मात्र बच्चे, पति, पत्नि, रिश्तेदारों से ही परिवार पूरा नहीं होता बल्कि गृहस्थी की नींव में जाने कितनी अन्य महत्वपूर्ण इकाइयों का योगदान मिल कर उसकी नींव को सुदृढ़ बनाते हैं।
परिवार को सुदृढ़ व सुचारू रूप से चलाने में हमारे सहायकों का भी बहुत योगदान होता ही है। हमारी तरक्की, हमारी खुशी, हमारे चैन, विश्राम, सुचारू व्यवस्था, समाज में रुतबा, शाही खान-पान में भी इनका योगदान है ।औरों का तो नहीं जानती लेकिन मेरी जिंदगी में तो हमेशा रहा ही है ये मैं खुले दिल से स्वीकार करती हूँ।
जब- जब छुट्टी करने या काम छोड़ देने से इनका सहयोग नहीं मिला तो हमेशा मेरी गाड़ी पटरी से उतर जाती। तब आराम, बढ़िया पकवान, हॉबीज , सुव्यवस्था, पार्टी वग़ैरह मेरी दिनचर्या से गायब हो जाते रहे।
दूसरे शहर जाकर जॉब करने, बच्चों के पालन-पोषण, रुटीन कामों के बाद अपने आराम , मनोरंजन, पेंटिंग व लेखन के अपने शौक आदि को जारी रख पाने लायक समय व शक्ति को बचा कर रख पाने में इनका बहुत बड़ा योगदान रहा है।
पहले वॉशिंग मशीन तो होती नहीं थीं तो जो मेरे घर के कपड़े प्रैस करने के लिए ले जाते थे शराफत मियाँ, उनकी ही बीबी को हमने कपड़े धोने पर लगा लिया। सब उनको बड़ी बी ही कहते थे।उनके सात बच्चे थे। तीन लड़के और चार लड़कियाँ। पाँचवी उनकी देवरानी की थी ,जब उसका इन्तकाल हुआ तो उसे भी बड़ी बी ने ही पाल लिया इस तरह उनकी कुल आठ संतानें थीं।
उनके लड़के जितने सुस्त और औंघियाए हुए थे बेटियाँ उतनी ही चटर- पटर व तितली सी रंगीन व फुर्तीली। वे प्राय: साथ- साथ जोड़ों में आती थीं।और जब तक मैं कपड़े लिख कर गठरी बनाती वे कमरे की चौखट पर बैठी, आँखें गोल-गोल घुमाती कुछ न कुछ मुझसे पूछती रहतीं या अपनी सुनाती रहती थीं।
उनकी माँ बड़ी बी भी कम बातूनी नहीं थीं, तो मौके- बेमौके हमें पकड़ कर वो भी अपनी कुछ न कुछ दास्तान सुनाने लगतीं ।वे दिन मेरे बेहद व्यस्तता भरे थे। बच्चे छोटे थे तो जॉब, गृहस्थी और बच्चों के कामों में सारे दिन चकरघिन्नी बनी रहती। लेकिन उसको इग्नोर नहीं कर सकती थी वर्ना न जाने कब एक ईंट मेरी गृहस्थी की सरक जाए और मैं ही अगले दिन से थपकी लेकर धमाधम ...। यदि कभी उनकी बात पर तवज्जो न दे पाऊं तो कह देतीं 'ऐ लो जी तुमाए पास तो टैम ही नहीं होता हैगा हमारी बात भी सुनने का।’
मैं हंस कर कहती 'अरे सुन तो रही हूँ बड़ी बी, सुनाती जाओ काम हाथ से कर रही हूँ पर कान तुम्हारे ही हैं !’
तो...पता नहीं उन माँ बेटियों को मुझे ही अपने इतने किस्से जाने क्यों सुनाने होते थे ये मुझे आजतक समझ नहीं आता। बड़ी बी से उन दिनों मैंने अपने कई मलमल के दुपट्टे लहरिया में रंगवा कर चुनवाए थे और उनका बेलन बना कर सहेजना सीखा था।जो सालों मेरे पास रहे।
हम अपने पुश्तैनी घर की पहली मंजिल पर रहते थे और नीचे की मंजिल पर हमारे जेठ जी सपरिवार रहते थे। तीनों कमरों और किचिन के बीच बड़ी- बड़ी दो छतें थीं। बड़ी बी किचिन के सामने की छत पर ही कपड़े धोना पसन्द करती थीं और प्राय: हमारे कुकिंग टाइम के समय ही कपड़े धोने आती थीं।
एक दिन हम दूसरे कमरे में थे कि बड़ी बी के चीखने की आवाज आई-' हाय अल्लाह ...बचाओ भाभीईईईईईईई...अरे भाभी बचाओ....!’ हम बदहवास हो तेजी से ताबड़तोड़ भागे। जाकर देखते ही हमारे होश गुम हो गए। एक बहुत ही मोटा सा झज्झू सा बन्दर बड़ी बी के कन्धों पर सवार होकर दोनों हाथों से उनके बालों को पकड़ कर जोर - जोर से झिंझोड़ रहा था, साथ ही खौं- खौं करता जा रहा था। सारा मंजर देख हमें तो जैसे काठ मार गया, लेकिन हमारे हस्बैंड भी चीख पुकार सुन कर आ गए तो उन्होंने जल्दी से एयर गन से हड़का कर बन्दर को भगाया।वहाँ पर बन्दर बहुत आते थे तो हम डंडों व एयर गन का इंतजाम सदा रखते थे।
बदहवास सी हाय- तौबा करती, रोती- पीटती बड़ी बी को उठा कर पानी, शरबत पिला कर शान्त किया। और चैक किया कि कहीं काटा तो नहीं, या नाखून तो नहीं मारा।शान्त होते ही बड़ी बी ने मार बन्दर को गाली देनी और कोसना शुरु कर दिया - 'ऐ मुआ बदमास, नासपीटा देखो तो भाभी कैसा हमें पेड़ सा हिला गया। तौबा…तौबा…चक्कर आ रे अभी भी...।’
तो हमने हंस कर कहा ' अरे अब तो वो भाग गया तभी देतीं गाली...देना था न चाँटा घुमा कर।’
'ऐ जाओ भाभी, तुम भी हमारा ही मख़ौल उड़ा रईं , हाँ नईं तो ...ऐसी- कैसी हौल हो रई पेट में ...और जो वो काट लेता तो ? भाभी सिर घूम रा अब न धुलेंगे हमसे कपड़े आज।’
हमने खिला- पिला कर उनको विदा किया और भीगे पड़े कपड़ों को धमाधम निबटाते हुए मुए बन्दर को किटकिटा कर दो-चार गाली हमने भी दे डालीं।आज भी मेंहदी लगे बिखरे, झौआ से बालों में बदहवासी से चीखती और उनके कन्धों पर बैठे बन्दर का वो रौद्र रूप का जलवा जब भी याद आता है तो बरबस हंसी आ जाती है।हंसी की वजह है कि उस पल दोनों एकदम समानरूपा हो रहे थे। जानती हूँ बुरी बात है, हँसना नहीं चाहिए, मैं होती उनकी जगह तो शायद मेरा तो हार्ट फेल ही हो जाता !
एक दिन आते ही बड़बड़ाने लगीं-'आज तो भाबी सुरैया को खूब छेत दिया हमने ...अरे न हाँडी पकानी, न रोटी से कोई मतलब, न प्रैस के कपड़ों को हाथ लगाती...बस सारे दिन मरी सफाई ही करे जाए है ...बालकन को खेलने दे, न खाने दे कि जाओ बाहर खेलो जाकर, घर गंदा कर दोगे फिर से। आज तो पिट ली, म्हारे हाथों।’
'अरे तो मारा क्यों बेचारी को ? सफाई रखना तो बहुत अच्छी बात है न ...च्च बेचारी...गलत बात है।’
'अरे तुम न जानो हो भाबी, सिगरे दिन की सफ़ाई किन्ने बताई लो भला ? बालक नन्हें खाबें - पीबें भी न...खेलने भी न देती। अरे हमने कही बाल बच्चों वाले भर में किन्ने बताई इतनी सफाई...लो भला...कम्बख्तों के रहवे है इतनी सफाई तो।’
हम उसकी बात सुन कर और अपनी सफाई की सनक सोच कर सन्न रह गए…चुप रहने में ही खैरियत समझी।
दूसरे नम्बर की बेटी रुखसाना बहुत चटर- पटर थी। एक दिन मैं कपड़े लिख रही थी तो वो चौखट पर बैठी मटक- मटक कर गा रही थी `मार गई मुझे तेरी जुदाई….’ सहसा गाते- गाते बोली-`पता है हम सब तुमको न, रेखा कहवे हैं और तुम्हारी मिट्ठू को मन्दाकिनी कहवे हैं, बिल्कुल उनके सी ही सकल है तुम दोनों की।’
‘अच्छा पापा और चुन्नू को क्या कहते हो?’ मिट्ठू ने मजा लेते हुए पूछा।
'तुमाए पापा की मूँछें बिल्कुल जितेन्दर जैसी हैं और भाई तुमारे तो मिथुन जैसे लगे हैं।’
तब हमारे जितेन्दर के बाल भी खूब घने थे , मूछें भी ठीक-ठाक ...लेकिन सात साल के चुन्नू की तुलना मिथुन से सुन कर बहुत हंसी आ रही थी। वो खिलंदड़ी ऐसे ही दुनिया जहान की बातें सुनाती बड़ी देर खेलती- खाती बैठी रहती।
हमारे घर से प्रैस के कपड़े ले जाने और वापिस देने का काम वो ही करती।किसी और के आने पर उनसे लड़ती थी। ईद पर वे लड़कियें नए कपड़ों में खूब सज- धज कर इठलाती हुई मिठाई का डिब्बा लेकर आतीं। मैं बड़ी बी को बहुत मना करती कि मिठाई न भेजा करें पर वे नहीं मानती थीं। मैं भी उन बच्चियों को प्यार से ईदी देकर विदा करती।
बहुत कम उम्र में ही दो- दो लड़कियों के एक साथ निकाह कर दिए गए। बड़ी बी से उनकी खैरियत पूछती रहती तो उनके सुख- दु:ख की खबरें मिलती रहती थीं। उनकी दो लड़कियों की शादी के बाद हम लोग दूसरे घर में शिफ़्ट हो गए जो उनके घर से दूर पड़ता था अत: लड़के या शराफत मियाँ ही कपड़े लाते, ले जाते रहे। बड़ी बी भी कभी-कभी मिलने आ जाती थीं। कभी सूट और कभी अचार माँग कर ले जाती थीं। एक दिन हंस कर बोलीं- `अरे, तमने तो वहाँ की तरहे यहाँ भी खूब फूल पत्ते लगा रक्खे... पता है हमाए घर में इसी से सब बच्चे तुमको पत्तोंवाली कहवे करे है।’
'अच्छा...ये नहीं बताया कभी रुखसाना ने?’ मुझे हंसी आ गई उसके वाक्-चातुर्य की याद करके।
अचानक बड़ी बी की आँखें बरसने लगीं, ` कम्बख्त उसका मरद पी के बहुत मारे है बेचारी रुखसाना को। तुम तो देखोगी तो पहचानोगी भी नहीं अपनी रुखसाना को...ऊपर से दो-दो लड़किएं और हो गईं, तो मरी सास भी न जीने देवे है।’ सुन कर मेरा मन बहुत दुखी हो गया।बहुत देर तक बड़ी बी को हौसला देती रही।अपना घर बनवा कर अब हम और दूर आ गए तो उन लोगों का आना -जाना अब बन्द हो गया है।
वे छोटे- छोटे बच्चे जो सामने पैदा हुए, हमारे बच्चों के ही समानान्तर पले, बढ़े उनसे बहुत ममता हो गई थी।आज उनका सुख-दुख अन्दर तक छू जाता है। सोचती हूँ-
`इस प्यारी- प्यारी दुनियाँ में क्यों अलग- अलग तक़दीर...’
प्रार्थना करती हूँ कि हे प्रभु सबके बच्चों को सुखी रखना...सबको स्वस्थ रखना।🙏
—उषा किरण
चित्र; गूगल से साभार
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 08-07-2021को चर्चा – 4,119 में दिया गया है।
जवाब देंहटाएंआपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।
धन्यवाद सहित
दिलबागसिंह विर्क
बहुत आभार!
हटाएंकामगार की महत्ता समझाता सार्थक लेखन।
जवाब देंहटाएंजिज्ञासा जी बहुत आभार 😊
हटाएंउषा जी, बहुत ही सहृदयता से लिखा गया ये संस्मरण घरेलू सहायिका बड़ी बी के बहुरंगी व्यक्तित्व से परिचित करा गया। हमारे ये सहायक अपनी कर्मठता और वफादारी से घर के सदस्य जैसे ही हो जाते हैं। बड़ी बी और उनके प्रखरबुद्धि नौनिहालों के संवाद मन मोह गए। घरेलू सहायकों को यदि आप जैसे उदार लोग मिलते हैं तो उनके शोषण की संभावना कम होती है। भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई 👌👌💐💐🙏🙏
जवाब देंहटाएंइतने प्यार से पढजकर प्रतिक्रिया देने के लिए आपका हृदय से आभार रेणु जी😊
हटाएं😂😂😀😀
जवाब देंहटाएंअरे तुम न जानो हो भाबी सिगरे दिन की सफ़ाई किन्ने बताई लो भला ? बालक नन्हें खाबें - पीबें भी न...खेलने भी न देती। अरे हमने कही बाल बच्चों वाले भर में किन्ने बताई इतनी सफाई...लो भला...कम्बख्तों के रहवे है इतनी सफाई तो।’ हम उसकी बात सुन कर अपनी सफाई की सनक सोच कर सन्न रह गए और चुप रहने में ही खैरियत समझी।👌👌👌👌👌😂😀🙏🙏
रेणु जी गहराई से सोचें तो कुछ सच्चाई भी है उनके कथन में…बाल- बच्चे होंगे तो घर बिखरेगा भी और गन्दा भी होगा वर्ना तो ….यही सोच कर बहस न कर चुप हो गई। पुरानी कहावतों के पीछे कुछ न कुछ लॉजिक तो होता ही था😊
हटाएंबहुत बहुत सुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंबहुत आभार आपका🙏
हटाएंबहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद अनुराधा जी !
हटाएंक्या बात उषा बी , ये बड़ी बी का संस्मरण बहुत जोरदार रहा । लिखती आप ऐसा हैं कि ऐसा लगता कि सब आँख के सामने चल रहा । बंदर का किस्सा पढ़ कर सोच रही कि यदि सच ही काट लिया होता तो क्या होता । रोचक
जवाब देंहटाएंसच में ये दहशत तो मुझे आजतक होती है कि काट लेता तो क्या होता…बहुत शुक्रिया 😊
हटाएंसुन्दर सृजन
जवाब देंहटाएंबहुत आभार सुशील जी !
हटाएंवाह! बहुत बढ़िया।
जवाब देंहटाएंबहुत धन्यवाद!
हटाएंआपकी "बड़ी बी" ने हमारे बचपन की "धोबिन दादी" की अनायास ही याद दिला दी। तब हम लोग सफ़ाईकर्मी, दाई-नौकर, नियमित आने वाले फेरी वाले को भी किसी ना किसी रिश्ते के नाम से ही बुलाते थे- बुआ, चाची, चाचा, दादी-दादा आदि।
जवाब देंहटाएंबन्दर वाली घटना दुःखद होते हुए भी हंसी ही आती है। वर्तमान के (पटना साहिब)मेरे अस्थायी निवास के आसपास भी इनका हड़बोंग आये दिन मचा रहता है।
आपके संस्मरण वाली इस रचना की ख़ास बात ये है कि पाठक हर पंक्ति या कथन के साथ स्वयं को correlate कर के उसे visualize आसानी से कर पा रहा है।
`इस प्यारी- प्यारी दुनियाँ में क्यों अलग- अलग तक़दीर...’- आपकी इस पंक्ति में "तक़दीर" के बदले कुछ हद तक उनकी मानसिकता भी दोषी हैं। अब देखिये ना, आपकी दो ही संतान हैं- चुन्नू और मिट्ठू और उनकी ... रुखसाना समेत सात। सोच के भी पसीना निकलता है। हम तो एक ही संतान के लालन-पालन में ताउम्र परेशान रहे और बड़ी बी .. सात-सात .. और एक मृत देवरानी की भी-कुल आठ। अब एक तो कपड़े सफ़ाई-प्रेस का काम और इतने बच्चे, वो भी शायद बेटे के चक्कर हों कहीं .. गरीबी और बहुतायत में बच्चे .. नीम और करेले वाली बात हो जाती है .. शायद ...
इतने मनोयोग से पढ़ कर विस्तृत प्रतिक्रिया देने का धन्यवाद सुबोध जी। आपने सही कहा हर तरह से सम्पन्न लोग अब एक ही बच्चे तक सीमित हो रहे हैं परन्तु ये लोग जरा नहीं सोचते। परन्तु बच्चों की दुर्दशा पर तरस तो आता ही है।
हटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंअच्छा संस्मरण. न जाने कितनी बड़ी बी हर गली मोहल्ले में अब भी मिल जाएँ.
जवाब देंहटाएंहाँ शिखा सभी की स्मृतियों में ऐसे न जाने कितने किरदार होंगे …शुक्रिया
हटाएंकथा कहने की शैली रूचि जगाती है पढ़ने में.
जवाब देंहटाएंरोचक संस्मरण...
बहुत आभार वाणी जी !
हटाएंवाह! गजब का संस्मरण जिसमें हमारे काम में सहयोग करने वालों के प्रति समर्पित सम्मान का भाव और अनपढ़ कहे इन्हीं के कथ्य कितने सटीक होते थे अनुभव के आधार पर ।
जवाब देंहटाएंशानदार संस्मरण।
रोचकता से भरपूर।
शैली लाजवाब।
आपका बहुत आभार!
हटाएंबहुत बढ़िया संस्मरण, उषा दी।
जवाब देंहटाएंबहुत आभार ज्योति जी😊
हटाएंबहुत ही अच्छी रचना, अनुभव का इतनी खूबसूरती से ढालने और हमें इतनी सुंदर रचना पढ़वाने के लिए बहुत बधाई
जवाब देंहटाएंअलकनंदा जी और इतने प्यार से पढ़ने का बहुत शुक्रिया 😊
हटाएंबहुत रोचक शैली में लिखा आपने बड़ी बी संस्मरण जो आरम्भ से अंत तक बांधे रखता है ।
जवाब देंहटाएंमीना जी बहुत शुक्रिया 😊
हटाएंबहुत सरस सुन्दर संस्मरण
जवाब देंहटाएंबहुत आभार मनोज जी😊
हटाएंमंत्रमुग्ध करती रचना - -
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर सृजन।
बहुत आभार आपका
हटाएंपूर्ण प्रवाह मे।
जवाब देंहटाएंपढ़ कर प्रतिक्रिया देने का शुक्रिया
हटाएंबहुत ही शानदार संस्मरण... दिल को छू जाने वाला
जवाब देंहटाएंबहुत धन्यवाद 😊
जवाब देंहटाएंहृदयस्पर्शी और रोचक संस्मरण पढ़कर मन प्रसन्न हो गया। उषा जी यही जीवन है। कुछ न कुछ ऐसा जरूर होता रहता है जिस पर हमारा कोई बस नहीं होता।
जवाब देंहटाएंबेहतरीन और सुंदर संस्मरण मैम
जवाब देंहटाएं