ताना बाना

मन की उधेड़बुन से उभरे विचारों को जब शब्द मिले

तो कुछ सिलवटें खुल गईं और कविता में ढल गईं

और जब शब्दों से भी मन भटका

तो रेखाएं उभरीं और

रेखांकन में ढल गईं...

इन्हीं दोनों की जुगलबन्दी से बना है ये

ताना- बाना

यहां मैं और मेरा समय

साथ-साथ बहते हैं

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शनिवार, 18 जनवरी 2020

अनकही


                            ————
   
चूँ कि मुझे  हर काम इत्मिनान से करना पसंद है तो हमेशा फ़्लाइट के लिए काफ़ी मार्जिन लेकर ही  घर से निकलता हूँ ।वैसे भी एयर पोर्ट पर ड्यूटी-फ़्री शॉप्स से छोटी-मोटी शॉपिंग करना मुझे पसंद है । सोनल के लिए परफ्यूम और ईशान के लिए शर्ट ले ली थी और अपने लिए अपनी मनपसंद स्टारबक्स की लार्ज कॉफ़ी लाते लेकर आराम से बैठ कर सिप लेने लगा था कि देखा बोर्डिंग स्टार्ट हो गई तो कॉफ़ी ख़त्म कर उठ गया ।
अपनी सीट ढूँढ कर मैंने केबिन में सूटकेस जमाया और इत्मिनान से बैठ  आस-पास का जायज़ा लेने लगा ।विंडो सीट पर एक स्टूडेंट्स टाइप लड़का कानों में ईयरफ़ोन लगा कर चिप्स खाने में मस्त था लेफ़्ट वाली सीट ख़ाली थी अभी ।
फ़्लाइट से पहले मुझे हमेशा ये टेंशन रहता है कि पता नहीं आजू-बाज़ू के सहयात्री कौन होंगे ,कई बार कोई महिला यदि छोटे बच्चे के साथ हो तो परेशानी हो जाती है ।सहसा याद आया तो सोनल को फ़ोन लगा कर बात की और इत्मिनान से मैगज़ीन के पन्ने पलटने लगा ।
बराबर वाली सीट के पास आकर एक महिला सीट नं॰ चैक करने लगी उसकी शक्ल देखते ही लगा जैसे धड़कन रुक जाएगी 'नताशा ...हाँ वही ...वही तो है...तीस साल बाद !’मैंने देखा वो केबिन में बैग रखने की कोशिश कर रही है उसे परेशान देख मैं उठा ।
"मे आई “ कह कर उसका बैग सैट कर दिया ।
"थैंक्स” कह कर जैसे ही उसकी दृष्टि मेरे चेहरे पर पड़ी वो भी चौंक पड़ी फिर तुरंत ही सँभली और बैठ कर सीट-बैल्ट बाँधने लगी ।मैंने नोटिस किया उसके चेहरे पर कुछ बादल से घुमड़ आए थे पर वो तटस्थ सी बैठी रही ।मैं मैगज़ीन में आँखें गढ़ा पढ़ने का बहाना करने लगा और वो भी सैटिल होकर पर्स से कोई बुक निकाल कर पढ़ने लगी ।
यूँ तो वक़्त की धारा बहा ले जाती है आदमी को बहुत आगे पर कुछ ज़िद्दी पत्तों जैसे पल इंकार कर देते हैं धारा में बहने से और वहीं कहीं तटों के सीने में मुँह छिपाए बरसों दुबके पड़े रहते हैं ।
कितनी बदल गई है नताशा पर पहले से ज़्यादा सुंदर और स्मार्ट लग रही है । क्रीम कलर का रॉ सिल्क का सूट ,खोल कर लिया ब्लैक एन्ड क्रीम कलर का सिल्क का दुपट्टा ,पर्ल एन्ड डायमंड के टॉप्स ,काली बिंदी,कॉपर कलर की सैंडिल,कलाई में चौड़ा सा डायमंड का बैंगल, पीठ पर कमर तक लहराते खुले रेशमी बाल।कनपटियों से इक्के-दुक्के चाँदी के तार झलक रहे थे,सिर पर गॉगल्स टिकाए वो पहले से कहीं ज़्यादा स्मार्ट और कॉन्फ़िडेंट लग रही थी ।लम्बी तो थी ही रंग भी पहले से साफ़ हो गया था ।बदन भर गया था पर एकदम सुडौल ।बड़ी- बड़ी पनीली सपनीली सी आँखें अब भी वैसी ही थीं नीर भरी बदरी सी, लगता बस अब बरसीं कि तब बरसीं।उसमें से पता नहीं किस इत्र या परफ़्यूम की भीनी- भीनी आती किसी फूल जैसी ख़ुशबू से मुझे तन्द्रा घेर रही थी ।
जिस तरह वो मुझे देख कर चौंकी थी उससे शक की कोई गुंजाइश ही नहीं रही थी, फिर तनु ने फ़ेसबुक एकाउन्ट मुझसे ही तो बनवाया था तो पासवर्ड मुझे पता था ।प्राय: तनु के एकाउन्ट की गलियों से सेंध लगा फ़ेसबुक की खिड़की से नताशा की वॉल पर उसके सुन्दर संसार में ताक-झाँक कर लेता था ,इसी से पल भर में ही पहचान गया मैं ।बच्चों के साथ, पति के साथ बिताए ख़ुशनुमा पलों , पर्व-त्योहारों पर रंगोली बनाते,दिए सजाते,रंग खेलते ,बच्चों और पति के साथ नाचते -गाते फ़ोटो को देख प्रतीत होता था वो बहुत ख़ुश और संतुष्ट है अपने जीवन में ।
पहचान तो लिया मैंने वर्ना वो इतनी बदल गई थी कि बिना परिचय पहचानना असंभव होता।तब की छुई- मुई लतिका सी नताशा अब पुष्पित छितराए तरु में परिवर्तित हो बेहद आकर्षक हो चुकी थी ।सोचा नाम पूछूँ या हलो कहूँ ? फिर रुक गया ,मन ही मन कहा 'छोड़ो शेखर बेटा अब क्या कहना ,क्या सुनना जब वक़्त रहते ही नहीं कह पाए तुम कुछ, तो अब तो रहने ही दो !’ मेरे मन में भयंकर उथल -पुथल मची थी l मन में उठा बवंडर जाने कहाँ -कहाँ उड़ाए लिए जा रहा था मुझे ।खिड़की के बाहर बादल साथ-साथ दौड़ रहे थे और मन मेरा अतीत के पीछे -पीछे।
उस दिन एग्ज़ाम बाद थका-हारा छुट्टियों में घर आकर लम्बी चादर तान कर सो रहा था कि सुबह ही तनु ने चादर खींच कर झिंझोड़ दिया "भैया...ओ भैया उठो जल्दी !”
"अरे क्या है सोने दे न” मैंने झुंझला कर चादर फिर सिर तक तान ली ।
"अरे आख़िरी डेट है आज एडमिशन की ,मेरा फ़ॉर्म कॉलेज में जमा कर आओ ...उट्ठो जल्दी तुम!”
" क्या है ख़ुद जा न, मुझे सोने दे !”
"अभी कहती हूँ मम्मी को ,मम्मी....मम्मी” फिर मम्मी आईं , तो उठना ही पड़ा ।
"चुडै़ल ...पिछले जन्म की दुश्मन है तू मेरी” एक धौल उसकी पीठ पर जमा बाथरूम में घुस गया।
इतना ग़ुस्सा आ रहा था ...टेलर के यहाँ से कपड़े ला दो,मार्केट तक छोड़ आओ,मेरी फ्रैंड के यहाँ छोड़ दो,मूवी दिखाने ले चलो... मेरे आने से पहले ही हमेशा एक लम्बी लिस्ट तैयार रहती तनु की ।
एक कप चाय पी जींस चढ़ा कर स्कूटर स्टार्ट करते ही तनु पीछे से चिल्लाई "अरे नहा तो लेते भैया”।
" कौन तेरे लिए दूल्हा देखने जा रहा हूँ आकर नहाऊँगा “ मैंने कहा। 
कॉलेज में एडमिशन का आख़िरी दिन होने से बहुत भीड़ थी ।लड़किएं तरह-तरह के सवाल पूछ रही थीं और काउंटर पर बैठा क्लर्क चिड़चिड़ा कर ,झुँझला कर जवाब दे रहा था।
मैं साइड में पड़ी कुर्सी पर बैठ गया ,सोचा जब भीड़ छँट जाएगी तब इत्मिनान से जमा करूँगा।तभी मैंने देखा कि एक दुबली-पतली लम्बी ,मासूम सी सूरत वाली , आसमानी सूट पहने लड़की से क्लर्क बत्तमीजी से बात कर रहा था ।
"देखती पढ़ती हैं नहीं कुछ ,बस मुँह उठा कर चली आईं ,अरे भरने से पहले फ़ॉर्म पढ़ तो लेतीं मैडम प्रॉस्पेक्टस में कहीं लिखा है कि म्यूज़िक है हमारे कालेज में ...हैं ? “
" पर...पर हमने तो पेपर में पढ़ा था ...”वो हकला कर बोली ,उसके माथे पर पसीना आ गया,चेहरा अपमान और शर्म से लाल पड़ गया।वो बेहद नर्वस हो गई।
" अरे ये लो न पॉलीटिकल साइंस ,कितने अच्छे नं॰ हैं इसमें तुम्हारे “ उसने दाँत फाड़ते हुए कहा।उस लड़की का चेहरा रुँआसा हो रहा था ।अब मुझसे नहीं रहा गया वहीं बैठे- बैठे मैंने ग़ुस्से से आँखें निकालीं ।
"यहाँ बैठने से पहले आप ज़रा होमवर्क कर लेते तो अच्छा नहीं रहता वैसे ? पेपर में छपा है इस साल से म्यूज़िक शुरु हो रहा है आपके कॉलेज में और आपको ही पता नहीं ? आप इसी कॉलेज से हैं या कहीं से उधारी पर लाए गए हैं ? अपनी मर्ज़ी के सब्जेक्ट बाँट रहे हैं ...हाऊ कैन यू डू दिस ?”मैंने सख्ती से हड़काया।
उसने जल्दी से मेज़ की दराज़ से एक फ़ाइल निकाली और उलट-पलट कर देखी फिर दाँत निपोर कर बोला "अरे जी अकेली जान क्या-क्या देखूँ ? जे कालेज वाले भी रोज़ ही कोई नया नियम बना देवैं हैं बताओ हम भी क्या करें और जे लड़कियों ने भी मार दिमाग का फ़ालूदा कर रखा है जी, हमारी भी मुसीबत है ।लाओ जी मुन्नी फ़ार्म दो हम ओ. के.कर देते हैं बाद में देखेंगे ।”सभी लड़कियों के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई ।
"चलो किसी ने तो अक़्ल ठिकाने लगाई खड़ूस की” कोई लड़की फुसफुसाई ।
उस आसमानी सी लड़की के चेहरे पर कुछ सुकून और आँखों में कृतज्ञता छलक उठी । उसने बैग से झट पैसे निकाले और फ़ॉर्म के साथ जमा कर सर्र से निकल गई "थैंक्यू” जाते-जाते नीची निगाह कर धीरे से कह गई ।मैं मुस्कुरा दिया।
" अरे पता है वहाँ वो तेरी भायली ...क्या नाम है उसका... हाँ नताशा शर्मा भी आई थी ।बस तू ही लाट साहब है वहाँ लड़कियों में भेज दिया मुझे “मैं घर आकर तनु से बोला।
" अरे पर तुमको कैसे पता भैया कि वो नताशा ही थी ? तनु ने हाथ नचा कर उत्साह से पूछा।
“अरे फ़ॉर्म पर पढ़ा मैंने और तू भूल गई तूने शिमला ट्रिप की फ़ोटो दिखाई थीं न मुझे इसी से पहचान गया ।पर इस ज़माने में इतनी छुई- मुई रह कर काम चलता है क्या ? मिनमिन कर रही थी ये नहीं कि डाँट लगा देती उस बत्तमीज क्लर्क की “।तनु को मैंने सारी बात बताई फिर ।
"अरे भैया वो बहुत सीधी और पढ़ाकू टाइप है ।लड़ना- भिड़ना उसके बस का नहीं ।”
पहले दिन तनु जब कॉलेज गई तो लौट कर मुझ पर फट पड़ी “भैया तुमने मेरी इज़्ज़त का कचड़ा कर दिया हाँ नहीं तो ।”
“अरे मैंने क्या किया भई,क्या हुआ?”
" होना क्या था पता है आज कॉलेज में जब मैंने नताशा को बताया कि " पता है उस दिन भैया ने तुमको देखा था और मिनमिनाने वाली बात बताई तो पता है क्या बोली वो ?” तनु ने अपनी आँखें गोल करके कहा ।
" क्या कहा ये तो बताओ “ मैंने हँस कर कहा ।
" बोली ' ओहो ! तो वो लम्बू थे तुम्हारे भैया ? छि: नहाते नहीं ,शेव नहीं करते क्या और शर्ट तो लग रहा था जैसे घड़े से निकाल कर पहनी थी,बैड से सीधे उठ कर आ गए थे क्या जनाब ?’ कहा था कि नहीं तुमसे नहा कर जाओ मुझे यही डर था कि मेरी कोई फ्रैंड न देख ले तुमको ?” तनु की आँखें और गोल हो गईं ।वो वाक़ई शर्मिंदा लग रही थी सिर पकड़ कर बैठ गई।
" हा हा शेरों के मुँह किसने धोए...वैसे बोल भी लेती हैं मैडम, मैं तो समझा था कि बस मिनमिन ही करती हैं ,उसे तो मेरा शुक्रगुज़ार होना चाहिए था...इतना कचकच जो मेरे लिए बोल रही थी तो वहाँ तो बोला नहीं गया, तब तो रूआँसी सी ,गूँगी गुड़िया बनी खड़ी थीं... और मुझे सर्टिफ़िकेट नहीं लेना उससे ,कह देना ...हुँह !“ मैंने लापरवाही से कहा जैसे मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता हो।
" मिनमिन ? पता भी है बेस्ट डिबेटर थी स्कूल में “ ।
" हाँ तो यहाँ कौन कम हैं गोल्ड मैडलिस्ट हैं बता देना ज़रा उसे, कहीं ऐसा- वैसा समझ रही हो ।वो तो हम ज़रा सादगी पसंद हैं “ जाते-जाते मैंने नाटकीय अंदाज में कॉलर खड़े किए ।
सच तो ये है कि उसकी मासूम सूरत और भोली सी आँखों ने मुझे बाँध लिया था ।सारे दिन उसकी बातें और सूरत मेरे मन-मस्तिष्क में घूमती रहीं और उसकी बात पर हँसी आती रही।
जब भी हॉस्टल से छुट्टियों में घर आता वो तनु के साथ पढ़ती ,बैडमिंटन खेलती, मेंहदी लगाती तो कभी झूले की पींगें बढ़ाती दिख जाती ।मुझे देखते ही लजा कर किताब में झट मुँह झुका लेती या बिना बात सैंडिल या चुन्नी ठीक करने लगती ।गालों पर अबीर सा बिखर जाता।
उसके जाते ही तनु मुझे छेड़ने लगती " भैया तुम शादी कर लेना नताशा से सच इत्ती अच्छी लड़की नहीं मिलेगी तुमको ,वैसे भैया सच बोलना तुम्हारा भी दिल आ गया है न ... वो तुम उसको देखते हो न तो साफ़ दिखता है तुम्हारी आँखों में ,है न ...बोलो है न?” वो खिलखिल कर छेड़ती तो मैं एक चपत लगा मुस्कुरा देता।
सच तो ये था कि मुझे हर पल छुट्टियों का इंतज़ार रहता ।एक जोड़ी शर्मीली आँखें मुझे घर की ओर खींचतीं हरदम ।हरदीप बहुत बढ़िया ग़ज़ल गाता था मैं अक्सर उससे सुनाने को कहता 'प्यार भरे दो शर्मीले नैन...’और खो जाता कहीं, वो मुझे छेड़ता " ओए कौन है शर्मीले नैनों वाली बता- बता...कौन है हमारी भाभी ?”
मैं मुस्कुरा देता पर सच तो ये है कि जब भी तनु और हरदीप मुझे नताशा के लिए भाभी कह कर छेड़ते तो हज़ार दीप मन में जल जाते... साधना,मुमताज़, शर्मिला ,वहीदा,मधुबाला सब उस छुई-मुई में ही मुझे नज़र आतीं ।बगिया के फूल हों या चाँद,बस हर जगह उसी का चेहरा नज़र आता।चाँदनी में संगीत सुनाई देता तो झींगुरों की आवाज़ में पायल की रुनझुन सुनाई देती ।एक नशा सा तारी रहता मुझ पर उन दिनों ।
मैं इतना ख़ुश रहता कि अब मुझे ना तो ग़ुस्सा आता था और ना ही किसी की बात ही बुरी लगती थी और सबसे मज़े की बात तो ये कि अब मेरा पढ़ने में बहुत मन लगता ।एक मक़सद मिल गया हो जैसे जीवन को।यार-दोस्त भी मेरे इस परिवर्तन पर हैरान थे प्राय: छेड़ते "क्या बात है यार कोई प्यार -मोहब्बत का चक्कर है क्या ? मैं हँस कर टाल जाता ।
एक दिन मम्मी बोलीं " शेखर जाकर बेटा ज़रा तनु को नताशा के यहाँ से ले आ “।
" मम्मी मुझे पढ़ना है उसको फोन कर कह दो रिक्शे से आ जाए” ।
”अरे अँधेरा घिर रहा है अकेले आना ठीक नहीं चला जा बेटा।”
मैं ना नुकुर कर ज़रूर रहा था पर मेरे मन में लड्डू फूट रहे थे ।दोनों घरों के संस्कार ऐसे थे जहाँ पर लड़के और लड़की की फ्रैंडशिप को लेकर बहुत सहज नहीं थे सब अत: कभी बात करने की या ख़त लिखने की हिम्मत ही नहीं हुई । मन ही मन ख़ुश था कि आज शायद सामने बैठ कर ठीक से देखने का या शायद बात करने का मौक़ा मिल जाए।
मैंने बैल बजाई तो दोनों बाहर ही निकल आईं ।मैं सड़क पर स्टुपिड की तरह स्कूटर लिए खड़ा ही रह गया मेरे अरमानों पर पानी फिर गया ।नताशा ने बरामदे के खम्भे से मेरी ओट ले ली।
"अच्छा बाय “ कहती तनु स्कूटर पर आकर बैठ गई और मैंने स्कूटर स्टार्ट कर चलते-चलते नताशा पर उड़ती सी दृष्टि डाली वो खम्भे की ओट से एक आँख से मुझे ही देख रही थी ।
" भाई ये तेरी भायली ज़रा सा भी एटीकेट्स नहीं जानती क्या?”स्कूटर खड़ा कर अंदर आते ही मैं भुनभुनाया।
" क्यों भई क्या हो गया...अब क्या कर दिया मासूम ने ?”
" हुँह ! मासूम ...मैं कोई ड्राईवर या नौकर हूँ क्या ? ये भी नहीं कि कोई भला मानुस आया है भाई ,तो चाय-पानी ही पूछ लें ,बस !अब कभी मत कहना लाने को... हाँ नहीं तो “ मैं भुनभुनाया ।मेरे मन की हताशा ग़ुस्से में बदल गई।
"अरे भैया वो बहुत शर्माती है तुमसे ,मैं छेड़ती रहती हूँ न उसको कि मेरी भाभी बन जा तो कतराती है तुम्हारे सामने आने से “ तनु ने हँस कर कहा ।
" अजी हाँ शक्ल देखी है गँवार की “ मैंने मन की पुलक दबाते हुए कहा ।
"हाँ हाँ देखी है न तुम्हारी आँखों में...उसे देखते ही तुम्हारी आँखों में जो सौ-सौ वॉट के बल्ब जलने लगते हैं न उसी में देखी है “ तनु खिलखिला पड़ी और मैं झेंप कर हट गया वहाँ से ।
अचानक एयर हॉस्टेस ड्रिंक्स पूँछने लगी "विच ड्रिंक वुड् यू लाइक टू हैव सर ?”
"ऑरेंज जूस” कह कर मैंने साइड वाली सीट पर कनखियों से देखा वो बिना हिले-डुले किताब में आँखें गढ़ाए बैठी थी पर एक घंटे से पेज नं० एट्टी नाइन पर ही अटकी थी ।मुझे मन ही मन हँसी आ गई मतलब नताशा भी कहीं और ही विचरण कर रही हैं ।शरीर से यहाँ होकर भी मन कहीं और ही है।
बस एक घंटे में फ़्लाइट लैंड कर जाएगी फिर पछताते रहना जीवन भर लल्लू की तरह |मैंने मन ही मन ख़ुद को लानत मलामत भेजी ।
" हाय !माय सेल्फ़ शेखर...शेखर मिश्रा “ मैंने हिम्मत करके कहा ।
" हाय ! नताशा शर्मा “ मैंने देखा उसके होंठ और उँगलियाँ कँपकँपा गईं।
" जी,मैंने पहचान लिया था आपको ...दरअसल तनु ने दिखाई थीं एकाध बार आपकी फ़ोटो “ मैं झूठ बोल रहा था।
"मैंने भी...” नताशा कहते-कहते रुक गई उसने भी तनु की वॉल पर कई बार शेखर को तनु से राखी बँधाते तो कभी शादी की फ़ोटो में हंसते -नाचते देखा था । उसने अपनी उँगलियाँ बीच में फँसा कर गोद में किताब रख ली।
" आप बैंगलोर में रहती हैं ?” मैंने यूँ ही बात आगे बढ़ाते हुए कहा जबकि मैं जानता था कि वो दिल्ली में रहती है ।
"नहीं वहाँ मेरी बेटी की जॉब लगी है उसी को सैटिल करने गई थी मैं दिल्ली में रहती हूँ और आप ?
" मैं बैंगलोर में ...बेटा गुड़गाँव में है उसी के पास जा रहा हूँ , वाइफ़ तो महीने भर से वहीं हैं ।
" क्या करता है बेटा आपका ?”
" कार्डियोलॉजिस्ट है...दरअसल कल मेरी एन्जियोग्राफी होनी है इसी से....”।
" ओह ! सब ख़ैरियत... ?”
" अरे बिल्कुल ,परफ़ेक्ट ...दरअसल बीबी,बेटा कुछ ज़्यादा ही फ़िक्र करते हैं...बच्चे और वो भी डॉक्टर हों तो एक्स्ट्रा प्रिकॉशन्स लेते हैं ...दिल मेरा अभी भी फ़िट है, ख़ूब धड़कता है “कह कर उसकी तरफ़ शरारत भरी आँखों से देख मैं ज़ोर से हँस पड़ा ।
"ओह ! ब्लेस यू “उसने मेरी तरफ़ पहली बार ध्यान से देखा फिर नज़र हटा ली।उसका चेहरा गुलाबी हो गया।अब हम फिर चुप थे।
उसने धीरे से गोद में रखी किताब उठा ली और पढ़ने लगी, मैं भी मैगज़ीन के रास्ते तीस साल पीछे इलाहाबाद की एक सड़क कर निकल लिया, जहाँ चिलचिलाती धूप में कॉलोनी के सामने तनु नताशा को साइकिल सिखा रही थी ।
बाल और होश बिखरे हुए, मुँह खुला ,चेहरे पर पसीने की बूँदें ।साइकिल पर नताशा डरी हुई ,डगर-मगर और उसके पीछे पूरे जोश से भागती ,चिल्लाती ,लाल मुँह ,कैरियर पकड़े तनु " हाँ-हाँ शाबाश आ गई बस बैलेंस कर ...हैंडिल संभाल हैंडिल...”।
इतने में सामने से स्कूटर पर मुझे आता देख नताशा हड़बड़ा कर बैलेंस खो बैठी और बाउंड्री पर साइकिल सहित धड़ाम से ज़ोर से गिर पड़ी । 
"पगलैट कहीं की अच्छा ख़ासा चला रही थी... अरे ये कोई भूत हैं क्या जो देखते ही गश आ गया तुझे ।” तनु चीख़ रही थी और नताशा दर्द और शर्म से हाथों में मुँह छिपाए स्तब्ध बैठी थी ।वहाँ कँटीले तार भी थे जिसमें उसके कपड़े फँस गए थे , कोहनी और घुटने छिल गए थे ।
मैंने जल्दी से जाकर उसको साइकिल से मुक्त किया ।और तनु को डाँटा ।
" अरे उनको चोट लगी है तनु ये कोई टाइम है चिल्लाने का ...बिहेव योर सेल्फ़ ..उठाओ उन्हें ।”
तनु ने तारों से उसके कपड़े निकाले ।कई जगह से कपड़े फट गए थे ।वो चुपचाप रो रही थी ।तनु उसको सहारा देकर अंदर लाई ,कपड़े चेंज करवाए और मरहम पट्टी की ।
मैं भी टैबलेट और पानी लेकर आया ।" ज़्यादा तो नहीं लगी न ,टिटनेस का इंजेक्शन लगवा
लीजिएगा ।ये खा लीजिए दर्द हो रहा होगा...वैसे साइकिल तो चलानी आ ही गई आपको “ मैं शरारत से मुस्कुराया ।
मेरे हाथ से पानी और टैबलेट लेते वो भी झेंप कर मुस्कुरा दी "थैंक्स”।
"हीरोइन है पूरी...”कह तनु भी खिलखिला पड़ी ।
बरसों पुरानी बात याद कर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई ।उस रात बड़ी कविता सी उमड़ -उमड़ कर आ रही थी...मोरपंखी नीले सूट में मुँह छिपाए बैठी नताशा को याद करके नीलकमल...नीलकमल सा कुछ लिख कर जाने कितने पन्ने फाड़ दिए पर कविता को न तो बनना था न बनी ।अपने कवि न होने पर बड़ा अफ़सोस हो रहा था उस रात ...फिर डायरी उठा कर लिखा -
" धूल में पड़ा
नीलकमल 
कुछ धूमिल 
कुछ घायल !”
ये मेरी ज़िंदगी की पहली और आख़िरी कविता थी ।
यादों की जैसे रील खुल गई थी।एक प्रश्न जो तीस सालों से मेरा पीछा करता रहा है ...अब भी बार-बार अंदर ही अंदर टक- टक कर रहा था 'क्यूँ आख़िर क्यूँ....’?
कई बार उसकी आँखों में भी अपने लिए कुछ ख़ास देखा था ...दोनों परिवार भी तैयार थे फिर क्यूँ वो आज नहीं है मेरे संग ....आख़िर क्या बात थी ?
मूर्ख फ़्लाइट लैंड कर जाएगी कुछ ही देर में ....और बस फिर पछताते रहना सारी उम्र ...अन्तस ने डाँट लगाई।
"बाई दि वे हस्बैंड क्या करते हैं आपके ...कैसे हैं?”मैंने पूछा।
"डॉक्टर हैं” उसने धीरे से पलकें उठा कर मेरी तरफ़ देखा और धीमे से मुस्कुराई।
" बहुत अच्छे हैं ...सबसे अच्छी बात है चैरिटी की धुन रहती है बहुत काम करते हैं इसके लिए।”उसके चेहरे पर प्रेम और गर्व की अनुभूति झलक रही थी।
" अच्छे तो होंगे ही आख़िर आपने जो चुना है उनको “ शायद कुछ तल्ख़ी ,जलन या व्यंग्य सा उतर आया होगा मेरे लहजे में उसने मेरे चेहरे को ध्यान से देखा और दृष्टि नीची कर ली ।
कुछ देर में वो उठी और टॉयलेट की तरफ़ चली गई ।मैंने उसकी सीट पर रखी किताब उठाई नाम पढ़ा ‘डॉ. ब्रायन वीज- मैनी लाईव्स मैनी मास्टर्स’।
दोनों परिवारों की तरफ़ से सब मन बना ही चुके थे हमारे रिश्ते के लिए ,कहीं कोई परेशानी नहीं थी ।हमारी पढ़ाई पूरी होने का इंतज़ार था ।मैं बी.ई. के फ़ाइनल ईयर में था उसके बाद जॉब लगते ही सोच रहा था कि मम्मी से कहूँगा कि नताशा की मम्मी से बात करें ।
इसी बीच पापा का ट्रांस्फ़र हो गया और हम लोग कानपुर चले गए।मेरे मन में गहरी उदासियों का मौसम था ।कभी-कभी दूर से ही सही वो छुट्टियों में घर आने पर देखने को तो मिल जाती थी अब वो भी नहीं ।तनु उससे फ़ोन पर लम्बी-लम्बी बातें करती रहती ,भाभी कह कर उसे छेड़ती ।मेरे कान उसी तरफ़ लगे रहते तनु की बातों से ही उसकी बातों का अनुमान लगाता रहता।
मेरा मन सौ -सौ बहाने ढूँढ़ता इलाहाबाद जाने के पर कुछ सूझता ही नहीं था।हिम्मत नहीं होती थी क्योंकि दोनों ही परिवार पुराने विचारों के थे अत: लगता था कहीं बात न बिगड़ जाए तो मन मार कर रह जाता।बस इसी उलझन और तड़प के साथ पढ़ाई पूरी कर जॉब के लिए इंटरव्यू की तैयारियों में जुट गया ।
उस दिन बहुत ख़ुशी-खुशी घर लौटा ।इंटरव्यू बहुत अच्छा हुआ था ।अंदाज हो गया था कि जॉब मुझे ही मिलने वाली है ।सैलरी भी बहुत अच्छी होगी..ख़ुशी के मारे ट्रेन में रात भर नींद ही नहीं आई जागी आँखों से सपने देखता रहा ।
पर शाम को कमरे में जब चाय देने आई तो उदास सी तनु चुपचाप चेयर पर बैठ गई ।
“और व्हाट्स-अप ...क्या चल रहा है ज़िंदगी में “?मैंने उसे ख़ामोश देख पूछा।
"भैया वो...दरअसल एक बात बतानी थी” वो ठिठक गई।
“हाँ-हाँ तो बोल न क्या बात है ?”
“भैया वो नताशा का रिश्ता तय हो गया कहीं “ वो रुआँसी होकर बोली और सहम कर मेरा मुँह ताकने लगी ।
" रिश्ता तय हो गया मतलब ?....अरे ऐसे कैसे ?” मुझ पर जैसे वज्रपात हुआ ।"ऐसे कैसे बात ख़त्म कर दी उन्होंने ?”
"क्यों भैया कब बात पक्की हुई ? कोई सेरेमनी भी हुई नहीं थी ...एक दिन जाने से पहले उसकी मम्मी ने पहल की भी थी पर मम्मी ने कह दिया कि "पढ़ाई पूरी हो जाए, जॉब लगने दीजिए फिर करेंगे।अाँटी ने कहा रिंग सेरेमनी कर देते हैं शादी बाद में हो जाएगी पर मम्मी ने कहा जल्दी क्या है ...हम तनु के लिए भी लड़का देख रहे हैं यदि ठीक मिल जाय तो हम पहले तनु की शादी करेंगे मैंने कहा भी मुझे नहीं करनी अभी , पर बस फिर आँटी चुप रह गईं “।
" और तू मुझे ये बात अब बता रही है ....तब क्यों नहीं कहा ?“ मुझे बहुत ज़ोर से ग़ुस्सा आया।
" मुझे लगा ठीक है मम्मी ने मना तो किया नहीं है ,ठीक ही सोच रही होंगी “ मुझे क्या पता था कि नताशा इस बीच कहीं और के लिए हाँ कह देगी ।“तनु सहम गई।
मैं चुपचाप कुर्सी पर दोनों हाथों से सिर पकड़े बैठा रहा ।मन में ज़ोर की मरोड़ उठ रही थी ।
" तू जा अभी”। कह कर मैं कमरे में अँधेरा कर लेटा रहा रात तक ।मम्मी और तनु खाने के लिए बुलाने आईं मैं " सिर में दर्द है ...भूख नहीं “कह कर मुँह ढ़ांपे पड़ा रहा ।
थोड़ी देर में भाभी आईं " खाना खा लो यहीं ले आई हूँ...बुखार तो नहीं? लाओ बाम लगा दूँ “ उन्होंने माथे पर हाथ लगाया ।
"नहीं भाभी भूख नहीं है रहने दीजिए सोने से ठीक हो जाएगा ,बस आप प्लीज़ एक कप कॉफ़ी बना दीजिए,“।
"खाना टेबिल पर रखा है खा ज़रूर लीजिएगा, नहीं तो और दर्द होगा ...” कॉफी देकर भाभी दरवाजा उढ़का कर चली गईं ।
रह-रह कर मेरे आँसू तकिया भिगोते रहे ।मुझे मम्मी के ऊपर बहुत ग़ुस्सा आ रहा था ।मम्मी ने क्यों नहीं बात मान ली आँटी की ।एक बार मुझसे ही पूछ लिया होता कम से कम ।
मैं इंटरव्यू के बाद कितने ख़्वाब बुनता आया था कि एपॉइन्टमेन्ट लैटर आते ही मम्मी को कहूँगा कि नताशा की मम्मी से बात करें परन्तु यहाँ तो सब उलट- पलट गया था । ख़ुद को दिलासा दिया कि अभी कौन सी शादी हो गई है ...चढ़ी बरातें लौट जाती हैं ।कल ही बात करता हूँ ।
दूसरी सुबह मैं तनु के कमरे में गया " तनु तू बात कर न नताशा से ,ज़रूर उसकी मम्मी ने ज़बर्दस्ती की होगी ।बताना मेरी जॉब बस लग ही गई है ...या मेरी बात करवा दे उससे “।
तनु ने मेरी तरफ कातर आँखों से देख कर ग़ुस्से से जो कहा उसने मुझे तोड़ कर रख दिया ।
"कोई ज़बर्दस्ती नहीं की गई उसके साथ ...तुम क्या सोचते हो भैया मैं चुप रही हूँगी ? जब नताशा ने बताया कि उसका रिश्ता तय हो गया है किसी डॉक्टर से तो मैंने तुरंत आँटी से बात की पर पता है उन्होंने क्या कहा ? वो बोलीं कि -बेटा जब मनीष का रिश्ता आया तो मैंने कहा नताशा से कि मैं शेखर की मम्मी से बात करूँ ? तो उसने कहा कि नहीं आप यहीं हाँ कह दो ! भैया मुझे इतना ग़ुस्सा आया कि मैंने फिर फ़ोन करके नताशा को ख़ूब सुनाईं ,पर वो रोती रही बस यही कहती रही 'मुझे माफ़ कर दो तनु !’बहुत पूछा पर कुछ नहीं बताती बस रोती रहती है ...मैं जानती हूँ भैया मन ही मन तुम्हें बहुत प्यार करती है पर न जाने उसने ऐसा क्यूँ किया ....आप बात करोगे भैया ? मुझे तो कुछ नहीं बताती शायद आपको बता दे !”
" न रहने दे अब कोई फ़ायदा नहीं....शायद देर कर दी मैंने “ कह कमरे से बाहर निकल गया ।
मेरा अहम् बुरी तरह आहत हो गया था।
मैंने देखा नताशा टॉयलेट से वापिस आ रही थी मैंने उसकी किताब उसकी सीट पर रख दी ।उसकी आँखें धुली-धुली सी थीं चेहरा कुछ उतरा सा था । उसकी पर्सनैलिटी में हमेशा से एक रॉयल-टच था उसकी चाल-ढ़ाल ,दृष्टि,भाव-भंगिमा में आभिजात्य झलकता था जो उसे ग्रेस देता था, यही था जो उसे औरों से अलग करता था....मुझे मोहित करता था और यह उम्र के साथ और बढ़ा ही था।
मैं चुपचाप सोचता सा खिड़की से बादलों के खेल देख रहा था और सोच रहा था कि ठीक हमारे सपनों की तरह ही पीछे-पीछे भागते हैं ये भी, पकड़ने को हाथ बढ़ाओ तो मुट्ठी ख़ाली।
"आप पुनर्जन्म में विश्वास करती हैं ? “ मैंने उसके हाथ में पकड़ी पुस्तक की ओर इशारा कर पूछा "दरअसल मैंने पढ़ी है ये बल्कि इसके बाद वाली भी पढ़ी हैं ।”
" जी हाँ विश्वास तो करती थी पर अब इसको जैसे-जैसे पढ़ रही हूँ विश्वास दृढ़ होता जा रहा है ।”
कुछ देर चुप रह कर वह कुछ सोचती रही उसके मन की बेचैनी उसके चेहरे पर साफ़ नजर आ रही थी किताब का पेज उसकी उँगलियों के बीच लगभग फट चुका था।
" मुझे आपसे माफ़ी माँगनी है “ उसने बहुत हिम्मत जुटा मुँह नीचा करके कहा ।
"पर किस बात की “मैंने जान कर भी अनजान बन कर पूछा।
" आप जानते हैं मैं क्या कह रही हूँ “मैंने देखा उसके होंठ काँप रहे थे।
”पर हमारे बीच तो कोई वादा नहीं था तो...आप कुसूरवार नहीं हैं ।”
" मैं जानती हूँ मैंने आपका दिल बहुत दुखाया है”उसकी पलकें भीग गईं ।
सीट बैल्ट बाँधने का एनाउन्समेन्ट हो चुका था ।कुछ ही देर में हम फिर से दुनिया की भीड़ में खो जाने वाले थे।
"हाँ दुखाया तो है... चलिए तो ये भी बता दीजिए आख़िर क्यों ...?” कह कर मैं सीधे उसकी आँखों में देखने लगा।
" ज़िंदगी हमारे हिसाब से कहाँ चलती है शेखर जी ...अगले पल क्या होगा कौन जानता है ? किसी परिवार के एक सदस्य के साथ हुआ हादसा कई बार सभी की ज़िंदगियों को अपनी गिरफ़्त में ले लेता है ।मनीष की मम्मी और मेरी मम्मी बचपन की सहेलियाँ थीं। साथ-साथ पढ़ी थीं ,शादी भी एक ही शहर में हुई तो दोस्ती का रंग प्रगाढ़ होता गया।दोनों के पापाओं की भी ख़ूब जमती थी ।घंटों शतरंज खेलते रहते ,मैं और दीदी उनको 'शतरंजी यार ‘कह कर छेड़ते थे ।
दीदी शादी के बाद से ही नर्क भोग रही थीं और एक दिन आख़िर में तंग आकर उन्होंने अपना जीवन ख़त्म कर लिया ।पापा- मम्मी तो जैसे जीते जी मर गए हों ।पापा को एक ही अफ़सोस खाए जाता था कि मैंने उसे वहाँ भेजा ही क्यों ?”
" मुझे बताया था तनु ने ...सुन कर बेहद अफ़सोस हुआ “मैंने कहा ।
" दीदी के ससुराल वालों ने पापा की बहुत बार बेइज़्ज़ती की ,हर बार कोई न कोई डिमान्ड रख देते थे ।पापा चुपचाप पूरी करते सोचते कि शायद एक दिन सब ठीक हो जाएगा ।ऊपर से वो लोग दीदी को बच्चे न होने का ताना देते ...जीजाजी की दूसरी शादी करने की धमकी देते ।दीदी के स्वाभिमान को ठेस लगती पापा का अपमान उनसे सहा नहीं जाता था... बस एक दिन ख़त्म कर लिया ख़ुद को ।
पापा-मम्मी पर जैसे वज्रपात हुआ, बुरी तरह टूट गए ।भैया लखनऊ में रह कर पढ़ाई कर रहा था सुन कर भागा-भागा आया पर वो और मैं संभाल नहीं पा रहे थे उनको। भैया की पढ़ाई छूटने की नौबत आ गई ।
मनीष की मम्मी और पापा ने सब संभाला ।भैया को हिम्मत-हौसला देकर हॉस्टल भेजा।
एक साल बाद मनीष ने भी पढ़ाई पूरी कर इलाहाबाद में ही हॉस्पीटल जॉइन कर लिया ।वे रोज शाम पापा-मम्मी को देखने आते ।सबके साथ चाय पीते हँसते -हँसाते ,ख़ूब डिस्कशन्स करते धीरे-धीरे हमें हिम्मत मिली,पापा जो गुमसुम हो गए थे कुछ बाहर आए अपने खोल से ।ज़िंदगी की गाड़ी कुछ पटरी पर आने लगी ।
एक दिन मनीष की मम्मी ने मेरा हाथ मनीष के लिए माँगा तो पापा बहुत इमोशनल हो गए ,बहुत दिनों बाद मैंने उनको ख़ुश देखा था ।वो मनीष को बहुत चाहने लगे थे बहुत भरोसा करने लगे थे ।
मैं गुमसुम थी शादी के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी।
फिर एक दिन मनीष की मम्मी मेरे कमरे में आईं ,बोलीं "बेटा मैं जानती हूँ तुम्हारे मन में बहुत दु:ख है इस समय शादी का नहीं सोच पा रही हो पर बेटा पापा मम्मी को देखो...उनको इस सदमे से तुम ही बाहर निकाल सकती हो ।फिर यहीं रहोगी पास ही ,जब चाहो आ सकती हो।“ 
मैं सिर झुकाए रो रही थी मेरे सिर को अपने सीने से लगा लिया बोलीं " न बेटा रोना नहीं ...दु:ख तो हमारा रास्ता ढूँढते अनायास आ ही जाते हैं ,दरवाजा खटखटा देते हैं ...पर हमको ही उठ कर ख़ुशियों की खिड़किएं खोलनी होती हैं न। घर में शादी की ख़ुशियाँ आएँगी ,बच्चों की रौनक़ होगी तो वो भी सँभल जाएँगे ...ज़िंदगी से प्यार करने की वजह दो उनको...और बेटा हम सब तुम्हारे साथ हैं ...तुम जैसी बहू मिल कर हम भी धन्य हो जाएँगे ये मत समझना कि हम कोई तरस खाकर रिश्ता माँग रहे हैं ये सपना तो मैंने बरसों पहले ही देख लिया था ...ख़ूब सोच-समझ कर जवाब देना।”
बस फिर मैंने हाँ कर दी क्योंकि मैं जानती थी कि यहाँ मम्मी-पापा.....” उसका गला रुँध गया ।
फ्लाइट लैंड कर चुकी थी ।उसने हाथ की किताब पर्स में रख दी ।
" मुझ पर विश्वास तो किया होता ...एक मौक़ा तो दिया होता “मैंने धीरे से उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया।
" किस आधार पर करती ...आपसे तो कभी बात ही नहीं हुई थी ... जानती ही कितना थी आपको और आपकी विचार-धारा को ? मेरे लिए पापा- मम्मी को ज़िंदा रखना मुश्किल होता जा रहा था ।मनीष ने जीवन संग दुबारा जोड़ा उनको...बस ईश्वर ने और ज़िंदगी ने जैसा चाहा मान लिया ।”
" पता नहीं ज़िंदगी फिर ये मौक़ा दे न दे एक बात पूछनी थी आपसे ,कई सालों से ख़ुद से पूछते थक गया हूँ “ मैंने इमोशनल होकर कहा ,वो ध्यान से एकटक मेरी शक्ल देख रही थी ।
" क्या आपने कभी भी मुझसे...” उसने मुझे बीच में ही रोक दिया ।
" कुछ सवालों के जवाब नहीं होते शेखर जी...”वो जैसे नींद में बोल रही थी।
" मुझे लगता है प्यार से ज़्यादा अविश्वसनीय और कुछ होता है नहीं ,आज है कल नहीं है ...हमारे साहबज़ादे वेदान्त का तीसरा अफ़ेयर चल रहा है और वो हर बार उतने ही सीरियस होते हैं ।”वो हँसी में मेरे सवाल को ख़ूबसूरती से टाल गई।
बस ! इसके बाद बचता ही क्या था कहने को ?मुझे शायद अपना जवाब मिल गया था।
"शुक्रगुज़ार हूँ ज़िंदगी का आपसे आख़िर मिलवा दिया “कह कर मैंने आगे बढ़ कर केबिन से उसका और अपना बैग निकाला।
" जी ! ये मेरे लिए भी अच्छा हुआ ... चलती हूँ...अपना ध्यान रखिएगा...बाय !” उसने मेरे चेहरे को भर नज़र देखा...वो मेरे बहुत क़रीब खड़ी थी मेरी साँसें थम सी गईं।मैंने एक हाथ बढ़ा कर हौले से उसे पल भर को सीने के पास किया "बाय !”
फिर वो सधे क़दमों से आगे चल दी ।मैं भी थोड़ा डिस्टेंस मेन्टेन करता हुआ चल दिया ।नताशा ने फिर पलट कर नहीं देखा । उदासियों के कुहासे मेरा दम घोंट रहे थे ।सीने को पार कर उसकी ख़ुशबू धड़कनों से घुल- मिल रही थीं...एक सुकून सा था... तो कुछ चटक भी गया था भीतर ही भीतर... 'उसने मेरा भरोसा नहीं किया’।
सोनल जैसी समझदार प्यार करने वाली बीबी और ईशान जैसे कुशाग्र बेटे ने यूँ तो जीवन में ख़ुशियों के सब रंग बिखेर दिए थे पर कुछ था जो तन्हाइयों में अक्सर टीसता था। 
नताशा का मुझे नकार दिया जाना मैं ज़िंदगी में कभी स्वीकार ही नहीं कर पाया था ।एक आग सी सुलगती रही जीवन भर भीतर ही भीतर कि आख़िर क्या कमी थी मुझमें ? ख़ुद को हारा हुआ महसूस करता । ख़ुशियों की फुहारों में एक निर्जन सन्नाटे से भरा कोना था जो कभी भी नहीं भीगा ...यूँ ज़िंदगी से कोई शिकायत भी नहीं रही कोई।
चलते-चलते सहसा ध्यान आया अरे मोबाइल नं॰ तो लिया ही नहीं फिर मन ही मन हँस पड़ा मैं ख़ुद से पूछा "ज़िंदगी से अभी भी कोई सवाल बाक़ी है क्या ? “ 
अनदेखे नताशा के पति मनीष के प्रति ईर्ष्या से भर उठा मन ।मैंने सिर झटका ।नताशा की पीठ से अलविदा कह मैं जैसे नीम बेहोशी में आगे बढ़ गया गुलज़ार साहब की कभी पढ़ी नज़्म मेरे दिल में धड़क रही थी ...
" दिखाई देते हैं इन लकीरों में साए कोई
मगर बुलाने से वक़्त लौट न आए कोई
वो जर्द पत्ते जो पेड़ से टूट कर गिरे थे
कहाँ गए बहते पानी में बुलाए कोई...
मज़ार पर खोल कर गरेबाँ दुआएँ मांगे
वो आये तो लौट कर तो न जाये कोई...”

" कहाँ हो यार ? “एयरपोर्ट से बाहर निकल गाड़ी में बैठते ही मनीष का फ़ोन आ गया।
" गाड़ी में हूँ आ रही हूँ !” मैंने थकी सी आवाज़ में कहा ।
“ अरे यार जल्दी आओ तुम ...सब गड़बड़ हो रही है ...एक तो किचिन का नल टपक रहा है ...रमाबाई आई नहीं कल से ...ओमपाल के दाँत में दर्द है कुछ काम हो नहीं रहा उससे और तुम्हारे साहबजादे के कल से एग्ज़ाम हैं ,एक हंगामा उन्होंने मचाया हुआ है”मनीष बुरी तरह बौखलाए हुए थे।
मुझे हँसी आ गई " ओफ् बताया न रास्ते में हूँ... बन्द करो अपना ये तब्सरा ,कुछ नहीं होता तुमसे कभी कोई भी डॉक्टर से शादी न करे ...आ रही हूँ कोई परी तो नहीं जो उड़ कर आ जाऊँ “ ।
" अरे यार परी ही हो तुम मेरी ...कैसे मैनेज करती हो ये सब जादू की छड़ी से ? नहीं यार आई मीन इट”।मनीष की आवाज़ स्नेहसिक्त हो उठी।
गाड़ी की सीट पर पीछे सिर टिका कर आँखें बन्द कर लीं ।वैसे तो मेरे मन में कहीं सुकून था कि मैं शेखर को बता सकी अपनी मजबूरी...पर सच तो ये था कि बहुत कुछ छुपा ले गई थी कैसे बताया जा सकता था पूरा सच ?
घर पहुँचते ही मनीष क्लीनिक से उठ कर आए बाँहों में कस कर माथे पर प्यार किया ।अलमारियाँ की चाबी देते चेहरा ध्यान से देखते बोले " अरे ठीक तो हो न बीबी चेहरा बहुत उतर रहा है तुम्हारा ....कहीं बी.पी.लो तो नहीं हो गया फिर ?”
" अरे सब ठीक है सफ़र की थकान है आराम करूँगी ,कॉफ़ी पिऊँगी तो ठीक हो जाऊँगी।” 
" अच्छा सुनो रात को आठ बजे की मेरी सिंगापुर की फ़्लाइट है कॉन्फ़्रेंस में जाना है दो दिन के लिए ,तो पैकिंग कर देना प्लीज़ “कह कर मनीष क्लीनिक में चले गए।
बालों को जूड़े में कस किचिन की तरफ़ गई ।वाक़ई पाँच दिन में ही घर की वो हालत हो गई थी जैसे तूफ़ान गुज़रा हो कोई।फ़्रैश होकर कॉफी पीकर मोर्चा संभाला ।
रमाबाई की ख़बर ली,हड़काया कि" कह कर गई थी कि नहीं कि मेरे पीछे नागा मत करना “।ओमपाल के लिए मनीष से कह डेंटिस्ट से अपॉइन्टमेन्ट लिया पेन किलर दी उसे ,फिर वेदान्त की समस्याएँ सुनीं,थोड़ी सी ललुआ-पुतुआ की ।प्लम्बर को फ़ोन किया ,शेफाली को कॉल कर उसकी सुनी कि जॉब का पहला दिन कैसा रहा ,जल्दी से डिनर तैयार करवाया और मनीष के लिए भी डिनर पैक किया वो फ़्लाइट में भी घर का ही खाना प्रिफर करते हैं ,फिर उनका सूटकेस पैक किया।
सब काम करते ,निबटाते बुरी तरह थक गई ।मनीष ने साथ एयरपोर्ट तक चलने को कहा तो थके होने पर भी मना नहीं कर पाई जानती थी मिस कर रहे होंगे तो चली गई ।
लौट कर चेंज कर कॉफ़ी ले बैड पर पीछे कुशन लगा पसर गई ।कोई- कोई दिन कितना अजीब होता है न...जैसे ज़िंदगी को ज़िद आ गई हो कि आज की तारीख के कैनवास पर सारे रंग लगाने 
ही हैं मुझे ।पर्स खोल कर बुक निकाली ही थी कि अचानक सरसराती एक स्लिप गिर गई उठा कर पढ़ा-
"मुसाफिर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी 
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी !!”
ज़रूर ये शेखर ने रखी होगी जब मैं टॉयलेट गई थी ,'हे भगवान कितने फ़िल्मी है अब भी ‘ सोच मैं मुस्कुराई ।
जब भी मैं तनु के घर जाती और यदि शेखर घर होते तो रेडियो पर कोई ग़ज़ल तेज़ आवाज़ में लगा देते।इधर-उधर कर किसी ओट से देखते ।बैडमिंटन खेलती तनु के साथ ,तो खिड़की पर परछाइयाँ मँडराती देखती।
किताब बन्द कर आँखें मूँद लेट गई ।मन फिर यादों की परछाइयों के पीछे भागने लगा ...पता नहीं क्यों कुछ परछाइयाँ उम्र भर पीछा नहीं छोड़तीं ।
उस दिन कॉलेज से ही तनु उसे अपने घर ले गई ,दोनों को साथ मिल कर प्रॉजेक्ट बनाना था ।आँगन पार करते देखा बरामदे में तनु की भाभी रो रही थीं तनु की मम्मी और उनके पिताजी बातें कर रहे थे ।हम दोनों तनु के रूम में आ गए ।
" मैं आती हूँ “तनु चेंज करने अंदर चली गई ।
" अरे पाँचवाँ महिना चल रहा है कुछ ऊँच -नीच हो गई तो क्या करेंगे आप और हम ? हाजीपुर में तो कोई अच्छा डॉक्टर भी तो नहीं होगा निरा क़स्बा है वो ।” तल्ख़ी से तनु की मम्मी बोलीं ,उन लोगों की बातों की आवाज़ें मेरे कानों तक आ रही थीं ।
“ मैं गाड़ी लेकर आया हूँ बहन जी आप परेशान न हों आराम से जाएगी हम पूरा ध्यान रखेंगे ,इसकी माँ का आख़िरी वक़्त है ,इसी में प्राण अटके हैं ,मैं इसको मिलवा कर जल्दी ही छोड़ जाऊँगा ।सबसे छोटी है तो अपनी माँ की ज़्यादा लाड़ली है “ वे रुआँसे से गिड़गिड़ा रहे थे । 
" मम्मी जी मैं ध्यान रखूँगी अपना, प्लीज़ जाने दीजिए”भाभी गिड़गिड़ा रही थीं ।
" अरे कैसे फ़िक्र न करें बताओ...पहलौटी में कुछ गड़बड़ हो गई तो सारी उम्र तरसते रहेंगे बच्चे का मुँह देखने को ,कई बार देखा पहले बच्चे में गड़बड़ हुई तो ख़राबी आ गई फिर हुए ही नहीं ।चलो ज़िद छोड़ो बहू खाना खिलाओ अपने पिताजी को और रवाना करो टाइम से पहुँच जाएँगे “।कई बार कहने पर भी आँटी टस से मस नहीं हुईं ।
हार कर वे बोले " अच्छा दामाद जी से पूछ लीजिए एक बार।” 
" अरे उससे क्या पूछना बच्चा है वो अभी और भाई हमारे यहाँ बच्चे बड़ों के बीच नहीं बोलते “थोड़ी देर बाद मैंने खिड़की से भाभी के पापा को बिना भाभी को लिए ही जाते देखा ।भाभी उनको गाड़ी तक छोड़ कर आँखें पल्लू से पोंछती अंदर आ गईं और कोई भी उनको विदा करने दरवाज़े तक भी नहीं गया ,मुझे ये देख बहुत हैरानी हुई मन करुणा से भीग गया ।
तनु ने बताया कि तीसरे ही दिन भाभी की माँ चल बसीं मैंने पूछा "अरे, भाभी तो मिल लीं न उनसे ?”
" अरे नहीं वो निरा क़स्बा है मम्मी बहुत केयर करती हैं भाभी की...मम्मी ने तो बाद में भी नहीं भेजा रोने -पीटने में कहीं तबियत ख़राब हो जाती “।
फिर ख़ूब चहक कर कहने लगी " पता है हमारे घर में पहला बेबी होगा यू नो आयम वैरी इक्साइटेड....मैं तो चाहती हूँ बेटी ही हो मैं न ख़ूब सजाऊँगी फिर उसे ...।”
वो बोल रही थी और मेरा मन कहीं और भटक रहा था ।शालू दीदी की सास का चंडी रूप ,लाचार से पापा-मम्मी और विवश रोती हुई दीदी का चेहरा मेरी आँखों में घूम रहा था ।
कुछ दिन बाद तनु के पापा का ट्राँस्फर कानपुर हो गया वो लोग कानपुर शिफ़्ट हो गए ।इधर दीदी ने आखिर एक दिन ज़लालत से तंग आकर ख़ुद को और अपने साथ हम सबको भी लपटों के हवाले कर दिया ।पापा- मम्मी तो जैसे जीते जी मर ही गए दोनों बिस्तर से लग गए ।पापा एक्यूट डिप्रेशन में चले गए ।मैं मन ही मन बहुत नाराज़ थी दीदी से ... पढ़ी लिखी थीं तलाक़ ले लेतीं...इतना बड़ा क़दम उठाते ज़रा नहीं सोचा पापा-मम्मी के बारे में ?
जब वो जा रही थीं तब मैंने कई बार रोका "दीदी मत जाओ कोई जॉब कर लेना या और आगे पढ़ लेना “ पर हमेशा की तरह यही कहती गईं कि " एक बार और चांस देकर देखती हूँ शायद...”।काश रुक जातीं वो ।
हम ठीक से केस भी नहीं लड़ पाए भैया अकेला क्या-क्या करता उन लोगों ने पुलिस को पैसा भर कर और अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके एक्सीडेंट सिद्ध कर दिया और हम सब तड़प कर रह गए ।पूरा परिवार सदमे में डूब गया ।
इसी बीच मनीष की मम्मी को जब पता चला तो भागी-भागी आईं ।वो अपने बड़े बेटे के पास लंदन में थीं।मैं आँटी से लिपट कर बहुत रोई ।उन्होंने सब संभाल लिया वो सुबह से रात तक हमारे ही घर रहतीं ।अंकल भी प्राय: शतरंज बग़ल में दबाए आ जाते और पापा को भी ज़बर्दस्ती बैठा लेते खेलने के लिए।अंकल ने समझा बुझा कर हौसला बँधा कर भैया को भी हॉस्टल भेजा ।
साल भर बाद एक दिन आँटी ने बहुत प्यार और सम्मान से मेरा हाथ माँगा ।मम्मी ने अकेले में मुझसे पूछा " बेटा बीना ने मनीष के लिए तुम्हारा रिश्ता माँगा है ,मैंने हाँ नहीं की है।”
" माँ हाँ कर दो “ मैंने खूब सोच -समझ कर एक दिन मम्मी से कहा ।
" देख ले बेटा तू कहे तो मैं शेखर की मम्मी से बात करूँ ? मैं जानती हूँ कि तुम शेखर....”मैंने बीच में ही टोक कर कहा ।
" नहीं ऐसा कुछ नहीं है जैसा आप सोच रही हैं ...आप हाँ कर दो मम्मी ...मैं यहीं रहूँगी इलाहाबाद में आपके और पापा के पास...मैं आपसे दूर नहीं रह सकती !” मैं मम्मी से लिपट कर रोती रही ।
पर दिमाग से लिए फ़ैसलों को यदि दिल इतनी आसानी से मान लेता तो बात ही क्या थी ।दिल पूरी तरह से बग़ावत पर उतर आया था। दूसरे ही दिन मैं तेज़ बुखार में तप रही थी ।मन का ताप तन पर पूरी तरह से तारी था।पन्द्रह दिन तक मनीष रोज़ मुझे दो बार देखने आते । मेरे माथे पर पट्टियाँ रखते,पापा-मम्मी के साथ चाय पीते,स्वास्थ्य पर,राजनीति पर चर्चा करते ,हँसी -मज़ाक़ करते ,चुटकुले सुनाते।
पापा के ब्लड-प्रेशर और मम्मी की बिगड़ी शुगर की बागडोर उन्होंने संभाल ली थी तो मेरी बागडोर साधनी क्या मुश्किल थी फिर ? पापा-मम्मी के चेहरे की रंगत बदलने लगी और घर फिर से चहकने लगा।पन्द्रह दिन तप कर,जल कर मैं भी ठीक हो गई ,उठ गई कमर कस कर ।
अपने फ़ैसले पर कभी भी अफ़सोस नहीं हुआ मुझे ज़िंदगी में ...पर कभी-कभी मन कचोटता था ।तनु कहती "भैया कितने डिप्रेशन में हैं नताशा ,दुखी हैं तू सोच नहीं सकती ...वो अंदर ही अंदर घुटते हैं ,तूने ऐसा क्यों किया थोड़ा सा इंतज़ार किया होता ।” 
मैं क्या कहती बस चुप रह जाती ।पूरी सच्चाई कभी नहीं कह सकी ।कैसे बताती कि तुम्हारी मम्मी का वो रूप ,तुम्हारी भाभी व उनके पिता की विवशता ,गिड़गिड़ाना देख कर मैं जब उनकी जगह ख़ुद को और पापा को रख कर देखती तो मेरी रुह काँप जाती ।बड़ी मुश्किल से पापा मम्मी ने फिर से जीना सीखा था मैं अपने हाथों फिर से उन्हें उसी आग में झोंकने का रिस्क नहीं ले सकती थी..."बस कुछ सच्चाइयाँ यूँ ही दफ़्न हो जाती हैं “ मैं बुदबुदाई।
उस दिन ,उस वक्त मेरा शेखर के घर पर होना ,तनु की भाभी और आँटी के बीच की सब बात सुनना सब कुछ अपनी आँखों से देखना,जैसे बाय चान्स नहीं था ...ये ईश्वर का इशारा था ,जैसे सोच समझ कर रची कोई साज़िश।
शेखर कहाँ हैं ,कैसे हैं कभी नहीं पूछ सकी तनु से और ना ही कभी तनु उनका कोई ज़िक्र करती थी, जबकि हम आज तक भी दोस्त हैं, दुनिया भर की बातें करते हैं।
लॉन की तरफ़ से दरवाज़े पर कुछ आहट सी हुई जैसे किसी ने दस्तक दी हो ।
"कौन” मैंने कहा पर कोई जवाब न पाकर खिड़की से बाहर झाँका कोई नहीं था ।सोचा शायद बिल्ली रही होगी । पूर्णिमा की चाँदनी छिटकी देख शॉल लेकर बाहर लॉन में निकल आई ।
अपनी ही ख़ामोशियों में लिपटी सर्द रात कोहरे की चादर ओढ़े बेसुध पड़ी थी ।कोहरे की बूँदें पत्तों से सरक कर काँपते सूखे पत्तों पर टप-टप गिर, रह-रह कर सन्नाटा तोड़ रही थीं ।
मदालस सा पूर्ण चाँद,पूर्णिमा की मादक चाँदनी,हल्के से कोहरे की धुँध ,मधुकामनी और रात की रानी की भीनी-भीनी सी महक सब मिल कर जैसे कोई जादू सा रच रहे थे।उन सर्द ख़ामोशियों में अपनी ख़ामोशियाँ घोलती मैं न जाने कब तक सुन्न खड़ी रही ,जैसे किसी ने मेरे पैर जकड़ लिए थे ।चाह कर भी अंदर नहीं जा पा रही थी। जाने क्या हो गया था मुझे ...स्तब्ध खड़ी थी ।
कुछ था जो मुझे छूकर हौले से गुज़र रहा था जैसे कोई ख़ुशबू हल्के से मेरे गालों को छूकर निकल गई ...अवश ,सम्मोहित सी मैं वहीं कुर्सी पर बैठ गई । पता नहीं कब तक बेसुध सी बैठी रही ।
अचानक होश आया सारा बदन सर्दी से काँप रहा था ।शॉल से ख़ुद को कस कर लपेटती अंदर आकर रज़ाई में दुबक गई ।
याद आया कल कितने सारे काम हैं lचैस्टर को वैक्सीनेशन के लिए भेजना है। आर.ओ .की सर्विस करानी है , कुछ नई पौध माली से मंगानी हैं ...सोचते-सोचते पता नहीं कब नींद ने आ घेरा।
दूसरा दिन भी बेहद व्यस्त था।सब निबटा कर दोपहर रूम में गई मोबाइल चार्ज होने के लिए लगाया हुआ था, निकाल कर मैसेज चैक किए तनु का मैसेज फ़्लैश किया ..." भैया नहीं रहे कल रात दस बजे ....हार्ट अटैक ।”
" कल रात .....” मैं बेसुध सी बुदबुदाई ..हाथ से मोबाइल छिटक कर गिर गया...स्क्रीन चटक कर सुन्न हो गई !!



इति




























बुधवार, 30 मई 2018

लाल पीली लड़की --(भाग 1 )



  सब्‍जी लगाकर रोटी का कौर मुंह में रख उसने चबाकर निगलने की कोशिश की, पर तालू से ही सटकर रह गया। पानी के घूँट से उसे भीतर धकेल दूसरा कौर बनाते - बनाते उसका मन अरूचि से भर उठा । आलू-मटर की सब्जी खत्म हो गयी थी और मूली की ही बची थी।
उसे सहसा याद अाया--- जिस दिन मम्‍मी घर में मूली की सब्‍जी बनाती थीं वो चिढ कर खाना ही नहीं खाती थी  चाहे मम्‍मी लाख कहतीं कि उन्‍होंने और भी सब्जियां बनायी हैं। विनय को मूली ही पसंद थी। उसके फायदे वह चट उंगलियों पर गिनवा सकते थे। अवश-सी संयोगिता को सिर्फ सुनना ही नहीं पडता था, हर दूसरे दिन मूली या शलजम की सब्जी बनानी पडती थी।
संयोगिता को सहसा खिसियानी-सी हंसी आ गयी अपनी बेबसी पर। तोंद पर बनियान चढाये आराम से हाथ फिराते, दियासलाई की  तीली से अन्तिम दाढ को मुंह फाडकर कुरेदते विनय ने अधमुंदी  आंखों से उसकी ओर एकटक ताकते तीली सामने कर गौर से देखते हुए पूछा, `क्यों क्या याद आ गया, क्यों हंस रही हो ‘?
वह हडबडा गयी। उसे पता था, जब तक विनय जवाब नहीं पा लेंगे, पूछते जायेंगे।
'क्या बात है आखिर ?'   
'बात क्या है?'
'आखिर पता तो चले ?'
'फिर भी' 
इससे पहले कि यह सिलसिला शुरू होता, वह प्लेट उठाकर चल दी, 'कुछ नहीं काफी देर तक रसोई में  खटर-पटर करती रही। जैसे सभी आम औरतें रात में थके लस्त-पस्त शरीर घसीटती, पसीने, प्याज और मसाले से गंधाती करती है।
कमरे के दरवाजे पर खडे होकर एक पल को दहशत फिर उभरी । पर्दे से झांककर देखा, विनय सो चुके थे। आश्वस्त हाेकर वह धीरे-धीरे कमरे में जाकर आराम-कुर्सी पर पसर गयी। क्या पता यदि विनय जाग रहे होते तो फिर हांक लगाते शायद।
'तुमने बताया नहीं, तुम क्यों हंसी थीं ?'
एक पल को संयोगिता को लगा शायद आज वह यह बर्दाश्त नहीं कर पाती, पर तुरन्त ही वह एक व्यंग्य भरे अाश्चर्य से दग्ध हो उठी कि दस-बारह वर्षों बाद भी आज तक खुद से ऐसे किसी साहस या उत्तेजना की आशा रखती हैं ?
सच ! यह अनुभव उसके लिए एकदम आकस्मिक था और किसी हद तक रोमांचक भी..
                                                                                                                                क्रमश:

मंगलवार, 29 मई 2018

लाल पीली लड़की --(भाग २ )


सोच लेने भर से ही सहमकर उसने खाट की तरफ देखा, पर विनय मजे में छाती पर हाथ बांधे टांगें फैलाये सो रहे थे । गले से मोटे पेट तक और पेट से पैर तक फैली चादर का आरोह-अवरोह देखती रही। तनी हुर्इ चादर पंखे की हवा से लगातार कांप रही थी। 
जाने क्यों उसे बडी जोर की इच्छा हुई कि वह शीशा देखे। डरती-डरती सी वह शीशे के सामने जाकर आंखें बंद कर खडी हो गयी । आंखें खोली तो उसे लगा, वह किसी अजनबी जिस्म को देख रही है। किसी दूसरी औरत के शरीर को।
शीशे की तरफ हाथ बढाकर उसने अपने अक्स को छूना चाहा तो उसकी तर्जनी शीशे के पथरीलेपन से टकराकर अटक गयी। उसे एक क्षण के लिए यह अपनी देह का ही सत्य लगा कि हृदय  में कोई स्पन्दन  न था। न जाने क्यों जब उसने वापस हाथ अपने सीने पर रख धुकधुकी महसूस की तो वह एक अचरज से भर उठी। 
उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे ? बार-बार उठ रहे इस अचरज को कहां छुपा दे ? चकले-बेलन के बीच पीस डालेअचार का इमर्तबान खोल उसमें झोंक दे या फिर दूध में जामन की जगह डाल आराम से सो जाये।
         उसने कितना चाहा, वह सो जाये, परन्तु पैरों में न जाने कैसी हठीली पायजेब पड गयी थी। न चाहने पर भी अवश होकर दृष्टि उठाकर उसने शीशे में खड़ी औरत को देखा।छोटे से हेयरपिन की सहायता से ठोंका गया गुठली सा जूडा। गले की अवश दो उभरी हड्डियां और असहाय सा गले की दोनाें हड्डियों के बीच का अबोध गड्ढा । अचानक उसे ख्याल आया, क्या आज भी मधु उसे देखकर कह सकती है- 'तेरा यह नन्हा सा गड्ढा ही बस इतना प्यारा है कि..... ' शरारत से आंख झपकाती मीनू जैसे कल्पना से भी आंख चुरा कर उड गयी। सहसा उसका ध्यान आंखों पर गया तो वह चौंक पडी। अरे, कब ‍वे लम्बी-घनी बरौनियां झड गयीं ? उसके चेहरे पर इतनी झांइयां कब पडी ? वह कब इतनी निचुड गयी ?
  कॉलेज में भी वह कभी मेकअप करके नहीं जाती थी। उसे पता था, उसके रूप में वह कुछ है जो उसे औरों से अलग खड़ा कर हर क्षण नवीनता से भर देता है । मनु उसके कान पर झुक कर किस कदर गुनगुनी आवाज में मदालस भ्रमर-सा गुनगुनाता था तो वह नखशिखान्त लाल पड जाती थी। उसे लगा अब तक की आधी उम्र उसने लाल पड़ कर लाज की गुडिया बनने में काटी और अब बाकी उम्र वह हल्दी घोलती पीली ही पडती रहेगी।
  उस दिन वह पढने के लिए अपनी मेज पर गयी भी, तो लिफाफा उत्सुकता से खोल एक फोटो देख अचकचा गयी थी। फिर सहसा कुछ कौंध गया। पलटकर देखा, फोटो पर 'इलाहबाद' के फोटो स्टूडियो की छाप थी। उसे समझते देर न लगी, कई दिनों  से घर में 'इलाहाबाद वाले लडके' के बारे में उसके कानों में पडता रहा था। 
  मम्मी ने उसकी राय जाननी चाही होगी। क्रोध व झुंझलाहट में उसकी मुट्ठियां भिंच गयीं। क्या दोनों बहनें या मम्मी कोई भी उसके उसके हाथ में  यह फोटो देकर साफ बात नहीं कर सकती थीं  ? 
  धुंधली दृष्टि में भी परख ली गयी कपडों की कीमती सिलाई से  उधार मांगी स्मार्टनेस उसे तिलमिला गयी थी। छोटी आंखें, भरे पुष्ट गाल, मंझोला-कद और मांसल होठों का वह सांवला सा नजर आने वाला व्यक्तित्व निश्चय ही व्यापारी होगा। 
  उसने मुक्के मार-मारकर तकिये को धुन डाला। उसका जी चाहा वह तानपूरे से सिर फोड़ ले। तबलों को टन्न से सडकपर दे मारे। ऑयल-कलर्स के सारे ट्यूब निचोडकर उन्हें खा जाये। आर्ट पेपर्स के टुकडे-टुकडे कर दे। कैनवास जला दे, पर वह ऐसा नहीं कर पायी। 
  दूसरे दिन मम्मी उसे सुना-सुनाकर चड्ढा आंटी से कह रही थीं। 'लाखों रूपया है, पढे-लिखे सभ्य लोग हैं। लडका भी ठीक और फिर लडके की खूबसूरती देखता ही कौन है, गुण देखते हैं।'
  'मतलब संयोगिता को पसन्द है लडका ?' उन्होंने थूक सुडक कर बडी बुजुर्गी से मजा लेकर पूंछा। 
  'अरे हमने पसन्द किया था क्या ? हमारे मां-बाप ने पसन्द किया था। मां-बाप भला ही करते हैं।' दीदी जल्दी-जल्दी धूप में चटाई  पर पसरी चैन से सलाइयां चलाये जा रही थीं। 
  'सो तो है ही ? पर आजकल की लडकियाें को तो आप जानती ही हैं, दिखा लेना ठीक रहता है बहन जी ।' 
हमारी संयोगिता ऐसी नहीं है, बहुत ही सीधी है। बेचारी को यह तक तो पता नहीं ठीक से कि उसकी उम्र कितनी है, वह क्या जांचेगी?' 
  एक तो उसे मम्मी, दीदी पर गुस्सा आ रहा था जिन्हें चड्ढा आंटी ही मिली ‍थीं बताने काे, जो मोहल्ले भर में अभी पूर आएंगी  दूसरे जबरदस्ती लादी गयी 'समझदारी' के बोझ के नीचे लद्दू घोडे-सी वह पिस कर रह गयी।
  चड्ढा आंटी को तो वह जरा भी बर्दाश्त नहीं कर पाती थी कभी। थूक सुडक-सुडक कर हर बात के बीच में फूहड तरीके से मतलब-मतलब कहती बातें करतीं तो लगता 'दो-एकम -दो' का पहाडा रट रही हैं । 
  बहुत बार दीदी ने घुमा-फिरा कर उससे फोटो के बारे में राय जाननी चाही, परन्तु वह मौन ही रही । न समझने का ढोंग कर तटस्थ बनी रही। 
  उसे लगा काश वह अभी, इसी क्षण से कई सालों  को सो जाये और चाराें तरफ घनी कंटीली झाडियां उग आयें , रास्ते पथरीले हो जायें और वह कई सालों  तक न जागे। तब उसकी कल्पना का राजकुमार झाडियां काटता आये और उसे जगा ले। अगले रोज कॉलेज में मीनू के सामने बहुत देर चुप रहने के बाद वह फिर खोयी-खोयी सी बोली थी, 'कभी-कभी' मैं भी सोचती हूं मेरी इतनी उम्र, इतनी शिक्षा सब व्यर्थ है, यदि मैं खुद की अनाथ मांगों को पूरा नहीं कर सकती। मुझे तो हर तरफ घोर अंधेरा ही दिखाई देता  है.....' कैसी विवशता थी वह, भोगते जाना अनाम पीडाओं को और फिर तडपना। 
  उसने किसी से कोई शिकायत  नहीं की, परन्तु बहनों को, पडोसियों और नातेदारनियों, यहां तक कि धोबिन, महरी  तक को यह देखकर कि वह विदा में जरा भी नहीं रोयी, उसने घूंघट नहीं किया, बडा ही सदमा लगा। पर दरवाजे पर आरता करने से पहले ही सास ने जब हाथ बढाकर कठोर चेहरा बना आंचल खींच कर मुख ढांप दिया था, तो वह कुछ भी नहीं कर पायी थी। फिर, कुछ दिन बाद तो उसे यह बडा ही मजेदार लगा था कि लम्बा घूंघट काढ कर सारी दुनिया से अलग एक पर्दे में अपनी आंखों के सारे रंग  छुपा लो। 

   जब वह पहली बार विनय के पत्र का उत्तर लिखने बैठी थी, तो घंटों कोशिश करने पर भी एक शब्द तक नहीं लिख सकी थी। सस्ती, रोमांटिक, उपाधियों से भरी उन पढ-पढकर चुरायी गयी पंक्तियों का क्या उत्तर दे, वह समझ नहीं पायी।

लाल पीली लड़की --(भाग 3 समापन किश्त)




 खिड़की  से उडते मेघों को देख मेघदूत के कई श्लोकों को याद कर वह 'यक्षप्रिया' की भांति विह्वल हो जाने के लिए सिर्फ एक बार ही मचली, फिर कागज की चिन्दी-चिन्दी कर उड़ा दी थीं। कुछ सोचकर फिर मीनू को लिखने बैठी-आज मन छटपटाता है मीनू काश मैं पुरूष होती ! बचपन में कभी-कभी कल्पना करती कि यदि भगवान ने कहीं हमें लडका बनाया होता तो ? फिर हम सोचते नहीं-नहीं  लडकियों के मजे हैं। मजे में घर रहती हैं, खाती हैं, पीती हैं। न कमाना, न धमाना । सजी-धजी बढिया इन्द्रधनुषी साडियां पहनों, सपने देखो, सितारों -से जेवर पहनों और कोमलता-कोमलता में मजे से रही। लडकों को तो न जेवर मिलते हैं, न बढिया शोख रंग । वे ही उबाऊ  सिलेटी ,बादामी रंग। सारे दिन जी-तोड कर कमाओ और धूल फांकते फिरो। न बाबा, लडका होना बडा बुरा है। 
  परन्तु आज लगता है, लडकी होना बहुत बडा अभिशाप है। पीडाएं झेलना, झेल-झेल कर कर्कश-कठोर हो जाना, यही भाग्य में है उसके। लडकी के बड़े सुन्दर पंख होते हैं, पर उड़ने के लिए नहीं, छटपटाने के लिए।
  कभी सोचती हूं , क्या एक दिन मैं भी और औरतों की तरह महिला-मण्डली में बैठकर दूसरों के छिद्रान्वेषण में दिन बिताया करूंगी ? दाेनों समय जानवरों की तरह पेट ठूंसकर क्रोशिया या सिलाइयां चलाती, झुंझलाती जीवन बिता सकूंगी ?जाने कितना अनमोल समय मुझे बेमोल-सा करता छूकर गुजर जाता है।
रंग -ब्रश सब उसने मीनू को दे दिये थे और 'ऊपर वाली आंटी' के पास गयी थी।
'क्यों संयोगिता कैसी हो  भई ? तुम्हारे कैनवास तो मैं मंगवा नहीं पायी, कोई  गया ही नहीं आगरा । अबकी बार मंगवा दूंगी। अभी तो तुम ससुराल नहीं जा रही हो न ?
  'जाने का तो कुछ पता नहीं अभी आंटी, पर आप कैनवास मत मंगवाइएगा अभी।' 
 'कोई नई  पेटिंग बना रही हो आजकल? 
 'नहीं, कोई भी  नहीं बना सकी ।' उसने आंख चुरा लीं ।
 'अच्छा आंटी चलूं, देर हो रही है।' 
 'अच्छा, जाओ तो मिलकर जाना। इतनी कमजोर क्यों होती जा रही हो तुम? 
  उसे बड़ी उलझन हुई  नजरों ही में खोद-खोद कर सब जानें क्या जानना चाहते हैं? 
   टी ०वी ० से देख कर, तो कभी और ढेरों कुकरी-बुक्स तथा मेगजीन से पढकर चौके में ठेठ गृहस्थिन के अन्दाज में कमर में आंचल खोंस रोज ही कुछ न कुछ बनाती हुई उसे  देख मां बहुत ही खुश हुई थीं क्यों कि उनके  अनुसार 'मरद-जात' बढिया भाेजन से ही खुश की जा सकती है। इस दृष्टि से विनय की जाति मां के अनुसार खरी उतरती थी। सोचकवह मुस्कुरा पड़ी थी। 
  परन्तु ससुराल में जाकर वे पनीर के कोफ्ते, बिरयानी, रोगन -जोश, शामी कबाब, स्पेनिश-राइस,चाइनीज़ ,इटैलियन रेसिपीज  सब डायरी तक ही सीमित रह गयी  थीं, पन्द्रह-बीस लोगों का खाना-नाश्ता तैयार करते-करते  ही वह इतनी अधमरी हो जाती कि सूखी सब्जी, दाल, रसेदार सब्जी, कढी, रायता, बडियों से आगे कुछ और की सीमा वह असम्भव मान बैठी थी। चाइनीज  बनाने की एक बार इच्छा हाेने पर जब तामझाम जुड़ाने लगी  तो सबके सवालोँ और उत्सुकता भरे सवालों से ही पस्त  हो गई ऊपर से किसी को खास पसंद भी नहीं आया। छोटी-छाेटी कलात्मक, कागजी, हल्की, मुलायम अपनी बनायी रोटियों पर उसे कितना नाज था। पर इतनी 'भारी-रसोई में  यदि तीन-तीन बार परथन लगाकर वह फूल-सा बेलन नजाकत से घुमाती तो क्या इतने सारे लोगों को एक समय की भी रोटी शाम तक दे पाती।
  एक बार सब्‍जी के लिए भिंडी काटते समय मम्‍मी बोली थीं, 'ऐसे काटी जाती है सब्जी? कोई छोटा टुकडा तो कोई बडा?ऐसी कला से क्‍या फायदा कि दो चार पेन्टिंग बनाकर दीवार पर लीं, और चीजों में भी कलात्‍मक-रूचि होनी चाहिए '! 
  लेकिन कहां रह पायी है अब कलात्‍मक अभिरूचि ? कमरे की सजावट में चाहे वह कितनी ही कलात्‍मकता उडेलती, कभी जेठानी का बिन्‍नी पर्दे को नन्‍ही घण्टियां नोच बिल्‍ली की पूंछ में बांध देता, तो कभी देवरानी की टुन्‍नी फूलदान से फूल निकाल अपनी मैडम को पेश कर आती । 
  खुद विनय ही कौन कम थे ? सारे कमरे में सामान छितरा देते, कभी शेविंग का, तो कभी कपडों का । ताम -झाम  समेटती वह थकान से पस्त, गुजली -मुजली  चादर पर ही निढाल होकर सो जाती ।
  कई बार  उसने जीवन को जीना चाहा पूरी आस्था और पकड़ से । कई बार चाहा, वह अपने हाथों अपने आप, अपने चारों ओर का बिखरापन, अस्त-व्यस्तता कुछ सुव्यस्थित करे, तब बडे जोर-शोर से कपडों की अलमारी या किताबों से शुरुआत करती और अन्त होता जूते-चप्पलों की कतार पर और बस इसके आगे सब ठंडा ।
  अपने से थक कर, पस्त होकर जब वह बाहर देखती है तो कई बार आश्चर्य- चकित हो उठती है। सब ओर, सब कुछ कितना क्षणिक है । कोई  एक दिन मरा, दूसरे दिन, तीसरे दिन तक मातम रहा और फिर सब सामान्य, वे ही संवरे- संभले, व्यस्त लोग ! 
  फिर कैसे उसके जीवन में ही सब बदसूरती, ऊब शाश्वत सत्य  होकर कुण्डली मार बैठ गयी है? शुरू - शुरू में उसे अपना आप और भी बेढंगा, अनचाहा, अनचीह्ना लगता था। अब तो फिर भी काफी अभ्यस्त हो गयी थी। 
  वो  भी प्लेटें अब साफ तौलिये से साफ करने की अपेक्षा कूल्हे पर साड़ी से रगड कर या पल्ले से चम्मच पोंछ लेने में सहूलियत महसूस करने लगी थी ।
  अब उसे पड़ोस की औरतें इतनी फूहड नहीं लगती थीं ।दो-दो दिन तक चोटी न होने पर भी समय से सबको खाना खिला देने पर सन्तोष हो जाता है। उसे पता  होता था जेठानियों की शातिर चालों का, अक्सर सास के कानों में मंत्र फूंके जाते थे यह और बात है कि उसका असर नहीं होता था।
  फिर भी वह ऊपर से शांत, सहज थी। उसे लगता था जरूरत के हिसाब से उसकी शारीरिक व मानसिक क्षमताएं रबड़ की भांति खिंच जाती हैं ।  वह आश्वस्त थी महान कलाकारों, दार्शनिकों कवियों का आदर्श, उनके पद-चिह्नों पर चलने का स्वप्न सब कुछ उसके लिए अतीत की झक हो गये थे। 
  उसकी कोमल, सूक्ष्म अनुभूतियां मर गयी थीं। व्यक्तित्व की पर्तों से कविताओं का जादू उतर गया था, स्वप्नों के पंख नुच गये थे पर मां सन्तुष्ट थीं। सुबह-शाम पूजा घर में महाशान्ति से  माला जपतीं  चन्दन घिसतीं मुक्ति की साधना में लीन थीं। पापा जिम्मेदारियों से मुक्त थे। सास को आदर्श बहु मिली थी और विनय को दो स्वस्थ बच्चों वाली सुघड, सहनशील पत्नी । सब ही तो सुखी थे। 
  लम्बी सांस लेकर वह बच्चों के कमरे में गयी। मनीषा पढते-पढते छाती पर किताब रखे-रखे ही सो गयी थी। लैम्प जल रहा था। उसने किताब उठाकर देखी । सिंड्रेला का पाठ खुला हुआ था। सोती हुई नन्हीं -सुकुमार बिटिया को देख वह करूणा विगलित हो उठी, जिसकी नन्हीं-नन्हीं पलकों पर सिंड्रेला  बनने का सपना महक रहा था। होंठ नाजुक-स्पन्दन से मुस्कुराते थोडे से खुल गये थे। रूआंसे होकर उसने सोचा, वह उसे जगा दे ताकि वह यह सपना भूल कर कोई दूसरा  सपना देखने लगे। कोई वास्तविक  या ठोस सपना । पर फिर उसे लगा वह सपनों के साथ दौड़ नहीं सकती। वे सपने जो पहले आगे दौडते हैं और फिर सहसा बहुत पीछे छूट जाते हैं ।
  हाथ में थामी किताब का पन्ना न जाने कब उसके हाथों-मसल कर अधफटा हो गया था। किताब रखकर उसने बहुत करूणा से बेटी का  माथा चूम लैंप  बुझा दिया और सपनों को उसकी पलकों पर छोड़ कमरे से बाहर निकल आयी।
 उसे लगा आज शायद वह बहुत दिनों बाद सोती राजकुमारी, संयोगिता या सिंड्रेला  का प्यारा सा सपना देखेगी। कुछ भयभीत सी कुछ उत्तेजित सी वह जाकर अपने बैड पर लेट गयी।  बगल से विनय के खर्राटों को सुनती संयोगिता न जाने कब सो गयी।
                                                       समाप्त




                                         यह मेरी  कहानी 1979 में सर्वप्रथम सारिका  में छपी थी |         

                                  फिर '' कथा -वर्ष1980 '' के लिए डॉ .देवेश ठाकुर द्वारा  चुनी गई 

                                         पंजाबी तथा उर्दू भाषा में भी छप चुकी है 

                                        आज फिर से ब्लॉग पर प्रस्तुत कर रही हूँ 

शुक्रवार, 11 मई 2018

बिट्टा बुआ (समापन किश्त)

हमारी प्राचीन मान्यताएं हैं कि जो जैसा करता है वो वैसा भरता है वो इहलोक या परलोक में अवश्य ही उसके फल का भुक्तभोगी होता है...बिट्टा बुआ को गुजरे एक वर्ष भी नहीं बीता था कि जवान बेटे की मृत्यु का दुख बिट्टा बुआ के भाई मंगल सिंह को हिला गया था...कभी बिट्टा बुआ की मृत्यु पर उनकी बहन के रोने पर जो उनकी भाभी बहुत दर्प से कह रही थीं..`जाने लोग कैसे रो लेत हैं हमको तो भाई रुलाई आउत ही नाय है...’नहीं जानती थीं कि नियति तब मुस्कुरा रही थी...और जब जवान बेटे की लाश पर वे अपने बाल नोंच कर पछाड़ें खा कर रो रही थीं तब वही नियति ठठा कर हंस रही होगी...`देखा ऐसे रोना आता है...’ ।
बिट्टा बुआ की मृत्यु के दो वर्ष पश्चात जब हम लोग गांव गए तो देखा मंगल सिंह खूब बाल्टी भर-भर कर बिट्टा बुआ के कुंए के पानी से नहा रहे थे...घर जाने पर ताऊ जी ने बताया कि मंगल सिंह पागल हो गए हैं बस सर्दी -गर्मी जब देखो नहाने लगते हैं कई -कई बाल्टियों से और आठ-दस बार लोटा मांज कर मानो बुआ की तड़पती-अतृप्त आत्मा को तर्पण देते रहते हैं...उनकी पत्नि किवाड़ के पीछे खड़ी उनकी हालत देख विवश सी रोती रहती हैं...सर्वशक्तिमान से भी पहले कई बार अपनी अन्तर्रात्मा ही हमें सजा दे देती है । गांव के सब लोग कहते हैं कि हर रात मंगल सिंह के लोटे की जलधार के नीचे अंजुलि-बद्ध बिट्टा बुआ की तृषित आत्मा वह जल पीती है...परन्तु मेरा मन यह बात कभी भी स्वीकार नहीं करता जो भाई प्राय: उन पर हाथ तक उठा देता था उसके हाथों दिए तर्पण को स्वीकार करने की अपेक्षा वे प्यासा तड़पना ही स्वीकार करेंगी...भले ही मंगल सिंह का लोटा मांजते घिस जाए या कुंए का जल समाप्त हो जाए ।
मेरा अबोध मन इस विश्वास को भी नहीं झुठला पाता कि रात को वे फरिश्ते का हाथ पकड़ जरूर आती होंगी अपनी क्यारियों के लाल गुलाबों को खिलता देखने के लिए...और भोर से पहले असंख्य झिलमिल तारों के बीच अनन्त गहराइयों के पार स्थित स्वर्ग लोक की ओर उड़ जाती होंगी
—समाप्त 

बिट्टा बुआ (भाग 5)

शनै:-शनै: अनियमित आहार एवं उम्र के तकाजों से उनकी कमर बहुत झुक गई थी...झुर्रियां तो मैंने बचपन से लेकर आखिर तक उतनी ही देखीं...मृत्यु सेछै: -सात माह पूर्व तक उनका स्वास्थय बहुत गिर गया था ठीक से उपचार भी नहीं हो रहा था...उनके जीने की आकांक्षा ही किसे थी ?
अपने बड़े कमरे और आधे आंगन में वे भाई और भाभी को पैर भी नहीं रखने देती थीं...अत: पूरे घर पर कब्जे का स्वप्न पूरा होता देख वे दोनों बहुत पुलकित थे ...और इधर जीवन के अस्त होते सूर्य की किरणें उन्हें निस्तेज करती जा रही थीं...बस तीन चीजों का मोह उन्हें अभी भी जकड़े हुए था कभी घिसट -घिसट कर क्यारी से ढ़ेरों लाल गुलाब तोड़ कर तकिए के पास सजा लेतीं और कभी गिरती-पड़तीं चौपाल पर जाकर कुंए को तृप्त आंखों से देखती रहतीं ...तो कभी जूते चप्पल के ढ़ेर को कृपण की संपत्ति की भांति कांपते हाथों से सहलाती रहतीं ।
एक दिन उनकी तबियत बहुत खराब थी अंत निकट था...बोल नहीं पा रही थीं...गांव वालों ने मिल कर उनकी खाट चौपाल पर निकाली...सब नम आंखों से चारों तरफ घेर कर बैठ गए ...ताई जी तुलसी,गंगाजल उनके मुंह में डाल रही थीं..राम-राम का जाप चल रहा था...सभी का मन भारी था भले ही उनकी तीखी जुबान से कोई न बचा हो पर उनका कोई बैरी भी तो नहीं था...एक पल यदि किसी से झगड़ आतीं तो दूसरे ही पल फिर मेल कर लेतीं..गांव की बेटियों ने भले ही उनकी गाली खाई हो पर विवाह मंडप में कौन ऐसी बेटी थी जिसके दूल्हे को और उसको लाल गुलाब का आशीष न मिला हो जब तक उनके शरीर में ताकत थी भला कौन नवजात -शिशु या कौन नवेली बहू होगी जिसे लाल -गुलाब का तोहफा और ढ़ेरों आशीष न मिले हों...उनके पास और था ही क्या बस यही एक सम्पदा थी और था प्यार और आशीषों से भरा हृदय...सारा गांव ही उनका अपना था और वे सबकी...अन्तिम समय पूरा गांव ही उनकी खाट के चारों तरफ सिमट आया था ।
जब उनकी सांसें अटक-अटक कर गिनती पूरी कर रही थीं तभी अचानक उनके भाई ने बिट्टा बुआ के कमरे से जूते चप्पल निकाल कर बाहर गली में फेंकने शुरू कर दिए...गांव वालों ने रोकने की कोशिश भी की पर उसने किसी की भी नहीं सुनी...बिट्टा बुआ सब देख रही थीं उनकी दोनों आंखों की कोरों से आंसू टपक रहे थे...मानो कह रहे हों कुछ देर और रुक जाओ हमारे प्राण पखेरू उड़ने ही वाले हैं ...जिस घोंसले पर इतने दिन हमारा बसेरा रहा उसे और थोड़ी देर मत उजाड़ो ...पर दुष्टों की आत्माएं भी बहरी ही होती हैं...अंतिम समय जान सबने मिल कर बिट्टा बुआ को धरती पर उतारा...पूरी ताकत से उन्होंने बड़े दर्द से आंख खोल बाहर पड़े जूते -चप्पलों के ढ़ेर को देखा और एक हिचकी के साथ सारे बंधन तोड़ कर प्राण- पखेरू उड़ चले जहां न उन्हें कोई माया थी न मोह का बंधन ।
क्रमश:

बिट्टा बुआ (भाग 4)

जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने हमारे घर आना छोड़ कर अभी भी हृदय के किसी जीर्ण कोने में शेष स्वाभिमान की झलक दिखा ही दी थी।
उन दिनों हमारे घर को विपत्ति के काले पंजों ने जकड़ रखा था...यमराज हमारे घर आकर जैसे जाने का रास्ता भूल गए थे...ताई जी की बीच वाली बहू का मुरादों से मांगा इकलौता बेटा,ताऊ जी की बड़ी बेटी का तीन बेटियों के बाद हुआ प्यारा बेटा,खानदान की और दो बेटियों के प्राण और हमारी सबसे दुलारी ,हंसती -खिलखिलाती तरला बुआ की नाजुक गर्दन अपने लौह-पाश में बांध कर न सिर्फ ताई जी के अपितु हम सभी के हृदय पर दो माह की मेहमानी खाकर लात जमा कर झूमते -झामते चल दिए थे ।
दुर्भाग्य से एक शाम ताई जी बेदम सी,आंगन की चारपाई पर बेसुध सी पड़ी थीं ...तभी बिट्टा बुआ शोर करतीं आंगन में आकर ताई जी से खाना मांगने लगीं जब ताई जी नहीं उठीं तो खाली कटोरी लेकर तरला बुआ को ही आवाजें दे -दे कर ढूंढ़ने लगीं...सब भीगी आंखों से इधर-उधर हो गए...जो तरला बुआ , बिट्टा बुआ को खाली पेट और खाली कटोरी लेकर कभी भी नहीं जाने देती थीं आज इतनी दूर छिप गई थीं कि उनके लाख पुकारने पर भी घर के किसी कोने से निकल कर नहीं आ रही थीं ...जो घर तरला बुआ की खिलखिलाहटों और हंसी-मजाक से चहकता रहता था आज भुतहा सा लग रहा था...ताई जी की नकल करता जो मिट्ठू सारे दिन छुटकी-छुटकी की टेर लगाता रहता था उदास पिंजरे के कोने में सिकुड़ा सा चुपचाप इधर -उधर देखता रहता ...बिट्टा बुआ ताई जी का आंचल खींचने लगीं ...छोटी ताई जी आंखें पोंछती उनके लिए खाना ला ही रही थीं कि तभी बड़ी ताई जी विद्युत गति से उठीं और सन्निपात- पीड़ित सी चिल्ला कर ऊंची आवाज में उनको बहुत कुछ कह गईं ...और दरवाजे की ओर उंगली कर `जाओ बाबा जाओ यहां से’ कह कमरे में चली गईं हमेशा ही बड़बड़ा कर शोर मचा कर जाने वाली बिट्टा बुआ अवाक् सिर झुकाए चुपचाप जाने लगीं...छोटी ताई जी ने खाने को कहा...ताऊ जी ने बहुत रोका,मनाया पर वो बिना खाए ही चुपचाप चली गईं...बस वही हमारे आंगन में बिताया उनका आखिरी दिन था ।
आदमी भूले न तो जीना मुश्किल हो जाता है...और वक्त बड़े से बड़ा जख्म भर देता है ..पर बातों के जख्म कभी -कभी उम्र भर नहीं भरते ।दो साल में ही ईश्वरेच्छा से भाभी और बड़ी दीदी की गोद स्वस्थ,सुंदर बेटों से भर गई तो ताऊ जी ने गांव भर को दावत दी पर ताऊ जी ,ताई जी के लाख मनाने पर भी बिट्टा बुआ ने एक टुकड़ा भी मिठाई का मुंह में नहीं डाला और घर में एक बार झांका तक नहीं ...ताई जी का वह महोत्सव बिट्टा बुआ के लाल महकते गुलाब के अभाव में अधूरा ही रह गया...ताई जी मन मसोस कर रह गईं ...ताई जी का कोई भी उत्सव आज तक बिट्टा बुआ को खिलाए -पिलाए बिना पूर्ण नहीं होता था परन्तु इस बार बिट्टा बुआ ने बड़े ही स्वाभिमान-पूर्वक उनका यह उत्सव फीका कर दिया था ताई जी बहुत दुखी और शर्मिंदा थीं ।
बिट्टा बुआ अक्सर पापा और ताऊ जी से दुखी स्वर में ताई जी की शिकायत करती थीं परन्तु परम आश्चर्य यह था कि तिल को ताड़ बना कर गाने वाली बिट्टा बुआ गांव में किसी के भी सामने ताई जी के खिलाफ मुंह नहीं खोलती थीं सम्भवत: यही ताई जी द्वारा किए गए पूर्व उपकारों का प्रत्युत्तर था...वर्ना इस तरह की घटना पर उनका इस तरह चुप रह जाना कितना आश्चर्यजनक प्रतिक्रिया थी ....और वे ताई जी को कितना स्नेह करती थीं ये हम सब जानते थे.

क्रमश:-

बिट्टा बुआ (भाग 3)

उस दिन उनकी उस स्नेहमयी भंगिमा ने मेरा सारा डर भगा दिया उनके कर्कश रूप की पर्तों में छिपे उस स्नेह-पूरित नवीन रूप तले तो मैं अचम्भित रह गई थी..अभिभूत होकर उनकी ऊल -जलूल बातें सुनते फिर कितना वक्त निकल गया पता ही नहीं चला । हम लोग जब लौटने लगे तो फिर रास्ता रोक कर खड़ी हो गईं और अपनी एकमात्र संपत्ति कुंए की महिमा बखानने लगीं कि सब जानते हैं कि उनके कुंए का जल कितना मीठा है..दाल तो मिनटों में घुट जाती है । कभी-कभी वे पापा और ताऊ जी का भी रास्ता रोक कर खड़ी हो जातीं और जब तक अपने कुंए के गुणगान न सुन लेतीं एक कदम भी न हिलने देतीं ...ताऊ जी अक्सर उनको खुश करने के लिए बड़ी गंभीरता से समझाते `बिट्टा तुम अपने कुंए पर अपना नाम लिखवा लो ...’तो वो पुलकित हो जातीं और पुरस्कार में अमृत -स्वरूप कुंए का लोटा भर पानी ताई जी को दे आतीं और बदले में बड़े अधिकार से उसी लोटे में लबालब दूध या छाछ भर कर छलकती बूंदों को जीभ से चाटतीं ले आतीं।
अब तक का उनका वर्तमान देख कर मुझे ऐसा लगता था कि झुकी कमर,झुर्रियों से भरे कठोर चेहरे और बेतहाशा गालियों के पीछे कोई इतिहास नहीं ..कोई अतीत की छाया नहीं...जो कुछ है बस यही भावहीन उनका वर्तमान है परन्तु उस दिन घर वापिस लौट कर बुआ से उनकी कहानी सुन कातर हो उठी ।
बिट्टा बुआ का विवाह कभी बहुत ही अच्छे घर खानदान में हुआ था ,पति भी फौज में थे परन्तु विवाह के साल भर भीतर ही सोलह वर्षीया बिट्टा बुआ विधि-विडम्बना से आहत,स्तब्ध अपार रूप राशि ,सूनी मांग पेंशन की डोर थामे पुन: पीहर की देहरी पर आ खड़ी हुईं तो भाई-भाभी के ताने और अपमान भरे स्वागत से हतप्रभ हो अधर में झूल कर रह गईं ...ससुराल वालों ने तो पहले ही डायन,
कुलक्षिणी,मनहूस जैसी उपाधियां देकर सदा को धक्का दे दिया था और अब पीहर की देहरी भी उनके घायल हृदय पर कस कर लात जमा रही थी..बगल में पोटली दबाए वे चुपचाप सारा मान-अपमान पीती हुई कोने में मुंह छिपा सिसक उठीं।
धीरे-धीरे हिम्मत कर संभाला खुद को गहने बेच कर और पेंशन के पैसों को जोड़ उन्होंने भाई के कच्चे सीलन भरे मकान को पक्का बनवाया साथ ही बड़ी लगन से चौपाल पर बनवाया प्यासे राहगीरों के लिए एक पक्का कुंआ।
धीरे-धीरे भाई -भाभियों के तानों ,गांव वालों की उपेक्षा -तिरस्कार और उससे भी बढ़ कर विधि-विडम्बना से आहत होकर बिट्टा बुआ अपना मानसिक संतुलन खो बैठीं...निर्दयी भाई ने पेंशन हड़पनी शुरु कर दी और वे दाने-दाने को मोहताज हो पेट की ज्वाला से आहत होकर घर-घर के चूल्हे झांकने लगीं...सारा स्वाभिमान तो मानसिक विकार ने धो ही दिया था ।गांव वालों ने भी कुछ स्वेच्छा से और कुछ अनिच्छा से उनके इस हक को अपना लिया था...दो वक्त की रोटी का जुगाड़ वे मान-अपमान को परे कर जुड़ा ही लेतीं...कभी न भी मिलती तो रास्ते में पड़ा कोई फटा जूता चप्पल ही उठा लातीं और पहन कर पुलकित हो अपने कमरे में पड़े जूते चप्पल के ढ़ेर पर उसी संतोष से सो जातीं जैसे कोई नन्हा बालक अपने खिलौने से खेलता हुआ थक कर उसी को सीने से लगाए सो जाता है...होठों पर मीठी मुस्कान लिए...उसी के सपने देखता हुआ ...परन्तु सारे दिन के ताने उलाहने,मान-अपमान को जागने पर ऐसे भूल जातीं जैसे रूठ के सोया बालक उठने पर सब भूल कर पुन: खेल में मस्त हो जाता है ।
मुझे याद है एक बार बुआ और बुआ की चुलबुली सहेलियों की चहकती टोली छत पर खूब चहक रही थीं ...बिट्टा बुआ ने उन्हें देखते ही अपनी चौपाल से उसी `पावन-ग्रन्थ’ का पाठ अभिनय सहित ऊंचे स्वर में करना प्रारम्भ कर दिया ...बुआ का मुंह क्रोध से तमतमा उठा परन्तु इस सबसे बेखबर बिट्टा बुआ तो बस बुआ की काल्पनिक बेचारी सास के कर्मों को ठोंकती लगातार मातमी स्वर में पृथ्वी मैया के रसातल में चले जाने की दुआ माग रही थी क्यों कि भले घर की लरिकिनी होकर भी तरला बुआ छत्ता लगाए सुहानी शाम का आनन्द ले रही थीं और वो भी बिट्टा बुआ के होते ?
...झटकती-पटकती धमधम करतीं तरला बुआ बड़बड़ाती नीचे उतर आईं ...ताई जी ने पूंछा `...`क्या हुआ’ बुआ रुंआसी होकर चिनचिनाईं...`और क्या ? वो खड़ी हैं न चौपाल पर जगत सास..जब तक हैं सारी लड़किएं हमारे गांव की आवारा ही रहेंगी...मेरा नाम लेकर पता है हमारे कुल का नाम रौशन कर रही हैं...’।
उसी दिन शाम को जब बिट्टा बुआ अचार मांगनें आईं तो अनसुना कर तरला बुआ आंगन में बैठी सब्जी काटती रहीं...हवाओं का रुख भांपते ही बिट्टा बुआ ने उनके हाथ से चाकू छीन सब्जी काटते- काटते न जाने किस जादुई छड़ी से मंत्र मार कर बुआ की नाक पर बैठी मक्खी क्षण भर में उड़ा दी थी...आधे घंटे बाद ही वही बिट्टा बुआ हमारी `बुआ महान ‘का यशगान करतीं कागज में छै: सात आम के अचार की फांकें हाथ में दबाए चली जा रही थीं.
क्रमश: -

बिट्टा बुआ (भाग 2)

मिष्ठान्न को ललचाती आंखों से तौलती , संभल कर गिरगिट सा रंग बदलतीं बिट्टा बुआ क्रमश: मिष्ठान्न का चूर्ण फांकतीं..खींसें निपोर बड़े ही दुलार में होंठ आगे निकाल धीमे-धीमे मम्मी को ही समझाने लगीं ...' अबहिं नाय बहू..लरकिनी है ..बड़ी सुलक्छिनी बिटिया है...हम तो बिज बिहारी की लरकिनी को कै रहे हते..तुम्हारी तो साक्षात् लक्षमिनी है...कहां है बिटिया तनिक आसीस दे दें’ ...पर दीदी ‘रिस्क’ लेने वाली कहां थीं ? जब बिट्टा बुआ गद्गद् कंठस्वर के आरोह -अवरोह में आशीषों के फूल बर्सातीं अपनी चौपाल पर जाकर जूते और चुन्नी साबुन से धोने लगीं तब दीदीहाथ झाड़ कर निकलीं...बहुत हंस कर मटक कर बोलीं..’ चलो टली चुड़ैल बुआ....’ मम्मी त्यौरियां माथे तक चढ़ा कर कुछ कहतीं तब तक तो वे बाहर भाग गईं और चटापट ताऊ जी से एकदम भोली-भाली बन मुंह लटका कर ,आंखें झपका कर सफाई देने लगीं...`सच्ची मुच्ची में ताऊ जी बाई गॉड हम तो नाक का पसीना पोंछ रहे थे..चिढ़ा थोड़े ही रहे थे...बिल्कुल भी नहीं...’और दो दिन बाद वो ही लपड़-झपड़ भागती दीदी और पीछे- पीछे रणचण्डी सी बिट्टा बुआ ।मैं बहुत डरती थी उनसे अत: सामने पड़ने से भी कतराती थी कभी हमारे घर आतीं तो मैं बरामदे में खड़ी चारपाई के पीछे से छिप कर झांकती रहती ।
एक दिन तरला बुआ के साथ उनके घर के सामने से सहमी सी गुजर रही थी कि तभी धम्म से चौपाल से हमारे सामने कूद कर जबर्दस्ती हाथ पकड़ कर बड़ी मनुहार और इज्जत से हमें अंदर ले गईं बुआ अरेरेरे कहती रह गईं मेरा तो डर के मारे बुरा हाल था ..टांगें कांप रही थीं और हलक सूख रहा था ।आंगन में पड़ी झंगोले सी चारपाई में बैठा कर अंदर से लाकर दो फटे मैले तकिए हमारे पीछे लगा जल्दी से आंगन की क्यारी की तरफ चली गईं ।मैं तो पहली बार उनके विचित्र राजमहल में आई थी या कहूं लाई गई थी...दीवारों पर कोलाज का सा दृश्य उपस्थित था दीवारों को लीप-पोत कर सीता -राम,राधे-श्याम के आलंकारिक आलेखन के साथ-साथ ऐसी-ऐसी उपमाओं से सुसज्जित गालियां बेशर्मी से हंस रही थीं ..पढ़ते-पढ़ते बुआ को तीखी नजरों से अपनी तरफ घूरता देख कट कर रह गई । ब्लेड के खाली रैपर,बीड़ी-सिगरेट की खाली डिब्बियों की ,कपड़ों व पन्नियों की कटिंग सब दीवार पर झिलमिला रही थीं ...कमरों के कोनों में गांव भर के फटे पुराने जूते चप्पलों का ढ़ेर अलग अपनी शान से मुस्कुरा कहा था ।
उनके घर का निरीक्षण करते एक तो उस हिंडोले में बैठते घुटने पेट में घुसे जा रहे थे दूसरी तरफ डर के मारे होश उड़ रहे थे ...बुआ मेरी हालत समझ कर भी शांत भाव से बैठी थीं...जानती थीं कि पूरी आवभगत करवाए बिना त्राण मिलने वाला नहीं ।
तभी वे दोनों हाथों में दो ताजे लाल गुलाब लिए आईं और हम दोनों को देकर फुसफुसा कर बताने लगीं कि कैसे आधी रात एक फरिश्ता आकर उन फूलों को छड़ी घुमा - घुमा कर खिलाता है...वे चुपचाप देखती हैं पर बोलती नहीं वर्ना फरिश्ता उड़ जाएगा और कभी नहीं आएगा...फिर फूल कभी भी नहीं खिल पाएंगे ।
क्रमश:

बिट्टा बुआ ( कहानी -भाग 1)

बचपन की न जाने कितनी स्मृतियां और न जाने कितने उन स्मृतियों के पात्र होते हैं, जो हमारे अस्तित्व को साधारण समझते हैं उन्हीं का अस्तित्व कभी-कभी हमारे मानस-पटल पर बहुत स्थान पा लेते हैं ...अनजाने ही।बचपन में छुट्टियों में गांव जाने की एकमात्र आकर्षण डोर होती थीं बिट्टा बुआ..जो अभी भी कभी -कभी,स्वप्नों के क्षितिज पर पत्थर फेंकती,गाली देती वैसी की वैसी ही चित्रित हो जाती हैं ।
हमारे गांव में परम्परानुसार बेटियों को बिट्टा कह कर सम्बोधित करते हैं उसी सम्बोधन में दूसरी पीढ़ी ने आगे दूसरा सम्बोधन बुआ जोड़ दिया और वे पूरे गांव की बिट्टा बुआ हो गईं ।किसी के भी घर जाते समय हमें बिट्टा बुआ के चबूतरे के सामने से ही गुजरना पड़ता था ...पेटीकोट जैसा उनका सफेद लट्ठे का लहंगा जो प्राय: सिलेटी हो चला होता उनकी क्षीण कटि में झूलता रहाता छोटे गले का ब्लाउज और आधे माथे को ढ़ंकता दोनों कानों के पीछे से होता हुआ,सिर के पीछे झूलता मटमैला दुपट्टा...और कानों के बड़े- बड़े छेदों में बेले के फूल खुंसे होते...बचपन से लेकर आखिरी समय तक मैंने उनको इसी रूप में देखा...हां पैरों में अवश्य जूते चप्पल तरह -तरह के होते...किसी का पंजा गवाक्ष बना होता तो कोई एड़ी से साथ छोड़ चुका होता...पूरे गांव में भला कौन था ऐसा जिसके जूते चप्पल ने अपने जीवन के आखिरी पल उनके चरणों में न बिताए हों
कोई भी दावत हो शादी ,दष्टौन या बरसी बिट्टा बुआ पहली ही पंगत मेंअनिमन्त्रित ही पत्तल उठा कर बैठ जातीं और परोसने वालों के कुर्ते, धोती खींच-खींच कर परोसना भारी कर देतीं और यदि कोई अभागा झुंझला पड़ता तो वीभत्स गालियों से उसकी सात पुश्तों को कोसतीं..हाथ नचा कर तब तक अपनी चौपाल पर फटी - फटी आवाज में प्रलाप करती रहतीं जब तक स्वयं ही वापिस जाकर उस अपराधी को बड़ी उदारता से क्षमा कर छक कर न सिर्फ खा आतीं अपितु साथ बांध भी लातीं ।
गांव के बच्चों के लिए तो वे एक दिलचस्प मनोरंजन थीं...नाक पर उंगली फिरा कर चिढ़ाने वाले उद्दंड बच्चों के पीछे पत्थर और गालियों के ऐसे अमोघ अस्त्र फेंकतीं कि उनकी माताएं कान पर हाथ रख बच्चों को कूटती-पीटती बिट्टा बुआ को कोसतीं बच्चों को घर ले जातीं ।
बहुत साल पहले जब मैं दस साल की थी और दीदी बारह की रही होंगी...हम होली की छुट्टियों में गांव गए थे अचानक दीदी बदहवास भागती आईं और कमरे में छिप गईं..जब तक मम्मी कुछ पूंछतीं इतने में कर्कश आवाज में गालियों के पिटारे से ऐसी -ऐसी गालियां निकाल..उनके भूत भविष्य को अंधकारमय होने का श्राप देतीं बिट्टा बुआ आंगन में नमूदार हुईं...मैं बहुत डरपोक थी भाग कर बरामदे में खड़ी चारपाई के पीछे छिप गई...वे मां के पास जाकर दीदी की शिकायत कर कोसने लगीं..." साली नाक काटत है दुई दिना की छोकरी...अरी तेरी छटी खाए रहे राम करे.....”और राम जाने क्या - क्या..तब मम्मी और ताई जी जल्दी- जल्दी उनको मनाने में लग गईं ...साबुन,घी,गुड़,पुरानी धोतियां,बची मिठाई का चूरा सब उनके पल्लू से बांध मम्मी ने उनका हाथ पकड़कर जबरन बैठा लिया और पंखा झलने लगीं ..."तुम फिकर न करो जाड़ों में बियाह कर देंगे हम इसका,पाप कटे...बहुत सिर चढ़ती जा रही है..सास डंडे मार- मार कर दिमाग ठीक कर देगी “
क्रमश:

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 11 (अंतिम) रश्मि प्रभा

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 11 (अंतिम)    ताना-बाना उषा किरण  शिवना प्रकाशन  कितना कुछ हम मुट्ठी में भरकर...