lalitt , ग़ज़ल जब बात करती है / डॉ. वर्षा सिंह Varsha Singh , दिलफ़रेब / राजकुमार कोरी ‘राज़’ Rajkumar Kori , साँची दानं / मोतीलाल आलमचन्द्र Motilal Ahirwar , मैं किन सपनों की बात करूँ / श्याम सुन्दर तिवारी @shyam sunder । केन्द्र में पुस्तक- पुस्तक : प्रेम की उम्र के चार पड़ाव / समीक्षक : शैलेन्द्र शरण Shailendra Sharan , नीलिमा शर्मा Neelima Sharrma / लेखक : मनीषा कुलश्रेष्ठ, पुस्तक : प्रवास में आसपास / समीक्षक : नीलोत्पल रमेश Neelotpal Ramesh , दीपक गिरकर / लेखक : डॉ. हंसा दीप, पुस्तक : खिड़कियों से झाँकती आँखें / समीक्षक : दीपक गिरकर, रेनू यादव Renu Yadav/ लेखक : सुधा ओम ढींगरा, पुस्तक : निष्प्राण गवाह / समीक्षक : शन्नो अग्रवाल @shanno agarwal , डॉ. मधु संधु Madhu Sandhu / लेखक : कादम्बरी मेहरा Kadam Mehra , पुस्तक : रात नौ बजे का इन्द्र धनुष / समीक्षक : धर्मपाल महेन्द्र जैन Dharm Jain , दीपक गिरकर / लेखक : ब्रजेश कानूनगो Brajesh Kanungoo , पुस्तक : यायावर हैं, आवारा हैं, बंजारे हैं / समीक्षक : अशोक प्रियदर्शी, धर्मपाल महेन्द्र जैन / लेखक : पंकज सुबीर, पुस्तक : जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था / समीक्षक : डॉ. प्रज्ञा रोहिणी, डॉ. सीमा शर्मा, कैलाश मण्डलेकर Kailash Mandlekarr / लेखक : पंकज सुबीर। आवरण चित्र नीरज गोस्वामी, डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी Sunny Goswami , सुनील पेरवाल Sonu Perwal , शिवम गोस्वामी Shivam Goswami । आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा। 

ऑन लाइन पढ़ें-

https://www.slideshare.net/shivnaprakashan/shivna-sahityiki-april-june-2020

https://issuu.com/shivnaprakashan/docs/shivna_sahityiki_april_june_2020


साफ़्ट कॉपी पीडीऍफ यहाँ से डाउनलोड करें 

http://www.vibhom.com/shivnasahityiki.html

डॉ० सीमा शर्मा -



पुस्तक -समीक्षा ( ताना- बाना)


   सुप्रसिद्ध लेखिका   " कविता वर्मा “—
 



~सभ्य औरतें चुप रहती हैं~

~~~~~~~~~~~~~~~~~

सभ्य औरतें शिकायत नहीं करतीं वे ढोलक की थाप पर सोहर गाते ननद सास को ताने देते विदाई गीत और गारी गाते अपने दुखों को पिघला कर कतरा कतरा निकालती रहती हैं लेकिन शिकायत नहीं करतीं। बगल के पृष्ठ पर एक पेड़ की शाख के ऊपर चमकते चाँद की मद्धिम रोशनी में एक औरत ढोलक की थाप पर अपने दुखों को थपकी दे रही है।

अश्वत्थामा को क्षमा करती पांचाली और उसे श्राप देकर अजर-अमर रहने को छोड़ देने वाले श्रीकृष्ण से लेखिका सवाल पूछती है। कवयित्री जो एक माँ है उसके लिये पुत्रवध करने वाले को माफ करना असहनीय है और ऐसे नफरत और प्रतिशोध से भरे लोगों के संसार में जीवित रहने से शिशुओं पर पड़ने वाले खतरे से भयभीत वह स्वयं अस्त्र उठाने की इच्छुक है। दो डरावनी आँखें एक हथेली और एक पंजे से बना प्रतीकात्मक चित्र माँ के भय और अश्वत्थामा के प्रतिशोध को व्यक्त करता है।

माँ - सारे दिन खटपट करती /लस्त पस्त हो /तुम कहतीं एक दिन ऐसे ही मर जाऊँगी /और कहीं मन के किसी कोने में छिपी /आँचल में मुँह दबा /तुम धीमे-धीमे हँसती हो माँ।

गान्धारी से सवाल करती इस कविता में कवयित्री पूछती है

बोलो! क्यों नहीं दी पहली सजा तब /जब दहलीज के भीतर औरत को दी थी पहली गाली? यह सवाल बहुत पहले पूछा जाना चाहिए था हर उस गांधारी से जिसने अपने बेटे भाई पति के जुर्म को अनदेखा कर आँखों पर पट्टी बाँध ली है और शुक्र है कि अब यह पूछा जा रहा है और एक आशा दिखाई देने की उम्मीद है।

ताना बाना उषा किरण जी का कविता संग्रह जो सिर्फ कविताओं से ही नहीं बल्कि इन्हें और मुखर करती लकीरों से भी सजा है। हर कविता के साथ एक रेखाचित्र भावों को परिवेश का साथ देकर और गहन और विस्तृत बनाता है। जितनी अद्भुत उषा किरण जी की वैचारिक क्षमता है उससे कहीं बेहद आगे उनकी उन भावनाओं परिवेश और उनकी उलझन को रेखांकित करने की उनकी क्षमता है। शब्दों और रेखाओं के इस ताने-बाने में पाठक खो जाता है। वह समझ नहीं पाता कि पहले शब्द पढ़कर उसके भाव चित्रों में ढूँढे या पहले रेखाओं को पढ़कर शब्दों को बूझे।

101 कविताओं और उनके रेखांकन से सजे इस संग्रह में स्त्री मन उसके दुख सुख उसका अकेलापन खुद में सिमटे रहने की बाध्यता समाज की वर्जनाएं विडंबना प्रेम विरह धोखा आस उम्मीद समझ कर नासमझ बने रहने का भोलापन स्त्री पुरुष संबंध सुनहरी यादें दोस्ती वादे के साथ ही जीवन के दर्शन को न सिर्फ शब्द दिये गये हैं बल्कि उन्हें रेखाओं में खूबसूरती से उकेरा गया है।

ताना बाना पाठक के मन में भावनाओं और समझ का एक ऐसा अद्भुत वस्त्र बुनता है जिसकी मुलायमियत देर तक महसूस की जा सकती है।

डाॅ उषा किरण को इस अद्भुत संग्रह के लिए हार्दिक बधाइयाँ और उनकी लेखनी और तूलिका के लिए अशेष शुभकामनाएं।

ताना बाना

डाॅ उषा किरण

शिवना प्रकाशन

मूल्य 450/-







बुधवार, 21 अक्तूबर 2020

रिटायरमेंट के साइड इफ़ेक्ट



#रिटायरमेन्ट_के_साइड_इफैक्ट

लेट निशाचर सोने वाले
हम लेट सवेरे उठते
जाने कैसे छै बजे बस
आज सवेरे उठ गए
सोचा चलो बहुत हुआ 
अब सूर्योदय दर्शन कर लें !

हरी चाय का कप ले हम
फौरन छत के ऊपर पहुँचे
इधर- उधर देखा लेकिन
सूर्यदेव कहीं न दिखते
आँख बन्द कर नाक दबा 
अनुलोम- विलोम करते
तब`इनकी’ओर हम पलटे
थे ये बेहद हैरान -परेशाँ
आज सुबह-सुबह ही कैसे
ये कयामत ऊपर आयी 
राम ही जाने आज सूरज 
जाने किधर से निकले भाई ?

अकड़ के पूछा इनसे हमने
कहाँ है सूरज साढ़े छै हैं
देखो अब तक गैरहाजिर हैं
एक आँख से देख हमें तब
ये धीरे से कुछ बुदबुदाए
`पॉल्यूशन के कारण भाई’
हैं ! ये भी कोई बहाना है
पॉल्यूशन से बोलो कोई
गायब  कैसे हो सकता है
साढ़े छह तक भी कोई 
इस तरह पड़ा सोता है?

दोनों आँखें बन्द किए फिर
झट चुप्पी इनने साधी
जल्दी जल्दी छत पर हमने  
दो चार फिरकियाँ काटीं
इतने में मुँह लाल किए
प्राची  से आँखें मलते
दिखे वे धीरे - धीरे आते !

ये भी कोई वक्त भला है
जब सारी दुनिया जागे
और तब तुम भरी दुपहरी
अब धीरे- धीरे आते ?
देख हमारी शकल सलोनी
वे जल्दी- जल्दी भागे
दस मिनिट में ठीक हमारे
सिर ऊपर आ विराजे !

अरे भई,पहले देर से उठते 
फिर जल्दी- जल्दी भगते
सारी छत पर धूप बिखेरी
अब जल्दी क्या है इतनी
अब तुम ही भला बताओ
हम वॉक कैसे कर पाएं
कुछ तो ढंग की बात करो
क्यूँ चाल बेढंगी चलते !

नाक उठा सूरज से जब
यूँ  हमको भिड़ते देखा
झट बीच में कूद पड़े ये
सूरज पे दिखाते ममता
अरे नाहक इतनी जल्दी
उठ कर क्यों ऊपर  आईं 
कुछ देर और सो लेतीं
सुबह- सुबह क्यों तुमने
इतनी तकलीफ़ उठाई 
सूर्योदय का तो रोज
बस यही वक्त है भाई !

जब उठ ही गईं तो आओ 
मिल कर प्राणायाम करें
देखो तितली भंवरे चिडिएं
कैसा मीठा गुनगुन गान करें 
हम नाक दबा बैठे बेशक थे
पर आँख हमारी ऊपर थी 
अनुशासन-पाठ पढ़ाने की
बस आज हमने ठानी थी !

कल से वक्त पर आना तुम 
वर्ना अनुपस्थिति लगाएंगे
ठीक सुबह के पाँच बजे तुम
सूर्योदय कल से लाओगे!’
हमने आँख निकाली जमकर
उनने धीरे से मुँडिया हिलाई
इनने हमसे चोरी छुप कर 
उसे एक आँख दबाई !

अगली सुबह उठे आठ पर
हड़बड़ कर छत पर भागे
अटेंडेंस का ले रजिस्टर 
छत के ऊपर जा बिराजे
जाकर पूछा सख्ती से
तुम कितने बजे थे जागे
अरे,ठीक पाँच बजे थे
जब ये आए भागे-भागे 
बोले धीरे से पति हमारे
उधर सूरज बगलें झाँके !

चलो तुम आ जाओ नीचे
हम चाय बनाने जाते हैं
रिटायरमेन्ट के बाद अब
ज़िम्मेदारी हम पर भारी है
सूरज-चाँद जगें समय पर
और समय पर जा सोएँ
दसों दिशाएं चौबस्त रहें
नदिएं व सागर ठीक बहें !

कल से तुमको इन सब पर 
करनी निगरानी जारी है
हम ही दोनों पर अब देखो
बस ज़िम्मेदारी भारी है !
बिल्कुल सही कहा मैडम
ऐसा ही होगा बस अब
कपालभाती थोड़ा कर
पीछे-पीछे आते  हम !

आँख तरेर घूरा तब हमने
अबके थी इनकी बारी 
बूढ़े हो गए तुम फिर भी
कपालभाती न कर पाते
पेट अंदर साँस हो बाहर
स्वामी रामदेव बतलाते
बेवकूफ न हमको समझो 
हम भी हैं चतुर -सयाने 

और खूब बिगाड़ो तुम इनको  
सब कारिस्तानी तुम्हारी है
इतने भोले तुम न बनो
सब हरकत मनमानी है
पहले तुमने बिगाड़े बच्चे
अब चाँद सूरज की बारी है...!’

                                  — उषा किरण




                                  


मंगलवार, 13 अक्तूबर 2020

तो सुनो...!


 पार्क, स्टेशन, सड़क हो 

या बाजार

ये जो तुम हर जगह मुझसे 

बीस कदम आगे चलते हो न

नाक की सीध में एकदम

सीना तान कर

सतर कन्धे

हथेली पर सूरज उगाए

और सोचते हो कि 

आगे हो मुझसे...?


गलत सोचते हो तुम

बिल्कुल गलत

मैं और बीस कदम 

अपनी मर्जी से पीछे होकर

कहीं छिप जाऊँ अगर

तो क्या हो 

सोचा है कभी ?


अपनी हथेलियों में ये जो तुम

सूरज की दिपदिपाहट लिए

दर्प से घूमते हो ,

तुम्हारे आँगन में ओस से भीगे

चाँदनी में नहाए महकते 

प्रार्थनारत ये हरसिंगार ,

पिंजड़े में चहकती मैना,

द्वारे चटकते गुलमोहर

और अमलतास की धमक

नाते-रिश्तों की सरगोशियाँ 

ये महफिलों और

उत्सवों की रौनकें 

आंगन में सजे इन्द्रधनुष 

खान - पान के वैभव

और सुकून की नीदें ...

ये सब भी छिप जाएंगी 

उसी पल !


लम्बे डग भरते

तुम जो ये सोचते हो न कि

तुमने मुझे पीछे छोड़ा हुआ है 

तो सुनो -

गलतफहमी है तुम्हारी 

सच तो ये है कि 

पीछे तुमने नहीं छोड़ा 

बल्कि...

मैंने ही अपने माथे का सूरज

तुम्हारी हथेली में रोप

तुमको आगे किया हुआ है ...!!

                                — उषा किरण 

फोटो : प्रणान सिंह की वॉल से साभार

मंगलवार, 15 सितंबर 2020

चिट्ठी

 



चलो  चिट्ठी लिखते हैं
तुम मुझे लिखना
मैं तुमको लिखूँगी
अत्र कुशलम् तत्रास्तु
से शुरू करेंगे
और अन्त में 
बड़ों को प्रणाम
छोटों को प्यार लिखेंगे
और बीच में 
ढ़ेरों सतरंगी रंग भरेंगे
फिर प्यार से 
होठों पर टिका 
जीभ से नमी दे
लिफ़ाफ़ा बन्द कर
उस पर तेरा नाम और
डायरी में ढूँढ कर 
पता लिखेंगे 
फिर चौखट पर टिक 
कई दिनों तक 
बेसब्री से 
जवाब का इंतजार करेंगे
और इस तरह 
कई दिन तक हम
एक दूसरे के 
खयालों की खुशबू में
भीगे रहेंगे...!!
                             - उषा किरण 


सोमवार, 7 सितंबर 2020

#तस्मै_ श्री_ गुरुवे_नम: ( अन्तिम भाग)🌸🌼🌸🌼☘️🌿

                 

मथुरा में पाँच साल पापा की पोस्टिंग रही ।बी. ए. में किशोरी रमण कॉलेज में एडमिशन लेकर बहुत सुखद अहसास हुआ डिग्री कॉलेज का स्वतन्त्र माहौल बहुत माफ़िक़ आया।कभी भी आने-जाने की व क्लास  से बन्क मारने की स्वतन्त्रता  बहुत सुकून देती थी।वहाँ की कैंटीन जैसे समोसे हमने कहीं नहीं खाए।मैं , मन्जु और बृजलता खाली पीरियड में समोसे खाते थे !

कॉलेज की बाउन्ड्री नीची थी और खाली पीरियड नें लड़किएं ग्राउंड में चहकती रहती थीं । कॉलेज के बाहर साइकिलों पर लड़के मंडराते रहते थे । वाइस प्रिंसिपल लीला मैडम बहुत कड़क पर्सनैलिटी थीं , हमेशा सिर के ऊपर बीच में गुलाब का फूल लगातीं थीं ,वो लड़कों को हड़काती रहती थीं । कॉलेज की व्हाइट यूनिफ़ॉर्म थी तो लड़के बाउन्ड्री की वॉल पर बड़ा- बड़ा 'विधवा-आश्रम’ लिख जाते थे।डॉ० सरोजनी मैडम प्रंसिपिल थीं उनका सब्जैक्ट हिन्दी था , वो प्राय: कभी भी  शौकिया महादेवी वर्मा पढ़ाने आ जाती थीं और पढ़ाते- पढ़ाते बड़ी रोमान्टिक हो जाती थीं ।हम सब खूब एक दूसरे को इशारे करते और मजे लेते ।लीला-मैडम,कुसुम सिंह मैडम,निर्मल मैडम आदि सभी की स्मृतियाँ आज भी सजीव हैं।मेरे भाग्य से उसी साल वहाँ पर ड्रॉइंग एन्ड पेन्टिंग खुल गया था जिसकी क्लास में मेरा सबसे ज़्यादा मन लगता था।बहुत जल्दी ही कुसुम सिंह मैडम की फेवरिट स्टुडेंट हो गई।वहाँ की सभी टीचर्स को नमन🙏 

मैं एम. ए. पेन्टिग से ही करना चाहती थी लेकिन वहाँ इसमें एम.ए.न होने के कारण मैंने अपनी फ्रैंड बृजलता के साथ संस्कृत में फ़ॉर्म भर दिया।कॉलेज में कैजुअल क्लासेज़ की व्यवस्था के तहत तीन टीचर्स की नियुक्ति की गई थी कुल पाँच बच्चे थे हम।ख़ूब मन लगता था क्लास में क्योंकि जहाँ भी ज़बर्दस्ती का क़ैद जैसा अनुशासन हो वहाँ दम घुटता था और यहाँ संस्कृत साहित्य और फिलॉस्फी की  क्लास में जो पेड़ों के नीचे  खुले में होती थीं आनन्द आता था ।वेद व भारतीय दर्शन की क्लास श्रद्धेय वनमाली शास्त्री जी लेते थे जिन पर मेरी अगाध श्रद्धा थी ।हालाँकि वे कभी भी स्कूल नहीं गए पर प्रकान्ड पन्डित थे।वे सचमुच में योगी ही थे।उन्होंने इतनी अच्छी तरह से गूढ़ ग्रन्थों को समझाया जो आज तक याद है।

एम. ए. फ़ाइनल में वे क्लास होनी बन्द हो गईं और मेरी फ्रैंड ने बृन्दावन में एडमिशन ले लिया पर मेरा बस से डेली सफर करने का मन नहीं था तो हमने शास्त्री जी से अनुरोध किया कि वो हमें घर पर पढ़ा दिया करें और उन्होंने स्वीकार कर लिया वे हमें रोज़ पढ़ाने आते थे हमने ऑप्शनल पेपर में फिलॉस्फी भरा था ।आचार्य जी का औरा इतना दिव्य था कि उनके पास बैठ कर पढ़ने में अलौकिक अनुभूति होती थी।जब पापा उनकी फ़ीस का लिफ़ाफ़ा पकड़वाते तो वे बेहद अपराध- बोध से भर जाते थे अत: जैसे ही पापा लिफाफा देने आते हम उठ कर चले जाते थे।

एग्ज़ाम को बस चार दिन रह गए थे और मीमांसा की किताब बाक़ी थी हमें बहुत घबराहट हो रही थी कई बार पढ़ने की कोशिश का पर समझ नहीं आ रहा था कुछ ! आचार्य जी ने कहा टेन्शन मत लो सब हो जाएगा।दो दिन पहले उन्होंने कहा कि आज मीमांसा कराएँगे तुम किताब बन्द कर रख दो और बस ध्यान से सुनती रहो।वो बोलते रहे हम सुनते रहे ।पूरी किताब पर डेढ़ घन्टे का लेक्चर देकर कहा कि बस एक बार पढ़ लेना और जो सुना- समझा है अपने विवेक से लिख आना ! हमने ऐसा ही किया !

बी.आर.कॉलेज ,आगरा में सेन्टर था तो पेपर वाले दिन सुबह ही आगरे के लिए निकल जाते थे ।फिलॉस्फी का पेपर बहुत अच्छा आया था लेकिन चार ही प्रश्न का उत्तर लिख पाए और घन्टी बज गई हमारी सासें रुक गई मानो...पर धड़ाधड़ लिखते रहे ! सब बच्चे चले गए कॉपी जमा करके ! एक टीचर भी चले गए पर दूसरे चुपचाप कुर्सी पर बैठे रहे न उन्होंने हमसे कॉपी माँगी न हमने दी ! हम बार- बार डर के उनको देख रहे थे वो गॉगल्स लगाए मुँह में पान दबाए शान्ति से बाहर देखते बैठे हमें किसी देवदूत से कम नहीं लग रहे थे ! पूरे बीस मिनिट एक्स्ट्रा लेकर हमने आन्सर पूरा लिखा कॉपी देकर सर को बार- बार थैंक्यू बोला वो मुस्कुरा कर कॉपी समेट कर चले गए ! 

जिंदगी भर उन अनजान टीचर को नहीं भूल सकी ! उस पेपर में दोनों सालों के सभी पेपर्स से सबसे ज्यादा मार्क्स आए ! उनसे मैंने सीखा कि टीचर का सम्वेदना- पूर्ण व्यवहार स्टुडेंट के मन में अगाध श्रद्धा व उदारता के प्रति आस्था के बीज बो देता है ।पूरी जॉब के समय एग्जाम की ड्यूटी में मैंने कभी भी स्टुडेंट से टाइम पूरा होने पर कॉपी नहीं छीनी अपितु उनके रिक्वेस्ट करने पर उन अनजान टीचर को याद कर कुछ टाइम एक्स्ट्रा भी दे देती थी और स्टुडेंट के प्रति सहृदय भी रहती थी।तो नमन आचार्य जी को और उन अनजान टीचर को और उनकी सम्वेदना को भी , 🙏

पापा का ट्रान्सफर फिर ग़ाज़ियाबाद हो गया और वहाँ पर एम एम एच कॉलेज में मैंने एम ए ,ड्रॉइंग एन्ड पेन्टिंग में एडमिशन ले लिया और मेरा बरसों का सपना पूरा हुआ।मैं और मेरी फ्रैंड लता घन्टों लाइब्रेरी में नोट्स बनाते थे।और के. डी. पान्डे सर को चैक करने के लिए देते थे तो सर चैक कर लौटाते समय नोट्स की तारीफ़ करते थे कुछ लड़कों ने हमसे एक दिन नोट्स माँगे हमने मना कर दिया तो चिढ़ कर एक दिन ब्लैक-बोर्ड पर लिख दिया "उषा किरण इज माई फ्रैंड” ।हम अपनी फ्रैंड्स के साथ बातों में मस्त थे तो नहीं ध्यान दिया ।

पान्डे सर ने क्लास में आते ही देखा और बोले अरे ये किसने लिखा है और ब्लैक बोर्ड साफ़ कर दिया ।हमने जैसे ही पढ़ा मारे ग़ुस्से और अपमान से हमारा मुँह लाल हो गया और हम रुआँसे होकर नीचे मुँह करके बैठ गए। आज से बयालीस साल पहले लड़के और लड़कियों की दोस्ती को अच्छा नहीं समझा जाता था।

सर ने हमें देखा तो बोले कि "अरे तुम क्यों परेशान हो रही हो कोई दोस्ती करना चाहता होगा कह नहीं पाया तो लिख दिया ।”

फिर कहा "तुम इतना क्या सोच रही हो देखना एक दिन तुम किसी ऊँची कुर्सी पर बैठी होगी और ये सब### लगे होंगे कहीं लाइन में !”

फ़ाइनल में हमारी शादी हो गई हमने बहुत कहा कि एम. ए. के बाद करेंगे लेकिन लड़का मिल चुका था और पापा चाहते थे कि रिटायरमेण्ट से पहले ही शादी कर दें तो हो गई शादी और हमने आर.जी.कॉलेज,मेरठ में ही एडमिशन ले लिया जहाँ शुरु में स्टुडेन्ट और टीचर्स ने हमें एकदम ही नकार दिया।न टीचर को हमारा काम पसन्द आ रहा था न ही कोई फ्रैंड थी । एम. एम. एच.कॉलेज में हम क्लास के बेस्ट स्टुडेंट थे ,कहानी और कविता भी छपती थीं तो क्लास में व टीचर्स में अलग प्रतिष्ठा थी , रुतबा था और यहाँ हमें कौड़ियों के भाव तोला जा रहा था ।हमने पढ़ाई के कारण हनीमून पर जाने के लिए भी मना कर दिया था ।टीचर्स की अवहेलना और तिरस्कार से आत्मविश्वास कीं धज्जियाँ उड़ गईं ...डिप्रेशन में आने लगे ...हर समय रोना आता था ।ऊपर से क्लास में हम अकेले मैरिड थे तो एक अलग ही प्रजाति के नजर आते थे ।नई शादी , बड़ी सी जॉइन्ट फैमिली और कॉलेज का स्ट्रैस बहुत अधिक था।तब मेरे हस्बैंड मुझे अपने दोस्त मेरठ कॉलेज के पेन्टिंग के प्रोफ़ेसर डॉ. आर. ए. अग्रवाल सर के पास ले गए जिन्होंने थ्योरी में मेरी मदद की।पूरे परिवार से बहुत अपनापन व प्यार मिल भाभी जी का सरल व प्यार भरी आत्मीयता सुकून देती थी तो बच्चे भी खूब घुल- मिल गए।

प्रैक्टिकल के लिए मेरठ कॉलेज के प्रोफ़ेसर  डॉ.दिनेश शर्मा सर और उनकी पत्नी डॉ. सुधा शर्मा मैडम जो आर. जी कॉलेज में ही प्रोफ़ेसर थीं उनसे भी उनका परिचय था तो उनके पास ले गए ।वो लोग ट्यूशन नहीं करते थे पर रिक्वेस्ट करने पर हमें पेन्टिंग सिखाने के लिए राज़ी हो गए ।हम उनके घर पर जाकर पेंटिंग सीखने लगे और बहुत जल्दी ही बच्चों से और उन लोगों से आत्मीयता हो गई। उन लोगों से न सिर्फ़ पेंटिंग सीखी और बहुत कुछ सीखा ।सुधा दीदी से अचार बनाने के व कुछ किचिन के टिप्स भी मिले और पूरे परिवार का स्नेह मिला । मेरठ में दो आत्मीय परिवारों सेघुलना -मिलना ,आना- जाना हुआ जो आज भी क़ायम है कॉलेज में भी कुछ दोस्त बन गईं और मन लगने लगा।पेन्टिंग में एम. ए. करते जिन गुरुजनों ने मदद की सभी को सादर नमन ।🙏

एम. ए. करते ही आर.जी .कॉलेज में ही ट्यूटर की पोस्ट पर हमारा सिलेक्शन हो गया और हमने टीचिंग की शुरुआत की।राका मैडम, सविता नाग मैडम, सुधा मैडम,सावित्री मैडम ,मृदुला मैडम,सुषमा मैडम के साथ स्टाफ़ रूम में साथ चेयर शेयर करते कितनी ख़ुशी मिलती थी बता नहीं सकते ।सभी टीचर्स का प्यार व आत्मीयता भरे व्यवहार के कारण खोया हुआ आत्मविश्वास दुगना होकर वापिस आया ।

सभी से भरपूर स्नेह व मार्गदर्शन मिला और आगे जाकर परस्पर मित्रवत् सम्बन्ध विकसित हुए।सबिता नाग मैडम ने "कृति आर्टिस्ट एसोसिएशन “ की स्थापना की तब उनके साथ कई शहरों में प्रदर्शनी लगाईं और कई वर्कशॉप अटैंड कीं ! हम कभी सुस्त पड़ते तो वे प्रोत्साहित कर पेन्टिंग बनवा लेती थीं ।डॉ. आर ए अग्रवाल सर के साथ पी-एच .डी .की और फिर मोदीनगर में जी डी एम पी जी कॉलेज नया खुला था उसमें परमानेन्ट जॉब लग गयाऔर उस कॉलेज की प्रथम टीचर बनने का सौभाग्य मिला !

एक बार मेरठ कॉलेज में सेमिनार अटैंड करने गई तो डॉ. आर ए अग्रवाल सर ने बातों ही बातों में कहा एक दिन आपको यहाँ आकर हैड की कुर्सी सम्भालनी है देखिएगा मैं आपको ही चार्ज सौंपूँगा। सत्रह साल बाद मेरा ट्रान्सफर मेरठ कॉलेज में हो गया और तीन साल बाद अग्रवाल सर ने मुझे जब चार्ज सौंपा तो वो ही बात याद दिलाई कि देखिए मैंने पहले ही कह दिया था कि एक दिन हैड का चार्ज आपको ही सौंपूँगा ! पान्डे सर एक बार प्रैक्टिकल के एग्जामिनर  बन कर डिपार्टमेन्ट आए तो बोले -

“मुझे बहुत गर्व है तुम पर जहाँ का मैं स्टुडेन्ट था आज तुम वहाँ कि हैंड ऑफ दि डिपार्टमेंट हो !” उन्होंने उस दिन क्लास में जो उद्घोषणा की थी वो भी याद दिलाई और बधाई दी। आज सर नहीं हैं पर मैं उनको मन ही मन श्रद्धांजलि देती हूँ ।

मैं चार्ज लेते ही बहुत बीमार रही पूरे वर्ष भर इलाज चला तब डॉ आर ए अग्रवाल सर ने रिटायर होने के बाद भी कई दिन चलने वाले हर प्रैक्टिकल में आकर मदद की और हमेशा  हर समस्या का निराकरण किया। डॉ सुधा मैडम व डॉ दिनेश सर कुछ साल बाद अमेरिका चले गए थे पर जब भी इंडिया आते हैं मैं अब भी उनसे बहुत कुछ सीखती हूँ वाक़ई वे बहुत अच्छे आर्टिस्ट हैं।

इस साल रिटायर हो गई ।पुरानी यादों के साथ अपने सभी गुरुजनों को ये मेरी भावान्जलि है ,! सच में मुझे मेरे गुरुओं का आशीर्वाद बहुत फला है !

तो सभी गुरुजनों को मेरा धन्यवाद !

धन्यवाद मेरे जीवन को दिशा देने के लिए!

धन्यवाद मेरे सपनों को पूरा करने में मेरी मदद करने के लिए !

और मुझे मान-सम्मान पूर्ण जीवन यापन में मदद करने के लिए धन्यवाद और नमन !🙏

और अन्त में मेरे उन सभी आध्यात्मिक गुरुओं विशेषत:पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी और पूज्य स्वामी सुबोधानन्द जी को मेरा नमन जिन्होंने अज्ञान से ज्ञान की तरफ़ ले जाने वाली राह दिखाई ...!

                             गुरु बिन ज्ञान न उपजै,

                             गुरु बिन मिलै न मोष।

                             गुरु बिन लखै न सत्य को,

                             गुरु बिन मिटे न दोष॥

               सभी गुरुओं के चरणों में मेरा सादर नमन 🌼🌸🌼🌸🌼🌸🌼🌸🙏