ताना बाना

मन की उधेड़बुन से उभरे विचारों को जब शब्द मिले

तो कुछ सिलवटें खुल गईं और कविता में ढल गईं

और जब शब्दों से भी मन भटका

तो रेखाएं उभरीं और

रेखांकन में ढल गईं...

इन्हीं दोनों की जुगलबन्दी से बना है ये

ताना- बाना

यहां मैं और मेरा समय

साथ-साथ बहते हैं

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

ताना बाना : अश्वत्थामा

ताना बाना : अश्वत्थामा: कहो तो  पाँचाली अबोध सोए पड़े सुकुमार,अबोध पुत्रों के हन्ता अश्वत्थामा को क्यों क्षमा किया तुमने ? क्यों तुम्हारी करुणा से तुम्हारा ...

सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

अश्वत्थामा



कहो तो  पाँचाली
अबोध सोए पड़े सुकुमार,अबोध
पुत्रों के हन्ता अश्वत्थामा को
क्यों क्षमा किया तुमने ?
क्यों तुम्हारी करुणा से
तुम्हारा दारुण दु:ख
कम पड़ गया ?
और तुम वासुदेव ...?
तुमने भी श्रीहीन कर छोड़ दिया
उस घायल विषधर को
अजर- अमर होने का
वरदान देकर ?
लपलपाती रक्त सनी तलवार ले
हा-हा कर घूमता है निर्द्वन्द्व
मस्तक पर रिसते बदबूदार घाव सहित
आज भी...
धूँ-धूँ कर जलती प्रतिशोध ज्वाला उसकी
करती रहती है हमें भस्म
नासूर बने ज़ख़्मों से लावा बन
गिरता है रक्त आज भी हम पर
बँट गया है वो,
विस्तार पा गया है...
असंख्य नफरत और प्रतिशोध के नुकीले
नश्तरों को आखिर
कब तक सहेंगे हम ?
कब तक अबोध शिशुओं का
बलिदान देगी माँ ?
नहीं ...वासुदेव अब नहीं
शापमुक्त करो इसे
ले जाओ साथ
या फिर दो गाण्डीव
या ब्रह्मास्त्र हमारे ही  हाथ
ताकि कर सकें
इस आततायी अश्वत्थामा का
स्वयम् संहार
हम !!
               -उषा किरण


सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

अन्नदाता सुखी भव

प्राय: सफर में बहुत विचित्र अनुभव होते हैं ..कुछ खट्टे ,कुछ मीठे..आज से लगभग पन्द्रह साल पहले के एक अनुभव को तो मैं आजन्म नहीं भूल सकती ...असाध्य रोग से पीड़ित हो किसी डॉक्टर को दिखा कर मैं कलकत्ता (कोलकाता) से लौट रही थी हमारी ट्रेन का समय शाम का था जिस होटल में रुके थे वहाँ रास्ते के लिए कुछ खाना पैक करने के लिए कहा पर उन्होंने कहा इस समय संभव नहीं है...सोचा रास्ते में कुछ व्यवस्था हो जाएगी पर नहीं हो सकी...बीमार थी तो यूँ ही कुछ भी नहीं खाना चाह रही थी रास्ते में किसी स्टेशन पर एक कैंटीन थी वहाँ मेरे पति गए पर वो तब तक बंद हो चुकी थी...हार कर चिप्स और फल का सहारा लिया...हमारे कम्पार्टमेंट में एक फैमिली सफर कर रही थी लगभग पाँच छै: लोग थे उन्होंने  अपना दस्तरखान बिछाया और टोकरी से तरह-तरह के व्यन्जन सजाने शुरू किए..पूड़ियाँ ,आलू,अरबी,भिंडी कई तरह की सब्ज़ियाँ ,चटनी ,सलाद,पापड़,भुजिया,अचार  ...और मेरे पेट के चूहों ने जोर से उछल -कूद मचानी शुरू कर दी...हमारे पति तो फल प्रेमी हैं खाकर ऊपर की सीट पर सोने चले गए पर हमें जब तक कुछ नमक रोटी न मिले काम नहीं चलता आँखें नाक,कान,मन,प्राण सब बार- बार उधर ही खिंचे जा रहे थे 😜..हमने झट मैगज़ीन में अपनी आँखों को बाँध दिया..तभी अचानक उनमें से एक महिला ने कहा `सुनो बेटा आप भी आ जाओ हमारे साथ खा लो’...हमने सकुचा कर कहा `नहीं नहीं आप लोग खाएं’...उन्होंने पुन:-पुन:आग्रह किया कि `हम सुन रहे थे आप लोगों को खाना नहीं मिला है और हमारे पास बहुत खाना है देखिए ये सब इतना बचेगा कि फिंकेगा ही बचा हुआ आप संकोच न करें बस आ जाइए ‘...उनकी बहू प्रेम से हमारा हाथ पकड़ कर जब उठाने लगी तो हमने भी मन में कहा `चल उषा वसुधैव कुटुम्बकम्’...और उनके साथ चौकड़ी मार बैठ गए...इतना स्वादिष्ट खाना था कि क्या कहें...हम चटखारे लेकर खाने और बातों के मज़े लेने लगे सहसा उन्होंने कहा आप अपने हस्बैंड को भी बुला लीजिए...वो ऊपर से ही बोले `नहीं नहीं मैंने फल खा लिए हैं बस इनको ही खिलाइए ‘....पर वो नहीं मानीं सभी लोग बहुत आग्रह करने लगे हमने कहा `आ जाओ थोड़ा खा लो ‘...उन्होंने मना कर दिया पर उन लोगों ने जबर्दस्ती उनको भी बुला लिया पति तो दो पूड़ी बेहद संकोच से खाकर ऊपर बर्थ पर सोने चले और हम बातों और खाने के मजे लेते जैसे उसी परिवार के सदस्य हो गए...वो बताती रहीं कि आटे में हल्दी नमक डाल कर दूध से गूँधते हैं पूड़ी का आटा...सफर के लिए अरबी ,आलू और भिंडी की सब्जी को डीप फ्राई करके बनाते हैं तो जल्दी खराब नहीं होती...हम मारवाड़ी लोग भुजिया खाते हैं हर खाने के साथ...फिर मारवाड़ी लोगों की शादी के रिवाज...लहंगों , साड़ियों ,ज़ेवरों की ,रीति रिवाजों के बारे में बताती जातीं और बहुत स्नेह आग्रह से खिलाती-पिलाती जाती थीं...बाद में दो तरह की मिठाई खिलाई...खा पीकर धन्यवाद देकर अपनी सीट पर आ गए ...सुबह फिर उनका दस्तरख़ान बिछा और केन की टोकरी से ब्रैड,खीरा टमाटर निकाल कर सैंडविच बनने लगे, भुजिया और मिठाई तो थी ही ...उन्होंने फिर आमन्त्रित किया पर हमने हाथ जोड़ मना कर दिया पति किसी स्टेशन से कुछ खाने पीने का सामान ले आए थे... दिल्ली स्टेशन पर उतरते समय हमने पुन: आभार जताया तो हाथ पकड़ कर बोलीं कि `अभी भी बहुत खाना बचा है अच्छा है आपने खा लिया धन्यवाद मत कहिए आपसे बहुत अपनापन हो गया है ‘ सारे परिवार ने स्नेहपूर्ण विदाई ली ...इतने वर्षों के बाद भी उस शाही भोज की स्मृतियों को भुला नहीं पाती...ज़िंदगी भर एक से एक मँहगे और नायाब खानों का स्वाद चखा है...देश विदेश के बड़े -बड़े शैफ के फ़ाइव व सैवन स्टार रेस्ट्राँ में कितनी ही सिग्नेचर डिश खाईं होंगी पर वे सारे उस रात ट्रेन में ,बीमारी व कमज़ोरी में खाए स्वादिष्ट सुरुचिपूर्ण बनाए व प्रेम व आग्रह से खिलाए खाने के आगे फीके पड़ जाते हैं ...मेरा मन आज भी बहुत दुआएँ देता है उनको और आदर व प्यार से भीग कर कहता है...` अन्नदाता सुखी भव’ 🙏😌
          #सफरनामा

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 11 (अंतिम) रश्मि प्रभा

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 11 (अंतिम)    ताना-बाना उषा किरण  शिवना प्रकाशन  कितना कुछ हम मुट्ठी में भरकर...