ताना बाना

मन की उधेड़बुन से उभरे विचारों को जब शब्द मिले

तो कुछ सिलवटें खुल गईं और कविता में ढल गईं

और जब शब्दों से भी मन भटका

तो रेखाएं उभरीं और

रेखांकन में ढल गईं...

इन्हीं दोनों की जुगलबन्दी से बना है ये

ताना- बाना

यहां मैं और मेरा समय

साथ-साथ बहते हैं

स्मृति -चित्रण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
स्मृति -चित्रण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 29 मई 2020

आँचल की खुशबू


"उषा इधर आओ”
“हाँ....क्या ?”
"चलो तुम ये भिंडी काटो”
"हैं भिंडी ...पर क्यों.....मैं क्यों ?”
“मैं क्यों का क्या मतलब ? काटो भिंडी हम कह रहे हैं बस...हर समय किताबों में घुसी रहती हो ये नहीं कि कुछ काम- काज सीखो ।”
"अब ये भिंडी काटने में क्या सीखना होता है भई...ए राजपाल सुनो इधर आओ चलो तुम ये भिंडी काटो...हमें पढ़ना है।”
“अरे राजपाल से हम भी कटवा लेते पर ये भिंडी आज तुम ही काटोगी समझीं “ अब तक अम्माँ को गुस्सा आ चुका था तो हमने चुपचाप बैठ कर फटाफट भिंडी कतरने में ही अपनी खैर समझी।
“ये भिंडी काटी हैं तुमने कोई छोटी कोई बड़ी और बिना देखे काटे जा रही हो जाने कितने कीड़े काट दोगी तुम ?”
“अरे हम कीड़े देखते जा रहे थे पर छोटी बड़ी से क्या फर्क पड़ने वाला है सब्ज़ी पक के सब बराबर ही हो जानी हैं “ हम चिनचिनाए।
“रुको ...देखो जो छोटी होगी वो जल्दी पक जाएगी और जो बड़ी है वो देर से तो जब तक बड़ी पकेगी छोटी भिंडी घुट जाएगी ...समझीं...सिर्फ़ दो चार पेंटिंग बना कर दीवार पर सजा देना ही काफी नहीं होता ,हर काम में कलात्मकता होनी चाहिए ...खाली कविता कहानी से ही जीवन नहीं चलता है !”
उनका लैक्चर शुरु हो चुका था ...बात पूरी हो हम तब तक अपने दड़बे में घुस किताब उठा चुके थे,बात ख़त्म ।
पर बात वहीं ख़त्म नहीं हुई ...आज उस बात के 43 साल बाद भी जब भी ,जितनी बार हमने भिंडी काटी हैं ये भिंडी प्रकरण हमेशा स्मृतियों में भिंडी सा चिपक कर साथ चला आया है।
बस अम्माँ यूँ ही चलती हो तुम साथ मेरे ...अपनी बातों, नसीहतों , मुहावरों और किस्सों से महकती हो मेरे भीतर ...तुम्हारी पीठ से चिपक कर तुम्हारा पल्लू सूँघती थी मैं जब छोटी थी ...क्या पता था अनजाने में ही जीवन भर के लिए वो सुगन्ध अन्तर्तम में बसा रही थी मैं...माँ कभी भी कहीं नहीं जातीं !!

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

ताता जी

                                     


याद करती हूँ जब भी आप को तो स्मृतियों में बेला महक उठता है आप क्यारी से बेले के फूल तोड़ कर तकिए के पास या मेज पर रख लेते थे...महकता रहता सारा दिन आपका कमरा।
आज तक ये रहस्य हम नहीं समझ पाते कि वो आपकी चादर,कपड़ों,से दिव्य महक कैसे आती थी । आप कपड़े धोने को देते तो हम नाक लगा कर सूँघते कि ये पसीना इतना कैसे  महकता है  हम हैरान होते ..दिव्य पुरुष ही थे आप !
बहुत कम सोच समझ कर बोलते थे ।बेहद नफ़ासत पसन्द व्यक्तित्व था।आपके  बोलने, चलने,खाने- पीने , हंसने सभी में आभिजात्य झलकता।
आपके पास कम  कपड़े होते थे पर उस समय भी ब्राँडेड शर्ट ही पहनते थे । कपड़ों को इतना संभाल
कर पहनते कि वो दसियों साल चल जाते ।आपके जाने के बाद इतने कम कपड़े थे कि उनको बाँटने में कोई परेशानी नहीं हुई मुझे ।मैं अक्सर बेटी से कहती हूँ कि मेरे बाद तुम्हारी हालत खराब हो जाएगी बाँटते- बाँटते ।
  बैडशीट में एक भी सिलवट हो सो नहीं सकते थे । नौकर-चाकर होने पर भी अपनी बैडशीट  खुद बिछाते और फिर सेफ्टिपिन्स से चारों तरफ से खींच कर पिनअप कर देते । कभी जब शीट गन्दी देख अम्माँ  बदलतीं तो पिन निकालते- निकालते भुनभुनाती रहतीं।ये जीन्स मेरे बेटे में आए  हैं बचपन से ही वो उठ-उठ कर चादर की सिलवटें निकालता रहता है
,आप भागलपुरी चादर सिर से पैर तक तान कर सोते थे । बेटी मिट्ठू जब  छोटी थी और जब मैं घर जाती  तब चुपके से आपकी चादर खींच कर उतार लेती और लेकर भाग जाती उसे उनकी चादर का सॉफ्ट टच और खुशबू बहुत भाती थी जब मैं वापिस मेरठ लौट रही थी पैकिंग करते समय आपने वो चादर मुझे देकर कहा`रख लो बेटी मिट्ठू को बहुत पसंद है ‘कहते आपका चेहरा ममता से भीग गया था आपमें बहुत ममत्व था।
         बस एक रोटी ,दो चम्मच चावल ही खाते थे । अम्माँ जब आपकी थाली लगातीं तो लगता जैसे ठाकुर जी का भोग लगा रही हों कपड़े से पोंछने के बाद अपनी धुली सूती धोती के पल्लू से भी एक बार पोछतीं फिर रच- रच कर अपने हाथ का  अमृततुल्य स्वादिष्ट भोजन बिना हड़बड़ी के बहुत धैर्य से लगातीं ।छोटी सी कटोरी में एक चम्मच घी और एक छोटी कटोरी में ताजी सिल पर पिसी चटनी भी रखतीं । उनको थाली लगाते हम बड़े मनोयोग से देखते फिर हमें बहुत संभाल के थमातीं  कहीं जरा भी कोई छींट या बूँद न रहे ये ध्यान रखतीं हम लोग भी बहुत साध कर ले जाते ।
आप कभी डाँटते नहीं थे हम लोगों को ,बस अम्माँ से कहलवा देते जो बात पसंद न आती तो।मुझसे गल्ती बहुत होती थीं जाने ध्यान कहाँ-कहाँ उड़ा रहता ।कभी बर्तन तोड़ देती , कभी कुछ बिखेर देती कहीं कुछ छोड़ आती ।मेरी गलती पर `पूरी फिलॉस्फर हो तुम ‘इतना ही कहते । छोटी बहन निरुपमा खूब पटर- पटर बोलती थी ।जैसे ही आप ऑफिस से आते चेंज कर कॉफी पीते सारे दिन के सब समाचार सुनाने बैठ जाती।कहते `आओ भाई सेक्रेटरी क्या खबरें हैं ‘और बस वो शुरु...।
मेरी और सब भाई- बहनों की उपलब्धियों पर जी भर कर सराहते ।जब भी मैं कोई पेंटिंग बनाती तो शाबाशी देते ,कोई कहानी या कविता छपती तो बहुत खुश होते थे ।पता नहीं क्यों मैं पहले जब कुछ बड़ी हुई तो डरती थी आपसे फिर सब डर निकल गया जब अम्माँ ने उनको बताया तो आप मुझसे ज्यादा बातें करने लगे , प्राय: हम भाई-बहनों को खुद पढ़ाते भी थे ।
         इतने कड़क अफसर ...पर फिल्म देख कर कोई इमोशनल सीन आने पर चुपके से रोते थे खास कर माँ का कोई सीन होता तो । हमने दादी को नहीं देखा पर उनके लिए जो श्रद्धा थी ...भक्ति थी वो हमने देखी।
आप हमेशा टिप- टॉप रहते। सन्डे में भी नहा धोकर  अच्छे से तैयार होते ।आप सारे दिन न्यूज सुनते प्राय: बी बी सी न्यूज और कैप्सटन के पेपर व तम्बाकू से सिगरेट बना कर सिगरेट - केस में रखते जाते ।बचपन में मैं और भैया एक दो  पार कर लेते और छिपा कर सुट्टे लगाते कभी- कभी और सोचते थे आपको पता नहीं चलता होगा पर आपको पता होता था ये मुझे शादी के बाद बताया तो मैंने पूछा आपको कैसे पता चलता था बोले मैं गिन कर रखता था । आज तक ताज्जुब है कि आपने कभी नहीं कहा कुछ शायद भरोसा था ...बच्चों की शैतानी है समझते थे।
हम लोगों को जब भी बुखार आता तो दवा देना, थर्मामीटर लगाना,सिर पर पट्टी रखने का काम आप ही करते थे कितना परेशान हो जाते हमारी तकलीफ देख कर।
             हम नैनीताल या मसूरी घूमने जाते तो थकने पर चढ़ाई पर बारी- बारी से हम चारों को गोद में उठा लेते कुछ- कुछ देर के लिए।छुट्टियों में कभी नैनीताल, मसूरी शिमला ले जाते क्योंकि पहाड़ बहुत पसंद थे और कभी गाँव में ताऊजी ताईजी के पास जहाँ हम जम कर मस्ती करते और आप लखनवी कुर्ता और धोती पहन दोस्तों से जब मिलने निकलते तो आपका वो रूप कितना बेफिक्र , भव्य होता ।गाँव में भी लोगों की बहुत मदद करते थे बहुत इज्जत और प्यार करते थे वहाँ सब आपकी ।हम जहाँ से निकलते सब कहते `अरे बे सन्त की लली हैं ऊसा ?’
हम तीनों बहनों को लेकर आप बहुत संवेदनशील थे । अम्माँ बताती हैं मैं सबसे ज्यादा जिद्दी थी बहुत रोती और रोती तो रोती ही चली जाती जोर -जोर से।अम्माँ सर्वेन्ट को कहतीं 'साहब के पास ले जा उठा कर ‘और मैं आपके पास जाते ही चुप हो जाती अम्माँ को ही सुनना पड़ता कि वो मेरा ध्यान नहीं रखती हैं।आप अक्सर कहते `उषा बिल्कुल मुझ पर गई है मैं भी बहुत जिद्दी था।’
बेटी मिट्ठू जब हुई तो मैं एक महिने की होते ही ग़ाज़ियाबाद अपने घर आ गई थी।बहुत सुबह ही
अम्माँ के उठने से भी पहले मिट्ठू को उठा कर अपने रूम में ले जाते और कह जाते `अब तुम सो लो आराम से ‘ सबसे कहते शोर मत करना वो सो नहीं पाई होगी और सारी रात की जागी मैं दो तीन घंटे खूब चैन से सो पाती पैर पसार कर ।
नाम भर के नहीं आप सच में `सन्त ‘थे ताताजी ।आप कृष्ण के परम् भक्त थे अंतिम समय में , कोमा में जाने से पहले तक भी  निर्विकार रूप से"ओम् नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप कर रहे थे कितना दुर्लभ है पूरा जीवन ऐश्वर्यशाली जीवन जीने के बाद अंत समय यदि स्मरण रहे प्रभु नाम और बाकी कुछ भी ममता बाकी न रहे ।
हमारा सौभाग्य कि हम आपके बच्चे थे । कितना कुछ लिखना चाहती हूँ पर ज़्यादा नहीं लिख पाती बहुत तकलीफ़ होती है लिखे बिना भी बेचैनी होती है बहुत...।
आज आपके 95 th जन्मदिवस पर हमारा शत- शत नमन ...🙏यदि अगला जन्म हो तो आपके आस- पास ही रहें हम ।आप जहाँ कहीं हों हमपर आशीर्वाद बनाए रखिएगा.....ईश्वर से प्रार्थना है कि आपकी आत्मा को शाँति प्रदान करें 🙏😔




ताना - बाना - मेरी नज़र से - 11 (अंतिम) रश्मि प्रभा

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 11 (अंतिम)    ताना-बाना उषा किरण  शिवना प्रकाशन  कितना कुछ हम मुट्ठी में भरकर...