ताना बाना

मन की उधेड़बुन से उभरे विचारों को जब शब्द मिले

तो कुछ सिलवटें खुल गईं और कविता में ढल गईं

और जब शब्दों से भी मन भटका

तो रेखाएं उभरीं और

रेखांकन में ढल गईं...

इन्हीं दोनों की जुगलबन्दी से बना है ये

ताना- बाना

यहां मैं और मेरा समय

साथ-साथ बहते हैं

बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

महाकालेश्वर व श्री काल भैरव मंदिर, उज्जैन


बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर भगवान का यह मंदिर प्रमुख मंदिरों में से एक माना जाता है इसके दर्शन की बहुत अभिलाषा थी । मान्यता है कि बारह ज्योतिर्लिंगों में से सिर्फ़ यहाँ पर ही दक्षिण मुखी शिवलिंग हैं । इस मंदिर का उल्लेख महाभारत,पुराणों व कालिदास के ग्रंथों में भी मिलता है ।धर्मशास्त्रों के अनुसार दक्षिण दिशा के स्वामि यमराज हैं  अत: यहाँ महाकालेश्वर के दर्शन करने से अकाल मृत्यु तथा यमराज द्वारा दी जाने वाले कष्टों से मुक्ति मिलती है तथा दर्शन मात्र से ही मो़क्ष की प्राप्ति होती है ।
सात फरवरी को सुबह ही सुबह मौका देख कर इंदौर से उज्जैन जिसका एक नाम अवन्तिका भी था के लिए निकल कर डेढ़ घंटे में पहुँच गए ।सुबह चार बजे की भस्म आरती में चाह कर भी शामिल नहीं हो पाए ।पहले सुना था कि ताजी चिता की भस्म से आरती होती थी परन्तु गाँधी जी की इच्छानुसार अब कपिला गाय के गोबर से बने कंडे अमलतास ,बेर,पीपल,पलाश,बड़ की लकड़ियों से मन्त्रोच्चार सहित जला कर बनी भस्म से आरती होती है। बहुत भीड़ थी मोबाइल बाहर जमा कर फूल- माला व  प्रसाद लेकर लाइन में लग गए।करीब एक घंटे में हमारा नं० आया ।दूर से ही दर्शन हुए ।पंडित जी ने प्रसाद ,फूल लेकर दूर से ही चढ़ा दिए दर्शन कर ,हाथ जोड़ श्री काल भैरव मंदिर  के लिए निकल लिए।
काल भैरव मंदिर महाकालेश्वर मंदिर से पाँच कि०मी० की दूरी पर है।किंवदंती है कि यहाँ के राजा भगवान महाकाल ने ही काल भैरव को यहाँ पर शहर की रक्षा के लिए नियुक्त किया था। इसलिए काल भैरव को शहर का कोतवाल भी कहा जाता है ।
वहाँ ज्यादा भीड़ नहीं थी ।फूल-माला ,प्रसाद के साथ एक बोतल में मदिरा भी दी गई ।ये दुनिया का एक मात्र ऐसा मंदिर है जहाँ भैरव भगवान पर मदिरा का प्रसाद चढ़ाया जाता है ।पुजारी के द्वारा प्लेट में निकाल कर मुँह से लगाने पर मदिरा साफ गटकती हुई दिखाई देती है जो आज भी रहस्य है।कहते हैं कि काफी जाँच के बाद भी समझ नहीं आया कि ये मदिरा आखिर जाती कहाँ है । ये छै: हजार साल पुराना वाम मार्गी तांत्रिक मंदिर है  जहाँ बलि ,माँस, मदिरा चढ़ाया जाता था और मदिरा आज भी चढ़ाई जाती है।भैरव देवता तामस देवता माने जाते हैं और मान्यता है कि तामसिक पूजा से अनिष्ट ग्रहों की शाँति होती है।
इस मंदिर में भगवान कालभैरव की प्रतिमा सिंधिया पगड़ी पहने हुए दिखाई देती है। यह पगड़ी भगवान ग्वालियर के सिंधिया परिवार की ओर से आती है। यह प्रथा सैकड़ों सालों से चली आ रही है।
मंदिर के बाहर एक शराबी मंदिर से लौटने वालों से बची मदिरा गिड़गिड़ा कर माँग रहा था ...पर प्रसाद तो सबको चाहिए होता है न....तो किसी ने भी नहीं दी।
बहुत भूख लग रही थी और प्रोग्राम में लौटने की भी जल्दी थी अत: भूख लगने पर भी चाय नाश्ता न कर झटपट अमरूद लेकर गाड़ी में ही मसाले से खाते हुए इंदौर वापिस हो लिए । वाकई सच मानिए उज्जैन के अमरूदों का स्वाद लाजवाब था ।मैं सिर्फ़ अमरूद खाने के लिए ही इंदौर या उज्जैन दुबारा जा सकती हूँ ।

                                                                 महाकालेश्वर

श्री काल भैरव मंदिर





नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि.....!



भूल जाना चाहती हूँ इस तारीख को
है ऐसी कोई रबड़ तो इस तारीख को ही
कैलेंडर से मिटा दो कोई
जो तुम्हारी पुण्य- तिथि के नाम से
दर्ज है अब हमारी यादों में !

सारा दिन
सीने से पेट तक
घू-घू करते चक्रवात
और एक दबी ,सुलगती सी चिंगारी
अग्निशिखा सी प्रश्न बन
सिर पटकती है
क्या जल्दी थी इतनी....!

दिल को मुट्ठी में जैसे कोई भींच
निचोड़ता है ...
कि तुम्हारी फिसलती उंगलियों को थाम
किया वादा कहाँ निभा पाई ?
जानती हूँ तुम मेरी मजबूरी समझते होगे

तुम्हारे रोपे पौधे आज वृक्ष बन
आसमानों को छूते
झूम रहे हैं
आशीषों और दुआओं से
हर पल सींचती हूँ

रात घिर रही है
और मन के
अंधेरों में
हजारों उत्ताल तरंगों संग
डूबती-उतराती
अवश सी मैं बुदबुदा रही हूँ
"नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणी .....!”
                                      —उषा किरण

पुस्तक समीक्षा —बाना -बाना

रश्मि कुच्छल की प्रतिक्रिया ताना-बाना पर—
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

इस सफरनामे का आवरण ही लेखिका यानी  डॉ . उषाकिरण दी का व्यक्तित्व है ,घनी कालिमा को चीरकर उभरता सुनहरा सूरज ।
रेखाओं की चितेरी जादू भरी उंगलियां कब इन रेखाओं को शब्द बना देती हैं और कब ये कवितायों की भावभूमि के उड़ते मेघ से कागज पर चित्र बनकर उतर आते हैं ,ये अद्भुत संयोजन और कारीगिरी इस किताब को विशेष बनाती है व दीदी को एक विशिष्ट गरिमामयी काव्यचित्र संकलन "ताना - बाना " की जननी ।
स्त्री मन की नजर से जीवन के हर रंग को छूती , विषाद, विसंगति और विडंबनाओं पर तंज करती , कभी निरुपाय तो कभी दृढ़ होकर राह बनाती हर कविता उनके नजरिये से मिलवाती है ।
आज कुछ कविताओं से रूबरू होते हुए एक कविता पर रुक गयी हूँ ।
आप सबके लिए ---🙏😊

रन्जु भाटिया द्वारा ताना- बाना ( डॉ उषा किरण ) की पुस्तक समीक्षा




ताना बाना ( काव्यसंग्रह )

सुन लो           

जब तक कोई

आवाज देता है

क्यूँ कि...

सदाएं  एक वक्त के बाद

खामोश हो जाती हैं

और ख़ामोशी ....

आवाज नहीं देती!!

   डॉ उषा किरण


कितनी सच्ची पंक्तियां है यह। हम वक़्त रहते अपने ही दुनिया मे रहते हैं बाद में पुकारने वाली आवाज़ों को सुनने की कसक रह जाती है । शब्दों का यह "ताना बाना" ,ज़िन्दगी को आगे चलाता रहता है । यही सुंदर सा शब्दों का" ताना बाना "जब मेरे हाथ मे आया तो घर आ कर सबसे पहले मैने इसमें बने रेखाचित्र देखे ,जो बहुत ही अपनी तरफ आकर्षित कर रहे थे , कुछ रचनाएं भी सरसरी तौर पर पढ़ी ,फिर दुबई जाने की तैयारी में इसको सहज कर रख दिया ।
     यह सुंदर सा "काव्यसंग्रह "मुझे "उषा किरण जी" से इस बार के पुस्तक मेले में भेंटस्वरूप मिली । उषा जी 'से भी मैं पहली बार वहीं मिली ,इस से पहले फेसबुक पर उनका लिखा पढ़ा था और उनके लेखन से बहुत प्रभावित भी थी । क्योंकि उनके लेखन में बहुत सहजता और अपनापन सा है जो सीधे दिल मे उतर जाता है ।
     पहले ही कविता "परिचय " में वह उस बच्ची की बात लिख रही हैं जो कहीं मेरे अंदर भी मचलती रहती है ,
नन्हे इंद्रधनुष रचती
नए ख्वाब बुनती
जाने कहाँ कहाँ ले जाती है
उषा जी ,के इस चित्रात्मक काव्य संग्रह में बेहद खूबसूरत ज़िन्दगी से जुड़ी रचनाएं हैं ।जो स्त्री मन की बात को अपने पूरे भावों के साथ कहती हैं । औरत का मन अपने ही संसार मे विचरण करता है ,जिसमे उसकी वो सभी  भावनाएं हैं जो दिन रात के चक्र में चलते हुए भी उसके शब्दों में बहती रहती है और यहां इन संग्रह में तो शब्दों के साथ रेखांकित चित्र भी है जो उसके साथ लिखी कविता को एक  सम्पूर्ण अर्थ दे देते हैं जिसमे पढ़ने वाला डूब जाता है।
डॉ उषा जी के इस संग्रह को पढ़ते हुए मैंने खुद ही इन तरह की भावनाओं में पाया , जिसमे कुछ रचनाएं प्रकृति से जुड़ी कर मानव ह्रदय की बात बखूबी लिख डाली है ,जैसे सब्र , कविता में
थका मांदा सूरज
दिन ढले
टुकड़े टुकड़े हो
लहरों में डूब गया जब
सब्र को पीते पीते
सागर के होंठ
और भी नीले हो गए

पढ़ते ही एक अजब से एहसास से दिल भर जाता है। ऐसी ही उनकी नमक का सागर ,बड़ा सा चाँद, एक टुकड़ा आसमान, अहम ,आदि बहुत पसंद आई । इन रचनाओं में जो साथ मे रेखाचित्र बने हुए है वह इन कविताओं को और भी अर्थपूर्ण बना देते हैं।
   किसी भी माँ का सम्पूर्ण संसार उनकी बेटियां बेटे होते हैं , इस संग्रह में उनकी बेटियों पर लिखी रचनाएं मुझे अपने दिल के बहुत करीब लगी
बेटियां होती है कितनी प्यारी
कुछ कच्ची
कुछ पक्की
कुछ तीखी
कुछ मीठी
वाकई बेटियां ऐसी ही तो होती है ,एक और उनकी कविता मुनाफा तो सीधे दिल मे उतर गई ,जहां बेटी को ब्याहने के बाद मुनाफे में एक माँ बेटा पा लेती है। जो रचनाएं आपके भी जीवन को दर्शाएं वह वैसे ही अपनी सी लगती है । लिखने वाला मन और पढ़ने वाला मन  कभी कभी शायद एक ही हालात में होते हैं । कल और आज शीर्षक से इस संग्रह की एक और रचना मेरे होंठो पर बरबस मुस्कान ले आयी जिसमे हर बेटी छुटपन में माँ की तरह खुद को संवारती सजाती है ,कभी माँ के सैंडिल में ,कभी उसकी साड़ी में , और इस रचना की आखिरी पँक्तियाँ तो कमाल की लगी सच्ची बिल्कुल
आज तुम्हारी सैंडिल
मेरी सैंडिल से बड़ी है
और .....
तुम्हारे इंद्रधनुष भी
मेरे इंद्रधनुष से
बहुत बड़े हैं !
इस तरह कभी बेटी रही माँ जब खुद माँ बनती है तो मन के किसी कोने में छिपी आँचल में मुहं दबा धीमे धीमे हंसती है  ( माँ कविता )
बहुत सहजता से उनके लिखे इस संग्रह में रोज़मर्रा की होने वाली बातें , शरीरिक दर्द जैसे रूट कैनाल में बरसों से पाले दर्दों से मुक्ति का रास्ता सिखला देती है ।
इस संग्रह की हर रचना पढ़ने पर कई नए अर्थ देती है । मुझे तो हर रचना जैसे अपने मन की बात कहती हुई लगी । पढ़ते हुए कभी मुस्कराई ,कभी आंखे नम हुई । सभी रचनाओं को यहां लिखना सम्भव नहीं पर जिस तरह एक चावल के दाने से हम उनको देख लेते है वैसे ही उनकी यह कुछ चयनित पँक्तियाँ बताने के लिए बहुत है कि यह संग्रह कितना अदभुत है और इसको पढ़े बिना नहीं रहा जा सकता है ।
"ताना बाना "डॉ उषा जी का यह संग्रह  इसलिए भी संजोने लायक है ,क्योंकि इसमें  बने रेखाचित्रों से भी पढ़ने वाले को बहुत जुड़ाव महसूस होगा  ।
  डॉ उषा जी से मिलना भी बहुत सुखद अनुभव रहा । जितनी वो खुद सरल और प्यारी है उनका लिखा यह संग्रह भी उतना ही बेहतरीन है । अभी एक ग्रुप में जुड़ कर उनकी आवाज़ में गाने सुने ,वह गाती भी बहुत सुंदर  हैं । ऐसी प्रतिभाशाली ,बहुमुखी प्रतिभा व्यक्तित्व के लिखे इस संग्रह को जरूर पढ़ें ।
धन्यवाद उषा जी इस शानदार काव्यसंग्रह के लिए और आपको बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं

ताना बाना
डॉ उषा किरण
शिवना प्रकाशन
मूल्य 450 rs

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

ताना बाना : ”अखिल भारतीय महिला साहित्य समागम”

ताना बाना : ”अखिल भारतीय महिला साहित्य समागम”: 6th और 7th फ़रवरी को इंदौर में आयोजित वामा तथा घमासान डॉट कॉम के सौजन्य से "अखिल भारतीय महिला साहित्य समागम” के आयोजन में अतिथि वक...

”अखिल भारतीय महिला साहित्य समागम”



6th और 7th फ़रवरी को इंदौर में आयोजित वामा तथा घमासान डॉट कॉम के सौजन्य से "अखिल भारतीय महिला साहित्य समागम” के आयोजन में अतिथि वक्ता के रूप मे भाग लेने के लिए इंदौर से आमन्त्रण मिलने पर पहले तो असमंजस में थी पर बाद में जाने का तय किया । सुरभि भावसार ने हम लोगों के एयर टिकिट व रहने की व्यवस्था करवाई।
             इंदौर मैं पहली बार गई ।वहाँ के लोगों के स्वभाव की मिठास और मेहमान नवाज़ी  ने सच में मन मोह लिया।एयरपोर्ट पर वरिष्ठ पत्रकार राजेश राठौर जी हमको रिसीव करने आए थे वो रास्ते भर हमें शहर व प्रोग्राम की जानकारी देते रहे शहर की साफ़-सफ़ाई के बारे में और भविष्य की योजनाओं के बारे में बताते रहे ।सारा शहर एकदम साफ़ सुथरा देख बहुत अच्छा लगा ।
हमारा रुकने का इंतजाम साउथ एवेन्यू होटल में किया गया था ।होटल के  द्वार पर ही ज्योति जैन जी बुके व मीठी मुस्कान सहित  स्वागत के लिए स्वयम् प्रस्तुत थीं।उनकी आत्मीयता ने सफर की थकान मिटा दी।
        थोड़ी देर बाद ही रूम में कार्यकारिणी की सदस्याएँ अमर चड्ढा, पद्मा राजेन्द्र ,वसुधा गाडगिल,अंतरा करवडे, सुरभि भावसार मिलने आईं और बहुत अपनत्व से पूछा कि हमें कोई परेशानी या कमी तो नहीं है !
उसके बाद घमासान डॉट कॉम से अर्जुन राठौर जी कैमरामैन को लेकर आए और एक छोटा सा इंटरव्यू लिया ।
             6th फ़रवरी को उद्घाटन-सत्र में बराबर में ही 'जाल सभाग्रह’ पहुँचे  जहाँ चाय नाश्ते का इंतजाम था उसके पश्चात कार्यक्रम प्राम्भ हुआ ।सभी अतिथि वक्ताओं का स्वागत पगड़ी पहना कर,श्रीफल ,स्मृति चिन्ह एवम् उपहार देकर किया गया ।
स्वागत सत्र में मृदुला सिन्हा व चन्द्रकान्ता जी को सुनने का अनुभव बहुत अच्छा रहा ।स्त्री-विमर्श पर जीवन मंथन से निकला हर वाक्य जीवन अनुभव का सार था जैसे ,जहाँ सिर्फ़ समस्याएँ ही नहीं उनके समाधान का भी रास्ता दिखाया।मृदुला सिन्हा जी ने कहा कि स्त्री या पुरुष की जगह अब परिवार विमर्श की जरूरत है ।
अन्य कविता व कहानी सत्रों में सत्रों में मालिनी गौतम,अलकनन्दा साने ,जयश्री रॉय ,सुषमा गुप्ता, इत्यादि को सुनने का अनुभव बहुत आनन्ददायक रहा।
7th फ़रवरी को भी टॉक शो में रुचिवर्धन मिश्र,रचना समंदर,निर्मला भुराड़या,वर्षा गुप्ता तथा अन्य सत्रों में सीमा जैन,शील कौशिक,जयंती रंगनाथन,नासिका शर्मा , जया जादवानी व रेणु जैन इत्यादि के परिपक्व विचारों को सुनने का अनुभव अविस्मरणीय रहा।
इसके अतिरिक्त विभिन्न शहरों से पधारी महिला साथियों ने भी अपनी कविताएं तथा लघु-कथाएँ सुनाईं।गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी ने भी बहुत सुरीली आवाज में कविता का सस्वर पाठ किया और अर्चना चावजी व कविता वर्मा जी ने भी लघु-कथा सुनाई ।
सभी के विचारों को सुनना ,मिलना-जुलना,गपशप ,संग खाना- पीना ,और फ़ोटोग्राफ़र के कहने पर मिल कर कैटवॉक कर खिलखिलाते हुए फ़ोटो खिंचवाना स्मृति -पटल पर सदा के लिए अंकित हो गया।
फेसबुक पर ही परिचय हुआ था संजय नरहरि पटेल जी से वो अत्यन्त व्यस्त होने पर भी मिलने आए कुशलता पूछी ।
निधि जैन भी बहुत स्नेह से मिलीं उनका घर आने का निमन्त्रण वक्त न होने के कारण स्वीकार नहीं कर सकी जिसका अफसोस रहा ।
फ़ेसबुक के माध्यम से गाने के शौक़ीन हम जैसे दीवानों का अर्चना चावजी और वन्दना अवस्थी दुबे ने एक ग्रुप बनाया ‘गाएँ गुनगुनाएँ ग्रुप ‘जो महिला साहित्यकारों एवम् ब्लॉगर्स का ही ग्रुप है ।ढा़ई साल में सभी में बेहद आत्मीयता हो गई है।उनमें  से अर्चना चावजी ,गिरिजा जी और कविता वर्मा जी से पहली बार उक्त प्रोग्राम में मिल कर इतनी ख़ुशी और स्नेह मिला कि कह नहीं सकती ।
गिरिजा जी के साथ ग्वालियर से आईं उनकी दोस्त प्रतिभा द्विवेदी जी से भी खूब आत्मीयता हो गई ।
अर्चना जी की सहजता ,सौम्यता,गंभीरता व आत्मीयता ने मन मोह लिया ।एक तपस्विनी सा औरा है उनका।गाती भी बहुत मधुर हैं ।उनका धैर्य व सबको साथ लेकर चलने का भाव अनुकरणीय है ।बहुत कुछ सीखने को मिलता है उनसे।कर्तव्यपरायणता व दूसरों के काम आने में उनकी मिसाल दी जा सकती है बहुत निर्मल मन है उनका।
            गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी का प्यार तो आँखों और बातों से हर पल छलक रहा था ।दो दिन साथ रहे पर बहुत कुछ सुनने-कहने से रह गया ।पुन: मिलने का वादा लेकर जुदा हुए।वे इतनी प्यार और भाव भरी लगीं कि इत्मिनान से साथ बैठ कर उनको खूब सुनने का मन कर रहा था।वे बहुत ही सुरीला गाती हैं ।भजन ,ग़ज़ल, शास्त्रीय संगीत सभी पर उनकी मज़बूत पकड़ है ।उनका स्नेहिल स्पर्श हथेलियों में आज भी महसूस होता है।
                कविता वर्मा जी से दोस्ती भी फ़ेसबुक पर ही हुई थी वे भी बहुत आत्मीयता से मिलीं ।बहुत मीठी बोली और मीठा स्वभाव है उनका । उनके पति का जन्मदिन था परन्तु रात तक  हमारे ही साथ रहीं ।मालिनी गौतम जी भी हम लोगों जैसी ही  मिल गईं ।हम सबको अपनी गाड़ी में बैठा कर कविता वर्मा जी शाम को खजराणा मंदिर ले गईं जहाँ गणपति के दर्शन कर षोडशियों की तरह खूब मस्ती धमाल किया हमने और ख़ूब वीडियो बनाईँ व सेल्फ़ी लीं ।
            फिर अगले दिन कविता जी ने साहित्य समागम के प्रोग्राम  के बाद अपने श्रीमान जी को भी बुला लिया तो हम चारों उनके साथ उनकी गाड़ी में लद कर सर्राफ़ा बाज़ार गए ।
सर्राफ़ा बाज़ार भी एक ही अजूबा है ।नौ बजे तक तो सर्राफ़ा बाज़ार चलता है और उसके बाद वहीं चाट बाज़ार लग जाता है जो रात दो बजे तक जाग्रत रहता है ।भीड़ इतनी जैसे कोई मेला लगा हो ।आलू पैटी,जोशी के दही बड़े,भुट्टे की कीस ,पानी पूरी,गराड़ू,साबूदानाखिचड़ी,जलेबी ,पोहा,मालपुआ,रबड़ी,क़ुल्फ़ी फ़ालूदा, शरीफे की रबड़ी सब चखने में ही बुरी तरह पेट भर गया ।और बहुत कुछ बाकी रह गया था।
जोशी के दही बड़े खाने में तो मज़े के थे ही उनको उछाल कर बनाने की कारीगरी और एक ही चुटकी से बारी-बारी मसाले डालने का हुनर भी कम मनोरंजक नहीं था ।उसकी दुकान के सामने सदा भीड़ लगी रहती है । वहीं अर्चना जी भी अपनी बेटी और मायरा  के साथ आ गईं ।हम सबने भाई साहब की एक दिन पहले गुज़र चुकी बर्थडे को फिर खूब खा पीकर मस्ती से मनाया । ।पान खाकर वापिस लौटे भीड़ इतनी थी कि चलना मुश्किल हो रहा था हम बार - बार कहे जा रहे थे कि बाप रे इंदौरी कितने चटोरे जबकि कसर हमने भी नहीं छोड़ी 













शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

वेलेन्टाइन डे



नहीं ...आज तो नहीं है मेरा वैलेंटाइन डे
लेकिन...
मेरे हाथों में मेंहदी लगी देख तुमने
समेट दिए थे चाय के कप जिस दिन
बुखार से तपते माथे पर रखीं
ठंडी पट्टियाँ जब
ठसका लगने पर पानी दे
पीठ सहलाई जब
जानते हो मुझे मंडी जाना नहीं पसंद तो
फ्रिज में लाकर सहेज दिए
फल- सब्ज़ियाँ जब
ठंड से नीली पड़ी उंगलियों को
थाम कर गर्म हथेली में
फूँकों से गर्मी दी जिस दिन
या परेशान देख पिन  लगा दिया साड़ी में जब
बदल दिया बच्चों का गीला नैपकिन और
बूँदें आती देख अलगनी से
उतार दिए कपड़े जब
तेज नमक पर भी खा ली सब्जी या
पी ली फीकी चाय बिना शिकायत जब
पेंटिंग बनाते देख बच्चों को चुपचाप
रेस्तराँ ले गए स्कूटर पर और
मेरा भी करा लाए खाना पैक जब
व्याकुल हो करवाचौथ पर बार-बार
आसमाँ में चाँद ढूँढ रहे थे जब
मेरी बहन ,भाई की तकलीफों में
साथ खड़े हुए जब
आखिरी वक्त पापा ,अम्मा  को थामा जब
मॉर्निंग- वॉक से लौटते हरसिंगार,चंपा के
ओस भीगे सुगन्धित फूल चुन कर
सिरहाने टेबिल पर सजा दिए जब
...................
तब...तब...तब
हाँ हर उस दिन मेरा वैलेंटाइन डे था तब !!!!🌹
                                      —-उषा किरण.
                                          14. 2 .2020

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 11 (अंतिम) रश्मि प्रभा

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 11 (अंतिम)    ताना-बाना उषा किरण  शिवना प्रकाशन  कितना कुछ हम मुट्ठी में भरकर...