ताना बाना

मन की उधेड़बुन से उभरे विचारों को जब शब्द मिले

तो कुछ सिलवटें खुल गईं और कविता में ढल गईं

और जब शब्दों से भी मन भटका

तो रेखाएं उभरीं और

रेखांकन में ढल गईं...

इन्हीं दोनों की जुगलबन्दी से बना है ये

ताना- बाना

यहां मैं और मेरा समय

साथ-साथ बहते हैं

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गुरुवार, 9 जुलाई 2020

एकलव्य





एक प्रणाम तो बनता है उन तथाकथित गुरुओं के भी गुरुओं को जो👇


           एकलव्य
            वे भी थे
       एकलव्य ये भी हैं
      फर्क सिर्फ़ इतना है...
     वो अँगूठा काट देते थे
            ये अँगूठा
            काट लेते हैं ...!
                                —उषा किरण
                                    (ताना-बाना)



रविवार, 14 जून 2020

इससे पहले


इससे पहले कि फिर से
तुम्हारा कोई अज़ीज़
तरसता हुआ दो बूँद नमी को
प्यासा दम तोड़ दे
संवेदनाओं की गर्मी को
काँपते हाथों से टटोलता
ठिठुर जाए और
हार जाए  जिंदगी की लड़ाई
कि हौसलों की तलवार
खा चुकी थी जंग...

इससे पहले कि कोई
अपने हाथों चुन ले
फिर से विराम
रोक दे अपनी अधूरी यात्रा
तेज आँधियों में
पता खो गया जिनका
कि काँपते थके कदमों को रोक
हार कर ...कूच कर जाएँ
तुम्हारी महफिलों से
समेट कर
अपने हिस्सों की रौनक़ें...

बढ़ कर थाम लो उनसे वे गठरियाँ
बोझ बन गईं जो
कान दो थके कदमों की
उन ख़ामोश आहटों  पर
तुम्हारी चौखट तक आकर ठिठकीं
और लौट गईं चुपचाप
सुन लो वे सिसकियाँ
जो घुट कर रह गईं गले में ही
सहला दो वे धड़कनें
जो सहम कर लय खो चुकीं सीने में
काँपते होठों पर ही बर्फ़ से जम गए जोग
सुन लो वे अस्फुट से शब्द ...

मत रखो समेट कर बाँट लो
अपने बाहों की नर्मी
और आँचल की हमदर्द हवाओं को
रुई निकालो कानों से
सुन लो वे पुकारें
जो अनसुनी रह गईं
कॉल बैक कर लो
जो मिस हो गईं तुमसे...

वो जो चुप हैं
वो जो गुम हैं
पहचानों उनको
इससे पहले कि फिर कोई अज़ीज़
एक दर्दनाक खबर बन जाए
इससे पहले कि फिर कोई
सुशान्त अशान्त हो शान्त हो जाए
इससे पहले कि तुम रोकर कहो -
"मैं था न...”
दौड़ कर पूरी गर्मी और नर्मी से
गले लगा कर कह दो-
" मैं हूँ न दोस्त !!”

                          — डॉ० उषा किरण

                    

रविवार, 7 जून 2020

काहे री नलिनी.....

                                          डॉ. उषा किरण  
                                           पेंटिंग साइज-30”X 30”
                                            मीडियम—मिक्स्ड मीडिया
                                            टाइटिल -"काहे री नलिनी.....”



घिर रहा तिमिर चहुँ ओर
है अवसान समीप

बंजर जमीनों पर
बोते रहे ताउम्र खोखले बीज
बेमानी गठरियाँ पोटलियाँ
ढोते रहे दुखते कन्धों पर

कंकड़ों को उछालते
ढूँढते रहे मानिक मोती
भटकते फिरे प्यासे मृग से ,
 मृगमरीचिकाओं में
तो कभी
स्वाति बूँदों के पीछे
चातक बन भागते रहे
उम्र भर

पुकारते रहे इधर -उधर
जाने किसे-किसे
जाने कहाँ- कहाँ
हर उथली नदी में डुबकी मार
खँगालते रहे अपना चाँद

हताश- निराश खुद से टेक लगा
बैठ गए जरा आँखें मूँद
सहसा उतर आया ठहरा सा
अन्तस के मान सरोवर की
शाँत सतह पर
पारद सा चाँद

गा रहे हैं कबीर
जाने कब से तो
अन्तर्मन के एकतारे पर
"काहे री नलिनी तू कुमिलानी
तेरे ही नाल सरोवर पानी......”!!                
  — डॉ. उषा किरण
                                   


सोमवार, 25 मई 2020

आचार- संहिता




सुनो !
कब , क्या कहा माँ ने
भूल जाओ अब
वो सारी नसीहतें
वो हिदायतें
लिखो न अब
खुद की आचार संहिता
अपनी कलम से
अपनी स्याही से

और फिर
सौंप देना बेटी को
वो लिखेगी उसके आगे
अपने हिसाब से
मनचाहे रंगों से

आखिर
क्यों ठिठके रहें हम
चौखटों में सिमटे
सोचते रहें कि...
क्या कहा था माँ ने
दादी या नानी ने

हक है हमारा भी
आसमानी कोनों पर
चाँद-सूरज और
उड़ते परिंदों पर
सतरंगे इन्द्रधनुषी रंगों
सनसनाती उन्मुक्त
शीतल बयारों और
इठलाती बदलियों पर

और ...
जहाँ भी होंगी माँ
भले ही वो
उंगली से बरजेंगी
पर चुपके से
आँखों से मुस्कुराएंगी
यकीन मानो
वो भी
सुकून पाएंगी...!!!
                       
                     —उषा किरण
               (रेखाँकन : उषा किरण )

                   
     

गुरुवार, 14 मई 2020

द्रौपदी










सुनो
धर्मराज युधिष्ठिर !
कहो तो
क्या सोच कर तुमने
द्रौपदी को जुए की बिसात पर
चौसर की कौड़ियों सा
उछाल दिया ?
क्या सोचा तुमने
स्त्री है तो कहीं भी

कैसे भी
इस्तेमाल कर लोगे तुम
यही न ?

उन्नीसवें दाँव में
खुद को हारने के बाद
क्या हक बचा था उस पर
या खुद पर
कैसे दाँव पर भार्या को
लगा दिया
तुमने ?
और तुम चारों ,
तुम भी तो पति थे न ?
क्यों नहीं तुमने हाथ पकड़ा
भाई का
किस मर्यादा में बंधे बैठे रहे
नतशिर ?

मर्द कहाते
परम यशस्वी
परम वीर
आत्मीयों की
परम ज्ञानियों की सभा में
किसी की भी भुजाएं
क्यों नहीं फड़कीं
बेशर्मी के उस दाँव पर
कुल वधू के चीर-हरण पर
दारुण पुकार पर
क्यों नहीं उबला लहू
शिराओं में
नपुंसक ही थे क्या सब ...?

हाँ
उस काले दिन
हरण हुआ जरूर था
मात्र चीर का नहीं
हरण था मनुष्यता का
लज्जा का
वीरता का
इंसानियत का
मर्यादा का
रिश्तों का !

और तुम द्रौपदी ?
गृह-प्रवेश पर ही
बाँट दी गईं
किसी ने भी कहा
बाँट लो
और तुम पाँच पतियों में
सिर झुकाए,चुपचाप
बँटने को तैयार हो कैसे गईं?
हुँकार क्यों नहीं भरी
नहीं स्वीकार मुझे
कोई वस्तु नहीं
जीती जागती इंसान हूँ मैं
कदापि नहीं तैयार बँटने को
जो वस्तु बना दे
नहीं स्वीकार वो सप्तपदी भी !

ग़लत को सिर झुका
स्वीकार करते
देखो न फिर
कहाँ लाकर खड़ी
कर दी गईं तुम
बेशर्मों ,कायरों ,बेगैरतों
की सभा में
चौसर की बिसात पर
मातम मनातीं
बदहवास
विलाप करतीं !

इस सबके बाद भी
रहीं सहधर्मिणी
हद है !
क्यों नहीं त्याग किया तब
उन पाँचों का
उस कुल का
उन तथाकथित,सम्मानित
परिजनों का
सडाँध मारती परम्पराओं का
जहाँ वस्तु की तरह
बाँट दी जाती है
और
कौड़ियों की तरह
बिसात पर हार दी जाती है
कुल-वधू भी!

अरे द्रौपदी
एक बार कस कर
कम से कम थूक तो देतीं
उस आलीशान
चमचमाते भवन के
कालिख पुते
प्रांगण पर  !!
                — डॉ. उषा किरण

चित्र; गूगल से साभार

सोमवार, 11 मई 2020

माँ






सारे दिन खटपट करतीं
     लस्त- पस्त हो
   जब झुँझला जातीं
             तब...
  तुम कहतीं-एक दिन
   ऐसे ही मर जाउँगी
       कभी कहतीं -
    देखना मर कर भी
  एक बार तो उठ जाउँगी
           कि चलो-
        समेटते चलें
    हम इस कान सुनते
      तुम्हारा झींकना
  और उस कान निकाल देते
            क्योंकि-
   हम अच्छी तरह जानते थे
       माँ भी कभी मरती हैं !
        कितने सच थे हम
                आज...
      जब अपनी बेटी के पीछे
            किटकिट करती
       घर- गृहस्थी झींकती हूँ
                  तो कहीं-
     मन के किसी कोने में छिपी
          आँचल में मुँह दबा
            तुम धीमे-धीमे
           हंसती हो माँ...!!!

                        ——   उषा किरण
                         रेखाँकन; उषा किरण )

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

एक दिन


तुम तो
नफरत की सिलाइयों से
अपनी बदबूदार सोच का
एक मैला सा स्वेटर बुनो
क्योंकि
तुम्हें क्या मतलब इससे
कि देश मेरा जल रहा है
कराह रहा है
बंट रहा है
तड़प रहा है
भूखा है
डरा हुआ है
मर रहा है
तुम तो बस अपनी
अँधेरी परिधि की हद में
आत्ममुग्ध  हो
गर्वोन्मत्त हो थोड़ा सा भौंह उठा
हल्के से मुस्कुराओ
और फिर से शुरु हो जाओ
क्योंकि-
तुम्हें क्या फर्क पड़ता है कि-
देश मेरा जल रहा है
सिसक रहा है...
तुम तो बस अपनी बदबूदार सोच से
नफरत की सिलाइयों से
एक मैला सा स्वेटर बुनो
पहनो और
सो जाओ !
लेकिन वे जो हैं न
अपनी छोटी -छोटी हथेलियों में
सूरज उगाए बढ़ रहे हैं
बुन रहे हैं एक रोशनी का वितान
वे ही बचा ले जाएंगे अपनी उजास
मेरे देश को
पूरे विश्व को
और मानवता को भी
तुम देखना एक दिन....!!!!

                     — उषा किरण

फोटो:गूगल से साभार

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

ना कहना





तुम ये कहना
तुम वो कहना
इसे भी कहना
उसे भी कहना
इस बात पे कहना
उस बात पे कहना
यहाँ भी कहना
वहाँ भी कहना
जो दिखे
उसे कहना
ना दिखे
उसे भी कहना
सब कुछ कहना
परन्तु...
सही को सही
और
गलत को गलत
बस ये कभी न कहना !!!!!
                     डॉ० उषा किरण
                     ( रेखांकन ; उषा किरण)

बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि.....!



भूल जाना चाहती हूँ इस तारीख को
है ऐसी कोई रबड़ तो इस तारीख को ही
कैलेंडर से मिटा दो कोई
जो तुम्हारी पुण्य- तिथि के नाम से
दर्ज है अब हमारी यादों में !

सारा दिन
सीने से पेट तक
घू-घू करते चक्रवात
और एक दबी ,सुलगती सी चिंगारी
अग्निशिखा सी प्रश्न बन
सिर पटकती है
क्या जल्दी थी इतनी....!

दिल को मुट्ठी में जैसे कोई भींच
निचोड़ता है ...
कि तुम्हारी फिसलती उंगलियों को थाम
किया वादा कहाँ निभा पाई ?
जानती हूँ तुम मेरी मजबूरी समझते होगे

तुम्हारे रोपे पौधे आज वृक्ष बन
आसमानों को छूते
झूम रहे हैं
आशीषों और दुआओं से
हर पल सींचती हूँ

रात घिर रही है
और मन के
अंधेरों में
हजारों उत्ताल तरंगों संग
डूबती-उतराती
अवश सी मैं बुदबुदा रही हूँ
"नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणी .....!”
                                      —उषा किरण

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

वेलेन्टाइन डे



नहीं ...आज तो नहीं है मेरा वैलेंटाइन डे
लेकिन...
मेरे हाथों में मेंहदी लगी देख तुमने
समेट दिए थे चाय के कप जिस दिन
बुखार से तपते माथे पर रखीं
ठंडी पट्टियाँ जब
ठसका लगने पर पानी दे
पीठ सहलाई जब
जानते हो मुझे मंडी जाना नहीं पसंद तो
फ्रिज में लाकर सहेज दिए
फल- सब्ज़ियाँ जब
ठंड से नीली पड़ी उंगलियों को
थाम कर गर्म हथेली में
फूँकों से गर्मी दी जिस दिन
या परेशान देख पिन  लगा दिया साड़ी में जब
बदल दिया बच्चों का गीला नैपकिन और
बूँदें आती देख अलगनी से
उतार दिए कपड़े जब
तेज नमक पर भी खा ली सब्जी या
पी ली फीकी चाय बिना शिकायत जब
पेंटिंग बनाते देख बच्चों को चुपचाप
रेस्तराँ ले गए स्कूटर पर और
मेरा भी करा लाए खाना पैक जब
व्याकुल हो करवाचौथ पर बार-बार
आसमाँ में चाँद ढूँढ रहे थे जब
मेरी बहन ,भाई की तकलीफों में
साथ खड़े हुए जब
आखिरी वक्त पापा ,अम्मा  को थामा जब
मॉर्निंग- वॉक से लौटते हरसिंगार,चंपा के
ओस भीगे सुगन्धित फूल चुन कर
सिरहाने टेबिल पर सजा दिए जब
...................
तब...तब...तब
हाँ हर उस दिन मेरा वैलेंटाइन डे था तब !!!!🌹
                                      —-उषा किरण.
                                          14. 2 .2020

शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

पराजित


तुमने ये कहा
तुमने वो कहा
तुमने ऐसे क्यों कहा
तुमने वैसे क्यों कहा
तुम तो हो ही ऐसी
तुम तो हो ही वैसी
तुमने दिल दुखाया मेरा
अब मेरे दिल का क्या
मेरी फ़ीलिंग्स का क्या
तुमको ऐसे नहीं कहना था
तुमको वैसे नहीं कहना था
टूट गया रिश्ता
टूट गया दिल
..........
हैरान
परेशान
खड़ी हूँ अपने पराजित
'निन्यानवे ‘के साथ
कटघरे में
सिर झुकाए
और ...
मेरा 'एक’ गर्वित
गौरवान्वित
बड़ी चालाकी से
अर्थों का उलट- फेर कर
खड़ा है मैडल लिए जीत का
मुस्कुराता हुआ
उस पार !!

#निन्यानवेकाफेर

शुक्रवार, 31 मई 2019

गाँधारी



जब वे
किसी अस्मिता को रौंद
जिस्म से खेल
विजय-मद के दर्प से चूर
लौटते हैं घरों को ही
तब चीख़ने लगते हैं अख़बार
दरिंदगी दिखाता काँपने लगता है
टी वी स्क्रीन
दहल जाते हैं अहसास
सहम कर नन्हीं चिरैयों को
ऑंचल में छुपा लेती हैं माँएं...
और रक्तरंजित उन हाथों पर
तुम बाँधती हो राखी
पकवानों से सजाती हो थाली
रखती हो व्रत उनकी दीर्घायु के लिए
भरती हो माँग
तर्क करती हो
पर्दे डालती हो
कैसे कर पाती हो ये सब ?
कैसे सुनाई नहीं देतीं
उस दुर्दान्त चेहरे के पीछे झाँकती
किसी अबला की
फटी आँखें,चीखें और गुहार ?
किसी माँ का आर्तनाद
बेबस बाप की बदहवासी ?
बोलो,क्यों नहीं दी पहली सजा तब
जब दहलीज के भीतर
बहन या भाभी की बेइज़्ज़ती की
या जब छीन कर झपटा मनचाहा ?
तुम्हारे इसी मुग्ध अन्धत्व ने
सौ पुत्रों को खोया है
उठो गाँधारी !
अपनी अाँखो से
अब तो पट्टी खोलो...!!

रविवार, 12 मई 2019

"रूट-कैनाल”




बरसों से दर्द पाले,
दुखते दाँत को-
पहले बेहोश किया उसने
फिर नुकीले नश्तरों से
विदीर्ण कर दीं
सारी रूट्स,
अब दाँत डैड था
दर्द का नामो निशान नहीं !
फिर बारी थी आवरण की,
उसने ठोक-पीट कर
एक नकली आवरण
चढ़ा दिया है
हुबहू ...
वही रंग, वही रूप
अब खुश हूँ मैं-
अपने डैड दाँत के साथ
दर्द से मुक्त ,
सारे स्वादों के आनन्द में
मगन !
......
कमाल है ,
एक छोटे से दाँत ने सिखा दिया
बरसों से पाले दर्दों से
मुक्ति का रास्ता....!
                        - उषा किरण

"सुन रही हो न “



सुबह-सुबह
रसोई से उठती ताज़े नाश्तों की सुगन्ध को चीर
ए सी की लहराती शीत तरंगों और
बाथरूम से उठती मादक सुगन्धों को फ़लाँग ,
पथरीली दीवारों का कलेजा चीर
एक आर्तनाद गूँजता है
तथाकथित पॉश कॉलोनी के
सुगढ़ गलियारों में...
चीख़ कर दरख़्तों से उड़ जाते हैं परिंदे
और भी जर्द हो जाता है अमलतास काँप कर
आलीशान कोठी की मनहूसियत को धकेल
दहशत से चीख़ने लगती हैं ईंटें
मस्तक से बहती रक्त की धार और
सीने में हहराते पीड़ा के सागर को हाथों से दबा ,
जमा हुई सभ्य भीड़ से
याचक सी भीख माँगती हैं दया की
 कातर ,सहमी सी आँखें !
-तो क्या हुआ औरत जो तुम पिटीं
सदियों से पिटती ही आई हैं औरतें यूँ ही !
-तो क्या हुआ जो तुम भूखी हो कई दिन से !
- तो क्या हुआ जो एक दिन यूँ ही
अर्थी पर सजने से पहले ही फूँक दी जाओगी !
मत देखो उधर खिड़कियों के पीछे से झांकती
पथराई आँखों और कानों को किसी आशा से
वे सिमटे खड़े हैं वर्जनाओं की परिधियों में जकड़े,
असभ्यता है न किसी की सीमा में अनधिकार चेष्टा ,
और कोई बिना बात क्यूँ बने कन्हैया
क्यूँ पड़े किसी के पचड़े मे
सुनो तुम ,बात समझो-
इससे पहले कि बहती पीड़ाओं के कुँड में डूब जाओ
इससे पहले की सीने की आग राख कर दे तुम्हें
टूट जाए साँसों की डोर
या कि होश साथ छोड़ दे
हिम्मत करो,उठो औरत !
ग़ौर से देखो अपने चारों ओर उठी दीवारों को
क़ैद हो जहाँ तुम
शीशे की कमज़ोर सी दीवार ही तो है मात्र
तो मेरी जान !सुनो तुम,यक़ीन करो
आग को पीते जो ,वो कमज़ोर हो ही नहीं सकते
चाहें जो हो
पहला पत्थर तो उठाना होगा तुमको ही
तो उठाओ और पूरे ज़ोर से घुमा कर उछालो
......
तुम सुन रही हो न ...?
                                 —उषा किरण

रविवार, 24 मार्च 2019

धूप





सुनहरी लटों को झटक
पेड़ों से उछली
खिड़की पर पंजे रख
सोफ़े पर कूदी
और वहाँ से छन्न से
कार्पेट पर पसर गई
हूँ...उधम नहीं...
चाय बनाती किचिन से
उंगली दिखा
बरजती हूँ
जीभ चिढ़ा
खिलखिलाती है
जरा नहीं सुनती
ये धूप भी पूरी
शैतान की नानी है !!

सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

अश्वत्थामा



कहो तो  पाँचाली
अबोध सोए पड़े सुकुमार,अबोध
पुत्रों के हन्ता अश्वत्थामा को
क्यों क्षमा किया तुमने ?
क्यों तुम्हारी करुणा से
तुम्हारा दारुण दु:ख
कम पड़ गया ?
और तुम वासुदेव ...?
तुमने भी श्रीहीन कर छोड़ दिया
उस घायल विषधर को
अजर- अमर होने का
वरदान देकर ?
लपलपाती रक्त सनी तलवार ले
हा-हा कर घूमता है निर्द्वन्द्व
मस्तक पर रिसते बदबूदार घाव सहित
आज भी...
धूँ-धूँ कर जलती प्रतिशोध ज्वाला उसकी
करती रहती है हमें भस्म
नासूर बने ज़ख़्मों से लावा बन
गिरता है रक्त आज भी हम पर
बँट गया है वो,
विस्तार पा गया है...
असंख्य नफरत और प्रतिशोध के नुकीले
नश्तरों को आखिर
कब तक सहेंगे हम ?
कब तक अबोध शिशुओं का
बलिदान देगी माँ ?
नहीं ...वासुदेव अब नहीं
शापमुक्त करो इसे
ले जाओ साथ
या फिर दो गाण्डीव
या ब्रह्मास्त्र हमारे ही  हाथ
ताकि कर सकें
इस आततायी अश्वत्थामा का
स्वयम् संहार
हम !!
               -उषा किरण


गुरुवार, 29 नवंबर 2018

बहादुर लड़की



एक नन्हे से पौधे की ओट में
मीलों चली है वो
आसमान पर तपता सूरज
नीचे जलती जमीन
एक पग धरती है
दूसरा उठा लेती
दूसरा धरती है तो
तिलमिला कर
पहला उठा लेती है
पैर छालों से भरे हैं
मन भी...
कुछ छायादार पेड़
दिखते हैं दूर-दूर
मन करता है दौड़ जाए
टिक जाए कुछ देर
या हमेशा को....
फिर देखती है हाथ में पकड़े
उस नन्हे पौधे को
नहीं ! अभी नहीं....
बुदबुदाती है होठों में
अभी चलना ही होगा
दूर क्षितिज के पास
हरियाली की गोद में
रोपना है इसे
सूरज ढलने से पहले...
वो बहादुर बेटी
निरन्तर
चल रही है मीलों
तपती बंजर जमीन पर...!!!
                        ___उषा किरण

सोमवार, 26 नवंबर 2018

परछाईं

थक जाती है कभी
अपनी ही परछाईं हमसे
दौड़ती रहती है सारा दिन
करती है पीछा कभी
हमारी हसरतों का
हमारी प्यास का
तो कभी
हमारी आस का
हमारे सपनों को
पंख देती है
तो कभी देती है पैर
पर शाम होते ही
हो जाती है गुम
सारी उदासियाँ समेटे
भीतर हमारे
रहने दो वहीं उसे
थोड़ा विश्राम कर लेने दो
आ जाएगी सुबह फिर
लिपट जाएगी पैरों से
फिर एक बार
हौसला बन कर
तो कभी हिम्मत बन कर!!!

शब्द


आसमान की खुली छाती पर
नन्हीं उँगलियों से
पंजों के बल उचक कर
लिखती रहती शब्द अनगिनत
तो कभी
बाथरूम की प्लास्टर उखड़ी
दीवारों पर दिखतीं
आकृतियों के शब्द बुदबुदाती
बुद्ध ,बकरियॉं ,भूत , परियॉं...
बहुत कुछ बोलना चाहती थी पर
शब्द डराते थे मुझे
थका देते थे
हॉंफ जाती बोलते...
सो कुछ नदिया की धारा पर बहा दिए
कुछ हवाओं के पंखों पर सहेज दिए
और बाकी ठेल देती अन्तर गुहा  में...
कभी डांटती तो कभी हौसला देती
खुद को
बोलो ...अब बोलो...
पर होंठों पर एक अस्फुट
फुसफुसाहट कॉंप जाती...
मेरी ख़ामोशियों पर कब्जा था
औरों के दस्तावेज़ों का...
फिर एक दिन सहसा बोलने लगी मैं
और बस बोलती ही चली गई...
अरे चुप रहो
कितना बोलती हो
कान खा गईं
लोगों ने नश्तर फेंके
पर बिना रुके बोलती रही
मैंने सोचा था
मेरे बोलों की तपिश से
पिघल जाएगी सालों की
अनबोले  शब्दों की बर्फ़ीली  चट्टान
पर नहीं....जरा भी नहीं...
हॉं नींद में पलकों पर घात लगा
हमला जरूर करते हैं...
कभी भी पीछा छोड़ते नहीं
रक्तबीज जैसे उपजे
ये कहे - अनकहे शब्द !!

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 11 (अंतिम) रश्मि प्रभा

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 11 (अंतिम)    ताना-बाना उषा किरण  शिवना प्रकाशन  कितना कुछ हम मुट्ठी में भरकर...