ताना बाना

मन की उधेड़बुन से उभरे विचारों को जब शब्द मिले

तो कुछ सिलवटें खुल गईं और कविता में ढल गईं

और जब शब्दों से भी मन भटका

तो रेखाएं उभरीं और

रेखांकन में ढल गईं...

इन्हीं दोनों की जुगलबन्दी से बना है ये

ताना- बाना

यहां मैं और मेरा समय

साथ-साथ बहते हैं

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सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

फ़िल्म तेरे इश्क़ में — मेरे चश्मे से


हाँ तो… यह बनारस की पृष्ठभूमि में शंकर और मुक्ति के प्रेम की कहानी है। फ़िल्म की शुरुआत काफ़ी रोचक तरीके से होती है।

मुक्ति एक मनोविज्ञान की रिसर्च स्कॉलर है, जिसका पी-एच.डी. का वाइवा चल रहा होता है। उसका शोध विषय - "बिगड़े व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक तरीकों से सुधारना” है। क्या किसी बिगड़ैल व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक तरीकों से सुधारा जा सकता है।

उसी समय शंकर वहाँ आकर बेहद गुंडागर्दी करता है और पूरा मामला बिगाड़ देता है। टीचर्स बेहद नाराज हो जाते हैं । मुक्ति इसे एक चुनौती की तरह लेती है और ठान लेती है कि वह हर कीमत पर शंकर को सुधारेगी, ताकि उसकी थीसिस पास हो जाए और उसे डिग्री मिल सके।उसे सुधारने के क्रम में शंकर को उससे जुनून की हद तक प्यार हो जाता है… और इसी तरह कहानी आगे बढ़ती है।

कृति सैनन की खूबसूरती ने मुझे बाँधे रखा, वरना कहानी कोई बहुत खास नहीं है। कथानक पर ध्यान दें तो फ़िल्म में मुक्ति का चरित्र कुछ भटका-सा लगता है।एक कलेक्टर की बेटी, जो अपने और एक गुंडे-मवाली के बीच के अंतर को समझते हुए शंकर के प्यार को अस्वीकार कर आगे बढ़ जाती है, अचानक शंकर की हालत देखकर प्यार में या गिल्ट में इस कदर पागल हो जाती है कि फेरों से उठ जाती है। वह खुद को नशे में इस तरह झोंक देती है कि न तो उसे अपनी परवाह रहती है, न मरते पिता की, न समझदार और प्रेम करने वाले पति की, न ही पेट में पल रहे बच्चे की।

एक अपराधबोध (गिल्ट) क्या सचमुच इतना अटूट प्यार बन सकता है?

क्या प्यार इतना ख़ुदगर्ज़ हो सकता है?

आज ऐसे ही जुनूनी, मर्यादाविहीन , ख़ुदगर्ज़ , विकृत इश्क अख़बारों में दर्ज नहीं हो रहे हैं?

कई जगह फ़िल्म तर्कसंगत नहीं लगती। बाद में डिलीवरी के समय खून से लथपथ मुक्ति का दृश्य इतना लंबा खींचा गया है कि मन घबरा उठता है।

वह सब अलग बात है, पर मेरी सुई जाकर तो अटकती है—बनारस के घाट पर।

शंकर के प्रेम की कीमत चुकाते पिता की मृत्यु हो चुकी है।उनके अंतिम संस्कार के लिए वह बनारस के घाट पर अधमरा-सा बैठा है। तभी एक पंडित उसे रोककर कहता है—

“वाह रे भोले, दुनिया को देता है, खुद को ही नहीं दे पाया—मुक्ति?”

“मुक्ति नाम है उसका। चाहे मर या मार—न मिलेगी।”

“प्रेम में मृत्यु है, मुक्ति नहीं।”

शंकर तड़पकर कहता है—

“बचा लो मुझे… यदि मरकर भी दर्द कम नहीं हुआ तो क्या करूँगा?”

पंडित कहता है—

“दर्द तो तेरा कैसे भी कम नहीं होगा, किसी का कम नहीं होता। उठ और अपने प्यार के ताप को पास से देख। अपने बाप का जलता सिर देख…हाथ-पैर, दिल गुर्दा सब जलते देख। 

मर जाओगे, पंडित, मुक्ति नहीँ मिलेगी, न यहां और न हि वहां…

मुक्ति के पीछे भाग मत। अपने इश्क़ में इतना जल कि मुक्ति तेरे पैरों में गिरकर भीख माँगे कि स्वीकार कर लो मुझे।

और बाकी तू चिंता मत कर—बनारस तेरा पिंडदान कर देगा। हर आशिक़ का करता है!”

हीरोइन का नाम है मुक्ति, हीरो का नाम है शंकर, और स्थान है बनारस का मणिकर्णिका घाट—मेरा दिमाग़ बस यहीं अटक गया है…

पंडित कहता है—

“वाह रे भोले, दुनिया को देता है, खुद को नहीं दे पाया मुक्ति।”

“प्रेम में मृत्यु है, मुक्ति नहीं।”

“मुक्ति के पीछे भाग मत…”

फ़िल्म सामने चल रही थी और मेरे मानस में सती-प्रकरण चल रहा था— 

प्रेम में पति का अपमान सहन न कर पाने पर सती जल गईं।

प्रेम में उद्विग्न—सती के न रहने से बावले होकर उनकी जली देह को कान्धे पर लिए सारे जगत में भटकते शिव। मन में चैन नहीं, असह्य पीड़ा है—उससे मुक्ति नहीं।

प्रेम में शिव को भी मुक्ति नहीं।

ये मोह, प्रेम, ये शिव की नगरी बनारस…

मणिकर्णिका पर निरंतर जलती धूँ-धूँ करती देह…सब नश्वर है।

मानो बनारस -घाट कह रहा है…संसार से प्रेम करने पर यही मिलती है—मृत्यु, मुक्ति नहीं।

जाने कहाँ-कहाँ भटकता हुआ मन अंततः शंकर के अद्वैतवाद पर आकर उद्घोष करता है-

"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या…”

पंडित कहता है—“तुझे मुक्ति नहीं मिलेगी।”

लेकिन मन धीरे से यह भी कहता है—

जिसे मुक्ति की भी परवाह नहीं, क्या वह पहले से मुक्त नहीं?

मुक्ति, शंकर और बनारस का मणिकर्णिका घाट…मेरे विचार से यह फिल्म वही नहीं है जो दिखती है—वह हमसे कुछ और, बहुत कुछ कहना चाहती है।  कई बार कोई कहानी , फिल्म या कोई पेंटिंग कई पर्तें उघाड़ती है…वह हमसे कई तरह से , कई भाषाओं में संवाद करती है, सबसे एक तरह से नहीं…आत्म-मंथन की आवश्यकता है।


खैर… यह तो मेरा चिंतन है। आपकी आप जानें। फिल्म बनाने वाले अपनी जानें, मेरा मन तो छानकर  अपने मन की  बात निकाल लेता है…मेरे विचारों से सहमत होना आपके लिए कतई आवश्यक नहीं…जय भोले🙏🌿


खैर… यह तो मेरा चिंतन है। आपकी आप जानें। फिल्म बनाने वाले अपनी जानें, मेरा मन तो छानकर  अपने मन की  बात निकाल लेता है…मेरे विचारों से सहमत होना आपके लिए कतई आवश्यक नहीं…जय भोले🙏🌿

—उषा किरण 

शनिवार, 1 जून 2024

पंचायत वेब सीरीज, सीजन 3

 





लेखक ; चंदन कुमार

निर्देशक ; दीपक कुमार मिश्रा

अभिनय ; जितेंद्र कुमार, रघुवीर यादव, 

नीना गुप्ता ; चंदन राय ; फैजल मलिक 


वेब सीरीज पंचायत का तीसरा सीज़न भी धमाल है और नवीनता बरकरार है। हम तो आठों भाग डेढ़ दिन में देख गए।यदि आपका वास्ता गाँव से पड़ा है तो यकीनन आपको बहुत मजा आने वाला है। हम सपरिवार बचपन में छुट्टियों में गाँव जाते रहे हैं और गाँव को खूब देखा परखा है । कमाल की कहानी लिखी है और कमाल का डायरेक्शन भी है। देख कर लगता है कि कथाकार व डायरेक्टर के जीवन का जरूर काफी हिस्सा गाँव में बीता है। 


इस बार फुलेरा गाँव और विधायक की नाक की लड़ाई पर सारा पंचायत सीजन तीन केन्द्रित है ।जब भी बार- बार गाँव के लोगों का नफरत व मजाक उड़ाते हुए कहना "विधायक कुत्ता मार के खा गया” सुनती तो मुझे जोरों की हंसी आ जाती थी। सोचो ज़रा विधायक जी कुत्ता खा रहे हैं , सोच कर ही हंसी आती है।विधायक जी की बौखलाहट देखने लायक है और तिस पर कयामत ये कि फुलेरा गाँव वाले विधायक को दो कौड़ी का कुछ नहीं समझते, सिवाय कुछ फितरती लोगों के।


नया कैरेक्टर मुझे सबसे प्यारा लगा अम्माँ जी का। जगमोहन की अम्माँ का मकान लेने के लिए छल- कपट करना, कहानी बनाना और कभी दीन- हीन तो कभी चतुर चालाक वाले एक्सप्रेशन ग़ज़ब के दिए हैं । कई करैक्टर तो ऐसे हैं जैसे गाँव से ही पकड़ कर आम आदमी से एक्टिंग करवाई गई हो।


जो बहुत बारीकी से बात पकड़ी है वो है गाँव के लोगों की मानसिकता। प्राय: वे चौपाल पर, पेड़ के नीचे बैठे टूटी सड़क की बनवाने जैसी समस्याओं पर विचार विमर्श करते रहते हैं। गाँवों के आदमियों को किसी विषय पर चाहें जानकारी न हो पर प्राय: कॉन्फ़िडेंस ग़ज़ब होता है।दाँवपेंच, दूसरे को पटकी देने की साजिश, चालाकियाँ, दुश्मनी निकालने के तरीके, आपसी सौहार्द, परस्पर सुख- दुख में भागीदारी सब कुछ जो एक गाँव की मिट्टी में समाया होता है पंचायत में मिलेगा। बाकी तो सचिन जी के रिंकी से इश्क के पेंच  इशारों-इशारों में हौले - हौले चल ही रहे हैं । गाँव के मेहमान ( दामाद जी )की ठसक और शेखी भी खूब दिखाई है।एक के दामाद सारे गाँव के मेहमान हैं । 


पहले गाँवों में गोरे दिखने के लिए अफगान स्नो क्रीम की चेहरे पर रगड़ाई चलती थी और उस पर टैल्कम पाउडर  हथेली में लेकर चुपड़ लिया जाता था तो चेहरे पर सफेदी सी नजर आती थी। प्रधान बनी नीना गुप्ता का मेकअप उसी तर्ज पर किया गया है, देखकर हमें अपने गाँव की कई बहुओं , चाचियों के मेकअप की याद ताजा हो गई।


प्राय: गाँव में जब चार  लोग जमा होकर हंसी ठट्ठा करते हैं तो छोटी सी बात पर भी ताली बजाकर खूब मजे लेते हैं । विधायक जी के कबूतर उड़ाने को ख्वाहिश पर वैसे ही ठट्ठे प्रधान जी की टीम लगाती है।प्रह्लाद का बेटे के गम में दारू पीकर पड़े रहना और विकास, प्रधान जी व सबका उनका ध्यान रखना बहुत दिल को छू जाता है।


बम बहादुर की दबंगई व चतुराई देखते बनता है। गाँव का उसके साथ खड़ा रहना, गाँव में दो ग्रुपों पूरब वाले व पश्चिम वालों के बीच की खींचातानी सब रोचक है। बम बहादुर ने छोटे से रोल में जान फूंक दी है।कुल मिलाकर देख डालिए। 


आप कहेंगे भई क्यूँ देखें ? तो ग्रामीण भारतीय जीवन का चित्रण,जीवन की चुनौतियाँ आपको भी पसंद आएगी। कलाकारों का अभिनय और गाँव की राजनीति, स्थानों, वेशभूषा और भावनाओं का सजीव व विस्तृत चित्रण हुआ है। यकीन मानिए ये तय है कि आखिरी सीन देखते ही आप भी मेरी तरह अगले सीजन का इंतजार शुरु कर देंगे। 

                      —उषा किरण

फ़िल्म तेरे इश्क़ में — मेरे चश्मे से

हाँ तो… यह बनारस की पृष्ठभूमि में शंकर और मुक्ति के प्रेम की कहानी है। फ़िल्म की शुरुआत काफ़ी रोचक तरीके से होती है। मुक्ति एक मनोविज्ञान की...