ताना बाना

मन की उधेड़बुन से उभरे विचारों को जब शब्द मिले

तो कुछ सिलवटें खुल गईं और कविता में ढल गईं

और जब शब्दों से भी मन भटका

तो रेखाएं उभरीं और

रेखांकन में ढल गईं...

इन्हीं दोनों की जुगलबन्दी से बना है ये

ताना- बाना

यहां मैं और मेरा समय

साथ-साथ बहते हैं

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026





 26 सितम्बर - उस दिन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर , दिल्ली में सिर्फ मेरी पुस्तक "लाल- पीली लड़की” का विमोचन मात्र नहीं था, बल्कि मेरे लिए एक उत्सव था- रंगों और शब्दों से बनाई कृतियों का उत्सव और मैं उस उत्सव को जी रही हूँ अभी तक , जैसे वो सूफी लोग नाचते हैं न गोल- गोल एक सफ़ेद लम्बा चोंगा पहन कर, मैं भी खुद में मगन नाच रही हूँ वृत्ताकार…अपने भाव- जगत में मगन…! बस फर्क ये है कि मेरा चोंगा सफेद नहीं है रंग- बिरंगा है। मेरी एक दुनिया है जिसे मैंने रंगों, शब्दों और सुरीली स्वर- लहरियों से सजाकर , नकारात्मकता व भीड़ से दूर रहकर , जब मौका मिला जीवन को उत्सव की तरह जीने की कोशिश की और अब अध्यात्म की धारा में प्रवाहित होने का प्रयास चालू है।

कभी मैंने अपनी कहानी "पीला- दरवाजा “ कहीं छापने के लिए भेजी तो सम्पादक महोदय ने लौटाते हुए कहा " आपकी कहानी में फिलॉस्फी नहीं है “

…मतलब ? एक गर्भवती युवा स्त्री जिसका पति चुपचाप बिना बताए भागकर साधु बन गया , जिसका सालों पता नहीं कि वह जिन्दा है या मर- खप गया , यदि आपको उस स्त्री की दमनकारी तीखी घुटी चीख की विकट त्रासदी में, पीले दरवाजे के पीछे घुटी जिंदगी में कोई ग्लैमरस फिलॉस्फी नहीं नजर आई तो आप मना कर देते, पर ऐसा तिरस्कृत करता सा निर्णय…?

खैर आपको पूरा हक है यह अधिकार आपके पास है , आप सम्पादक हैं, तो सब चलता है। लेकिन पीला दरवाजा कहानी पर लोकार्पण वाले दिन आ. विदुषी अनामिका जी ने जिस तरह रंगों में डुबकी मार पहले लाल व पीले रंग की खूबसूरत समीक्षा की वह कोई ऐसा व्यक्ति ही कर सकता है जो रंगों के प्रति सम्वेदनशील हो और फिर मेरी कहानी " पीला - दरवाजा “ के पीले रंग को थामा और उसकी फिलॉस्फी पर गहन चर्चा की , मैं उन सम्पादक महाशय को याद कर रही थी , सोच रही थी कि कोई उनको सुनवाए, समझाए कि फिलॉस्फी कहानी में ढूँढने के लिए उससे गहरा सम्वाद करना होता है और यह संवाद वही कर सकता है जिसने जीवन के सब रंगों को आत्मसात किया हो।

अनामिका जी ने पीला दरवाजा कहानी पर बात करते समय "The Yellow Wallpaper” कहानी का जिक्र किया —यह अमेरिकी लेखिका Charlotte Perkins Gilman की प्रसिद्ध कहानी है, जो पहली बार 1892 में प्रकाशित हुई थी। आज मैंने वह कहानी पढ़ी, कहानी मन को छू गई। मैं उसका हिन्दी में अनुवाद देने का प्रयास कर रही हूँ आप भी पढ़ें, निश्चित ही ऐसी कहानियाँ हमें समृद्ध करती हैं-


The Yellow Wallpaper

(कहानी का सार)

कहानी की नायिका एक महिला है जो बच्चे के जन्म के बाद मानसिक और भावनात्मक परेशानी से गुजर रही है। उसका पति John, जो डॉक्टर है, उसे आराम करने की सलाह देता है और उसे एक पुराने घर के ऊपर के कमरे में लगभग अलग-थलग रखता है।


उस कमरे की दीवारों पर पीले रंग का विचित्र वॉलपेपर है। शुरुआत में नायिका को उसका पैटर्न बदसूरत और परेशान करने वाला लगता है। लेकिन धीरे-धीरे वह उस वॉलपेपर को बहुत ध्यान से देखने लगती है।

उसे लगता है कि वॉलपेपर के पीछे एक स्त्री फँसी हुई है, जो बाहर निकलने की कोशिश कर रही है। जैसे-जैसे नायिका स्वयं अकेली, नियंत्रित और कैद महसूस करती है, वह उस स्त्री से अपना संबंध जोड़ने लगती है।

अंत में वह वॉलपेपर फाड़कर उस स्त्री को मुक्त करने की कोशिश करती है—और प्रतीकात्मक रूप से अपने भीतर की कैद से भी मुक्त होने का प्रयास करती है।

कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात

यह केवल मानसिक बीमारी की कहानी नहीं है। पीला वॉलपेपर उस सामाजिक व्यवस्था का प्रतीक है जिसमें स्त्री की स्वतंत्रता, रचनात्मकता और अपनी इच्छा को दबा दिया जाता है।

नायिका स्वयं लेखिका है, लेकिन उसका पति उसे लिखने तक से रोकता है। इसलिए वॉलपेपर धीरे-धीरे उसके लिए एक ऐसी दुनिया बन जाता है जिसमें उसकी दबाई हुई चेतना दिखाई देने लगती है।

“दीवार के पीछे फँसी स्त्री” वास्तव में स्वयं नायिका का ही प्रतिबिंब है।

इस कहानी में स्त्री की आंतरिक स्वतंत्रता, पहचान और सामाजिक बंधनों के स्तर पर एक दिलचस्प साहित्यिक संवाद बन सकता है।


फोटो; 

1- पीला दरवाजा कहानी पर बनाई पेंटिंग 

2-अपनी एक पेंटिंग की फोटो दे रही हूँ , यहां आप लाल रंग को मानसिक रूप से पीले में कन्वर्ट कर लीजिएगा 😊

शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

फलक

 



तुम देना मुझे एक कोरा फलक

मैं  धनक के रंगों में उंगली डुबो कर

बना दूँगी सब्र और सुकूँ से रौशन

एक नई कायनात

एक ऐसा जहाँ, जहाँ वे सब होंगे

जिनका सुकून, छत और जमीन 

छीनी जा चुकी है वहशियाना हवस 

और लालच के हाथों

मैं अपनी तूलिका से बना दूँगी वहाँ 

महकते फूल सितारे दमकता चाँद 

और खूब सारे हंसते खिलखिलाते 

चेहरे मासूम बच्चों के…!!

—उषा किरण 

बुधवार, 4 मार्च 2026

होली


 🩷💚💛💙🧡💜❤️🩵



प्रेम करुणा सद्भाव का ऐसा रंग बनाएं

सब रंगें जिसमें न कोई भेदभाव रह पाए

न कोई भेदभाव रह पाए, भीगें प्रेमरस में

बम गोलियों को झोंके होलिका दहन में


तेरे मेरे की न होवे अंधाधुंध होड़ बावली 

हम सब पहले खेलें रंग फिर मिल खाएं 

गुझिया केक सिवईं और दार नी पोरी 

आओ हम सब मिल इक ऐसा जग बनाएं 

बच्चे हों बेख़ौफ़ नित नए इन्द्रधनुष रचाएँ 


हाथों में हों  हाथ आँखों में विश्वास जगे,

सूखे मन में फिर से आशा का पलाश जगे।

मन के आँगन में मानवता के दीप जलाएँ

मन का आकाश धुले द्वेष की धुँध छँट जाए


प्रेम करुणा सद्भाव का ऐसा रंग बनाएं

सब रंगें जिसमें न कोई भेदभाव रह पाए

न कोई भेदभाव रह पाए, भीगें प्रेमरस में

"सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:”

तन- मन भीगे प्रेम में हम मगन हो गाएँ !!

—उषा किरण 

फोटो; AI की मेहरबानी 😊

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

फ़िल्म तेरे इश्क़ में — मेरे चश्मे से


हाँ तो… यह बनारस की पृष्ठभूमि में शंकर और मुक्ति के प्रेम की कहानी है। फ़िल्म की शुरुआत काफ़ी रोचक तरीके से होती है।

मुक्ति एक मनोविज्ञान की रिसर्च स्कॉलर है, जिसका पी-एच.डी. का वाइवा चल रहा होता है। उसका शोध विषय - "बिगड़े व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक तरीकों से सुधारना” है। क्या किसी बिगड़ैल व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक तरीकों से सुधारा जा सकता है।

उसी समय शंकर वहाँ आकर बेहद गुंडागर्दी करता है और पूरा मामला बिगाड़ देता है। टीचर्स बेहद नाराज हो जाते हैं । मुक्ति इसे एक चुनौती की तरह लेती है और ठान लेती है कि वह हर कीमत पर शंकर को सुधारेगी, ताकि उसकी थीसिस पास हो जाए और उसे डिग्री मिल सके।उसे सुधारने के क्रम में शंकर को उससे जुनून की हद तक प्यार हो जाता है… और इसी तरह कहानी आगे बढ़ती है।

कृति सैनन की खूबसूरती ने मुझे बाँधे रखा, वरना कहानी कोई बहुत खास नहीं है। कथानक पर ध्यान दें तो फ़िल्म में मुक्ति का चरित्र कुछ भटका-सा लगता है।एक कलेक्टर की बेटी, जो अपने और एक गुंडे-मवाली के बीच के अंतर को समझते हुए शंकर के प्यार को अस्वीकार कर आगे बढ़ जाती है, अचानक शंकर की हालत देखकर प्यार में या गिल्ट में इस कदर पागल हो जाती है कि फेरों से उठ जाती है। वह खुद को नशे में इस तरह झोंक देती है कि न तो उसे अपनी परवाह रहती है, न मरते पिता की, न समझदार और प्रेम करने वाले पति की, न ही पेट में पल रहे बच्चे की।

एक अपराधबोध (गिल्ट) क्या सचमुच इतना अटूट प्यार बन सकता है?

क्या प्यार इतना ख़ुदगर्ज़ हो सकता है?

आज ऐसे ही जुनूनी, मर्यादाविहीन , ख़ुदगर्ज़ , विकृत इश्क अख़बारों में दर्ज नहीं हो रहे हैं?

कई जगह फ़िल्म तर्कसंगत नहीं लगती। बाद में डिलीवरी के समय खून से लथपथ मुक्ति का दृश्य इतना लंबा खींचा गया है कि मन घबरा उठता है।

वह सब अलग बात है, पर मेरी सुई जाकर तो अटकती है—बनारस के घाट पर।

शंकर के प्रेम की कीमत चुकाते पिता की मृत्यु हो चुकी है।उनके अंतिम संस्कार के लिए वह बनारस के घाट पर अधमरा-सा बैठा है। तभी एक पंडित उसे रोककर कहता है—

“वाह रे भोले, दुनिया को देता है, खुद को ही नहीं दे पाया—मुक्ति?”

“मुक्ति नाम है उसका। चाहे मर या मार—न मिलेगी।”

“प्रेम में मृत्यु है, मुक्ति नहीं।”

शंकर तड़पकर कहता है—

“बचा लो मुझे… यदि मरकर भी दर्द कम नहीं हुआ तो क्या करूँगा?”

पंडित कहता है—

“दर्द तो तेरा कैसे भी कम नहीं होगा, किसी का कम नहीं होता। उठ और अपने प्यार के ताप को पास से देख। अपने बाप का जलता सिर देख…हाथ-पैर, दिल गुर्दा सब जलते देख। 

मर जाओगे, पंडित, मुक्ति नहीँ मिलेगी, न यहां और न हि वहां…

मुक्ति के पीछे भाग मत। अपने इश्क़ में इतना जल कि मुक्ति तेरे पैरों में गिरकर भीख माँगे कि स्वीकार कर लो मुझे।

और बाकी तू चिंता मत कर—बनारस तेरा पिंडदान कर देगा। हर आशिक़ का करता है!”

हीरोइन का नाम है मुक्ति, हीरो का नाम है शंकर, और स्थान है बनारस का मणिकर्णिका घाट—मेरा दिमाग़ बस यहीं अटक गया है…

पंडित कहता है—

“वाह रे भोले, दुनिया को देता है, खुद को नहीं दे पाया मुक्ति।”

“प्रेम में मृत्यु है, मुक्ति नहीं।”

“मुक्ति के पीछे भाग मत…”

फ़िल्म सामने चल रही थी और मेरे मानस में सती-प्रकरण चल रहा था— 

प्रेम में पति का अपमान सहन न कर पाने पर सती जल गईं।

प्रेम में उद्विग्न—सती के न रहने से बावले होकर उनकी जली देह को कान्धे पर लिए सारे जगत में भटकते शिव। मन में चैन नहीं, असह्य पीड़ा है—उससे मुक्ति नहीं।

प्रेम में शिव को भी मुक्ति नहीं।

ये मोह, प्रेम, ये शिव की नगरी बनारस…

मणिकर्णिका पर निरंतर जलती धूँ-धूँ करती देह…सब नश्वर है।

मानो बनारस -घाट कह रहा है…संसार से प्रेम करने पर यही मिलती है—मृत्यु, मुक्ति नहीं।

जाने कहाँ-कहाँ भटकता हुआ मन अंततः शंकर के अद्वैतवाद पर आकर उद्घोष करता है-

"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या…”

पंडित कहता है—“तुझे मुक्ति नहीं मिलेगी।”

लेकिन मन धीरे से यह भी कहता है—

जिसे मुक्ति की भी परवाह नहीं, क्या वह पहले से मुक्त नहीं?

मुक्ति, शंकर और बनारस का मणिकर्णिका घाट…मेरे विचार से यह फिल्म वही नहीं है जो दिखती है—वह हमसे कुछ और, बहुत कुछ कहना चाहती है।  कई बार कोई कहानी , फिल्म या कोई पेंटिंग कई पर्तें उघाड़ती है…वह हमसे कई तरह से , कई भाषाओं में संवाद करती है, सबसे एक तरह से नहीं…आत्म-मंथन की आवश्यकता है।


खैर… यह तो मेरा चिंतन है। आपकी आप जानें। फिल्म बनाने वाले अपनी जानें, मेरा मन तो छानकर  अपने मन की  बात निकाल लेता है…मेरे विचारों से सहमत होना आपके लिए कतई आवश्यक नहीं…जय भोले🙏🌿


खैर… यह तो मेरा चिंतन है। आपकी आप जानें। फिल्म बनाने वाले अपनी जानें, मेरा मन तो छानकर  अपने मन की  बात निकाल लेता है…मेरे विचारों से सहमत होना आपके लिए कतई आवश्यक नहीं…जय भोले🙏🌿

—उषा किरण 

सोमवार, 22 दिसंबर 2025

कुछ इस तरह

 जिन संबंधों को हम भावनाओं के रेशमी तन्तुओं से बुनते हैं, प्यार की सुगन्ध डालते हैं, दिल के क़रीब रखते हैं, वे ही संबंध कभी-कभी जरा सी ठेस से बिखर कैसे जाते हैं? जरा किसी ने कुछ कह दिया या आपकी किसी भावना का सम्मान नहीं किया या भावना को ठेस पहुँचा दी, किसी और से भी नज़दीकियाँ कर लीं या किसी ने लगाई - बुझाई कर दी या हमें इम्पॉर्टेंस देनी कम कर दी और हम भड़क जाते हैं…जरा सी देर में हमारा अहम् चोटिल होकर नाग सा फुँफकारने लगता है, अपमानित और ठगे हुए से खुद को महसूस करके हम प्रत्युत्तर में गालियों व आरोपों  के पत्थर मारने लग पड़ते हैं, चुगली  शुरु कर देते हैं। जो जरा शराफत और बुद्धिजीवी कहलाने का नशा रखते हैं वे साहित्य की ओट में बड़े- बड़े शब्दों का चयन कर लाँछन लगाने व घात लगाने से नहीं चूकते। वे आपके चरित्र का भी हनन चुटकियों में वाक्-चातुर्य से करते नजर आते हैं। कल तक जो प्रिय थे,  वे अचानक अब से आपके दुश्मनों की कतार में हाथ में पत्थर लिए खड़े नजर आएंगे। 


मतलब साफ है कि वो रिश्ता सिर्फ़ उनके अहंकार को पुष्ट करने का मात्र जरिया भर था बाकी अन्दर भूसा ही भरा था। सारे कोमल  रेशमी धागे बुरी तरह उलझ जाते हैं ।वे जरा नहीं सोचते कि अपने पुराने संबंधों की कुछ तो मर्यादा रखें। मैं- मैं का गान खुद करेंगे औरों से भी करवाएंगे। ये नहीं कि दूसरों की नजर में आपके लिए जो उच्च भाव व आदर था कभी, उसकी ही लाज रख लेते …जरा सा दिमाग व अहम् को परे कर दिल से काम ले लेते…पर नहीं आप तो आप हैं ऐसे कैसे छोड़ेंगे ? फौरन से उन रेशमी अहसासों के पेड़ की जड़ में जो कभी बहुत जतन से रोपा व पोसा था अहंकार , ईर्ष्या व द्वेष का तेज़ाब उड़ेल देंगे…भाव- मन्दिर में खड़े होकर  बदहजमी की डकारें मारने लगेंगे। 


मुझे याद है एक बार हमने अपने घर एक सीनियर प्रोफ़ेसर को विद फैमिली डिनर पर आमन्त्रित किया था। तभी अचानक एक और प्रोफ़ेसर साहब आफत के मारे अचानक आ धमके। तब मोबाइल तो होते नहीं थे कि कॉल करके आते। उन दोनों में कभी रही गहरी दोस्ती अब कट्टर दुश्मनी में तब्दील हो चुकी थी। तो उनके आते ही सीनियर प्रोफेसर साहब झपट पड़े । हमारे घर को अखाड़ा बना दिया। जरा लिहाज़ नहीं किया कि आप किसी दूसरे के घर पर अतिथि की हैसियत से पधारे हैं और दूसरे प्रोफ़ेसर भी हमारे अतिथि ही हैं और लगे दबादब लड़ने । कहनी- अनकहनी सब कह डालीं । गाली- गलौज से भी गुरेज़ नहीं किया। हम सन्न थे । काफ़ी कोशिश की उनको रोकने की पर वो कहाँ रुकने वाले थे। वे अब स्वर्ग सिधार चुके हैं परन्तु आजतक भी वो घटना याद आती है तो मन क्षोभ से भर जाता है। 


तो जब भी लगे कि अब ये नौबत आने वाली है तो थम कर जरा सोचें, गुत्थियों को सुलझाने की कोशिश करें और यदि नामुमकिन लगे तो शान्ति से उस उलझी रेशमी गुच्छियों को वहीं उलझा छोड़कर रास्ता बदल लें लेकिन खूबसूरती से। इस तरह कम से कम कुछ सुनहरी स्मृतियाँ तो आपकी मुट्ठी में होंगी…आपकी और दूसरे की भी गरिमा बनी रहेगी और कुछ तो आँखों की शर्म बाकी रह जाएगी जिससे कभी भूले- भटके सामना हो भी जाए तो आँखें न चुराते फिरें-


"दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे

जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों”


आप खूबसूरती से भी इस पीड़ा को बाय कह सकते हैं ।राहें बदलें …पटाक्षेप करें परन्तु कुछ इस तरह- 


" वो अफसाना जिसे अन्जाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे इक ख़ूबसूरत मोड़ देकर  छोड़ना अच्छा…!”

—उषा किरण🍃

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025

पब्लिक टॉयलेट की समस्या—



सबके फायदे की बात हो तो मैं लिखने से गुरेज़ नहीं करती, चाहे विषय थोड़ा संकोच वाला ही क्यों न हो, क्योंकि यह समस्या हर यात्रा करने वाली महिला की है।

सफ़र के दौरान—रेल, फ्लाइट, मॉल, ऑफिस, कहीं भी—पब्लिक टॉयलेट की साफ़-सफ़ाई सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। इस वजह से हम महिलाएं अक्सर जितना हो सके खुद को रोकती रहती हैं, लेकिन अंत में इस्तेमाल तो करना ही पड़ता है। और फिर बार–बार UTI जैसी समस्याएँ होना आम बात है।

विदेशों में यह परेशानी कम दिखती है।

वहाँ लोग अनुशासन में रहते हैं—सीट साफ़ रखकर निकलते हैं, लाइन में बुज़ुर्ग महिलाओं या बच्चों को आगे जाने देते हैं, और बिना सफाई कर्मचारी के भी शौचालय व्यवस्थित रहते हैं।

काश हमारे यहाँ भी ऐसा ही हो!

मुझे सबसे ज़्यादा दिक्कत उन महिलाओं से होती है जो सीट पर न बैठकर फर्श गंदा कर देती हैं।

और पुरुषों से, जो पब्लिक टॉयलेट ही नहीं, कई बार फ़्लाइट और घरों में भी सीट को गंदा छोड़ जाते हैं—यह भूलकर कि दूसरे को उसी सीट पर बैठना होगा। वास्तव में दोनों काम बैठकर ही होने चाहिए, पर इसे कौन समझाए! थोड़ा-सा सेंस खुद भी होना चाहिए।

उधर पानी की सप्लाई भी कई जगह ठीक न होने से सफ़ाई की स्थिति और खराब हो जाती है।

मैं यात्रा बहुत करती हूँ, इसलिए हमेशा किसी समाधान की तलाश में रही।पिछले दिनों दो बहुत काम की चीज़ें मिलीं—और सोचा कि आप सबके साथ भी साझा करूँ।

👉 Disposable Pee Buddy

👉 Disposable Toilet Seat Covers

दोनों अमेज़ॉन पर आसानी से मिल जाते हैं।

सफ़र में इन्हें और कुछ wet wipes साथ रख लें तो टॉयलेट इस्तेमाल करना कहीं ज्यादा सुरक्षित और आसान हो जाता है।संकोच छोड़कर अपनी सेहत को प्राथमिकता दें—UTI और इन्फ़ेक्शन से बचाव बेहद ज़रूरी है।

और याद रखें सबसे जरूरी है, टॉयलेट को तमीज से इस्तेमाल करने के बाद दूसरों को भी इस्तेमाल करना है तो सफाई का ध्यान रखें, वैट वाइप साथ लेकर जाएं और सीट को साफ करके ओर फ्लश करके ही बाहर निकलें।

अगर यह जानकारी किसी एक महिला तक भी राहत पहुँचाए, तो मेरा लिखना सफल हुआ।

—उषा किरण 

फोटो: गूगल से साभार 

बुधवार, 10 दिसंबर 2025

मेरे अवॉर्ड्स…



1979 में शादी के बाद आर जी कॉलेज में ही एम ए फाइनल इयर में एडमीशन लेकर , वर्ष 1980, एम ए कम्पलीट करते ही, नई- नई टेम्परेरी टीचर बनी उसी आर जी पी जी कॉलेज में।स्टुडेंट्स और मेरी उम्र में मुश्किल से एक दो साल का ही फर्क था। मुझे याद है अपनी पहली एम ए की क्लास में ' यूरोपियन हिस्ट्री ऑफ मॉडर्न आर्ट ‘ पढ़ाते हुए मैं थरथरा रही थी। अपनी नर्वसनेस को छुपाने के लिए स्टुडेंट से कहा खिड़की बन्द कर दो बहुत ठंडी हवा है😊

पचासवां स्थापना दिवस था, सभी डिपार्टमेंट को कल्चरल प्रोग्राम वाली शाम को कुछ प्रोग्राम देने थे। हमारे डिपार्टमेंट से तीन प्रोग्राम दिए गए। दो मैंने तैयार करवाए पहला एक नाटक था, दूसरा स्टेज पर आठ फ़ीट बड़े हार्ड बोर्ड पर बच्चों से काँगड़ा पेंटिंग बनवा कर , फिगर वाली जगह कटवाकर वहां पीछे स्टूडेंट्स को पेंटिंग जैसा ही मेकअप करके , बच्चों से साड़ियों के लहंगे बनवाए, पेंटिंग के अनुसार जेवर भी बनवाकर तैयार किया। पेंटिंग के पीछे स्टूल वगैरह रखकर उन पर खड़ा किया। पीछे से बोर्ड को कई लड़कियों ने छिपकर थामा , साथ में कमेंट्री, सितार की धुन, रंग बिरंगी लाइट्स का फोकस बारी- बारी से सब पर…अद्भुत समाँ बंध गया। प्रोग्राम के बाद तालियों के शोर और फर्स्ट प्राइज़ मिलने से सब थकान दूर हो गई और महिने भर की मेहनत सफल हुई। नाटक की कैटेगरी में भी पहला प्राइज़ हमारे नाटक "बहू की विदाई “( शायद यही नाम था) को मिला।

उन दिनों मेरी पहली चार महिने की प्रेगनेंसी थी। उल्टियों के मारे हालत खराब थी। शाम तक पैर सूज जाते थे। बेहद कमजोरी थी। अकल तो थी नहीं बस ये सुना था कि एबॉर्शन भी करवा सकते हैं, तो  डॉक्टर के पास अकेली जाकर कहा आप एबॉर्शन कर दो मुझे अभी करियर बनाना है, पी- एच. डी. करनी है। डॉक्टर अमृत फूल मेरे घटते वजन और सेहत को लेकर परेशान थीं । उन्होंने बहुत प्यार से समझाया और डाँटा भी तो अपनी बेवक़ूफ़ी समझ आ गयी कि यह कोई खेल नहीं है बच्चों का, परिणाम घातक हो सकते हैं।समझाया कि बेशक उल्टी हो जाए पर खाती रहना वर्ना एडमिट करना पड़ेगा।

प्रोग्राम की तैयारी करवाते व क्लास लेते समय चुपके से टॉयलेट में जाकर वॉमिट करती और मुंह में टॉफी या इलायची डाल फिर काम में जुट जाती। पेट में कुछ रुकता - पचता ही नहीं था, खाया- पिया सब निकल जाता। जूस पर जिंदा थी। बेहद कमजोरी थी पर कुछ करने का, कुछ बनने का जुनून था। वे मेरी जिंदगी के सबसे तकलीफ भरे दिनों में से थे।किसी की चमक- दमक देखकर कौन अनुमान लगा सकता है कि वहां तक पहुँचने का रास्ता कितना कंटकपूर्ण था।

कष्ट के दिनों में किए गए सद्व्यवहार या दुर्व्यवहार को मैं चाह कर भी कभी भुला नहीं सकी। पता नहीं कैसे लोग किसी के कठिन वक्त में इतने निर्मम हो सकते हैं। जो मन होता है सुना देते हैं ।किसी की मेहनत पर अपना ठप्पा लगा देते हैं ।पर कुछ लोगों की ममता को भी नहीं भूलती। सुधा शर्मा मैम , दिनेश शर्मा सर के घर जाती कभी तो वे लोग खाना खाए बिना आने नहीं देते थे सुधा मैम की बात पर हंसी आती जब वे लाड़ से कहतीं, “तुमको तो बॉम्बे जाना था फ़िल्मों में…!” 

सावित्री गैडी मैम इशारे से बुलाकर कान में कहतीं, “उषा रेवड़ी मूंगफली लाई हूँ, लोहड़ी की…क्लास के बाद स्टाफ रूम में आ जाना…” जिनकी कभी स्टुडेंट थीं उनके साथ स्टाफरूम में बराबर कुर्सी पर बैठने का, साथ चाय पीने का, उनका मित्रतापूर्ण व्यवहार बड़ा सुख व संतोष देता था।

लोगों में अवॉर्ड्स और पुरस्कार पाने की होड़ जब देखती हूँ तो मन में हंसती हूँ।अपनी चालीस साल की जॉब को अच्छी तरह से निभा सकी। बहुत सम्मान और स्टुडेंट्स का प्यार पाया। अपने पढ़ाए बच्चों को अच्छी जगह सैटल्ड हुआ , अच्छा आर्टिस्ट बने देखती हूँ तो परम सन्तोष होता है। बच्चों की परवरिश पति , परिवार के सहयोग व ईश्वर कृपा से सन्तोषजनक रूप से पूरी कर सकी। उनके प्रति भी कर्तव्य पूरे कर मुक्त हुई। और असाध्य भीषण बीमारी को आस्था व विश्वास की उंगली थाम पार कर सकी , तो लगता है जैसे दुनियां के सारे अवॉर्ड्स मैंने जीत लिए हैं…सोते समय एक गहरी सन्तोष की साँस लेकर सोचती हूँ ….और क्या चाहिए ? 

बस ईश्वर का ध्यान आखिरी साँस तक न छूटे यही कामना शेष है🙏

— कभी-कभी फोटो गैलरी स्क्रॉल करते किसी फोटो पर उँगलियाँ थम जाती हैं और यादों की रील खुल जाती है…वर्ना जिंदगी और कुछ भी नहीं , तेरी मेरी कहानी है….!!!

—- उषा किरण 



 26 सितम्बर - उस दिन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर , दिल्ली में सिर्फ मेरी पुस्तक "लाल- पीली लड़की” का विमोचन मात्र नहीं था, बल्कि मेरे लिए एक...