ताना बाना

मन की उधेड़बुन से उभरे विचारों को जब शब्द मिले

तो कुछ सिलवटें खुल गईं और कविता में ढल गईं

और जब शब्दों से भी मन भटका

तो रेखाएं उभरीं और

रेखांकन में ढल गईं...

इन्हीं दोनों की जुगलबन्दी से बना है ये

ताना- बाना

यहां मैं और मेरा समय

साथ-साथ बहते हैं

शनिवार, 12 मई 2018

नटखट- चॉंद


रात बारिश की
नन्हीं उंगली पकड़
नीचे उतर आया
नटखट-चॉंद
चलो 
नाव में बिठा कर
वापिस पहुंचाएं .

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