ताना बाना

मन की उधेड़बुन से उभरे विचारों को जब शब्द मिले

तो कुछ सिलवटें खुल गईं और कविता में ढल गईं

और जब शब्दों से भी मन भटका

तो रेखाएं उभरीं और

रेखांकन में ढल गईं...

इन्हीं दोनों की जुगलबन्दी से बना है ये

ताना- बाना

यहां मैं और मेरा समय

साथ-साथ बहते हैं

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026





 26 सितम्बर - उस दिन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर , दिल्ली में सिर्फ मेरी पुस्तक "लाल- पीली लड़की” का विमोचन मात्र नहीं था, बल्कि मेरे लिए एक उत्सव था- रंगों और शब्दों से बनाई कृतियों का उत्सव और मैं उस उत्सव को जी रही हूँ अभी तक , जैसे वो सूफी लोग नाचते हैं न गोल- गोल एक सफ़ेद लम्बा चोंगा पहन कर, मैं भी खुद में मगन नाच रही हूँ वृत्ताकार…अपने भाव- जगत में मगन…! बस फर्क ये है कि मेरा चोंगा सफेद नहीं है रंग- बिरंगा है। मेरी एक दुनिया है जिसे मैंने रंगों, शब्दों और सुरीली स्वर- लहरियों से सजाकर , नकारात्मकता व भीड़ से दूर रहकर , जब मौका मिला जीवन को उत्सव की तरह जीने की कोशिश की और अब अध्यात्म की धारा में प्रवाहित होने का प्रयास चालू है।

कभी मैंने अपनी कहानी "पीला- दरवाजा “ कहीं छापने के लिए भेजी तो सम्पादक महोदय ने लौटाते हुए कहा " आपकी कहानी में फिलॉस्फी नहीं है “

…मतलब ? एक गर्भवती युवा स्त्री जिसका पति चुपचाप बिना बताए भागकर साधु बन गया , जिसका सालों पता नहीं कि वह जिन्दा है या मर- खप गया , यदि आपको उस स्त्री की दमनकारी तीखी घुटी चीख की विकट त्रासदी में, पीले दरवाजे के पीछे घुटी जिंदगी में कोई ग्लैमरस फिलॉस्फी नहीं नजर आई तो आप मना कर देते, पर ऐसा तिरस्कृत करता सा निर्णय…?

खैर आपको पूरा हक है यह अधिकार आपके पास है , आप सम्पादक हैं, तो सब चलता है। लेकिन पीला दरवाजा कहानी पर लोकार्पण वाले दिन आ. विदुषी अनामिका जी ने जिस तरह रंगों में डुबकी मार पहले लाल व पीले रंग की खूबसूरत समीक्षा की वह कोई ऐसा व्यक्ति ही कर सकता है जो रंगों के प्रति सम्वेदनशील हो और फिर मेरी कहानी " पीला - दरवाजा “ के पीले रंग को थामा और उसकी फिलॉस्फी पर गहन चर्चा की , मैं उन सम्पादक महाशय को याद कर रही थी , सोच रही थी कि कोई उनको सुनवाए, समझाए कि फिलॉस्फी कहानी में ढूँढने के लिए उससे गहरा सम्वाद करना होता है और यह संवाद वही कर सकता है जिसने जीवन के सब रंगों को आत्मसात किया हो।

अनामिका जी ने पीला दरवाजा कहानी पर बात करते समय "The Yellow Wallpaper” कहानी का जिक्र किया —यह अमेरिकी लेखिका Charlotte Perkins Gilman की प्रसिद्ध कहानी है, जो पहली बार 1892 में प्रकाशित हुई थी। आज मैंने वह कहानी पढ़ी, कहानी मन को छू गई। मैं उसका हिन्दी में अनुवाद देने का प्रयास कर रही हूँ आप भी पढ़ें, निश्चित ही ऐसी कहानियाँ हमें समृद्ध करती हैं-


The Yellow Wallpaper

(कहानी का सार)

कहानी की नायिका एक महिला है जो बच्चे के जन्म के बाद मानसिक और भावनात्मक परेशानी से गुजर रही है। उसका पति John, जो डॉक्टर है, उसे आराम करने की सलाह देता है और उसे एक पुराने घर के ऊपर के कमरे में लगभग अलग-थलग रखता है।


उस कमरे की दीवारों पर पीले रंग का विचित्र वॉलपेपर है। शुरुआत में नायिका को उसका पैटर्न बदसूरत और परेशान करने वाला लगता है। लेकिन धीरे-धीरे वह उस वॉलपेपर को बहुत ध्यान से देखने लगती है।

उसे लगता है कि वॉलपेपर के पीछे एक स्त्री फँसी हुई है, जो बाहर निकलने की कोशिश कर रही है। जैसे-जैसे नायिका स्वयं अकेली, नियंत्रित और कैद महसूस करती है, वह उस स्त्री से अपना संबंध जोड़ने लगती है।

अंत में वह वॉलपेपर फाड़कर उस स्त्री को मुक्त करने की कोशिश करती है—और प्रतीकात्मक रूप से अपने भीतर की कैद से भी मुक्त होने का प्रयास करती है।

कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात

यह केवल मानसिक बीमारी की कहानी नहीं है। पीला वॉलपेपर उस सामाजिक व्यवस्था का प्रतीक है जिसमें स्त्री की स्वतंत्रता, रचनात्मकता और अपनी इच्छा को दबा दिया जाता है।

नायिका स्वयं लेखिका है, लेकिन उसका पति उसे लिखने तक से रोकता है। इसलिए वॉलपेपर धीरे-धीरे उसके लिए एक ऐसी दुनिया बन जाता है जिसमें उसकी दबाई हुई चेतना दिखाई देने लगती है।

“दीवार के पीछे फँसी स्त्री” वास्तव में स्वयं नायिका का ही प्रतिबिंब है।

इस कहानी में स्त्री की आंतरिक स्वतंत्रता, पहचान और सामाजिक बंधनों के स्तर पर एक दिलचस्प साहित्यिक संवाद बन सकता है।


फोटो; 

1- पीला दरवाजा कहानी पर बनाई पेंटिंग 

2-अपनी एक पेंटिंग की फोटो दे रही हूँ , यहां आप लाल रंग को मानसिक रूप से पीले में कन्वर्ट कर लीजिएगा 😊

शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

फलक

 



तुम देना मुझे एक कोरा फलक

मैं  धनक के रंगों में उंगली डुबो कर

बना दूँगी सब्र और सुकूँ से रौशन

एक नई कायनात

एक ऐसा जहाँ, जहाँ वे सब होंगे

जिनका सुकून, छत और जमीन 

छीनी जा चुकी है वहशियाना हवस 

और लालच के हाथों

मैं अपनी तूलिका से बना दूँगी वहाँ 

महकते फूल सितारे दमकता चाँद 

और खूब सारे हंसते खिलखिलाते 

चेहरे मासूम बच्चों के…!!

—उषा किरण 

बुधवार, 4 मार्च 2026

होली


 🩷💚💛💙🧡💜❤️🩵



प्रेम करुणा सद्भाव का ऐसा रंग बनाएं

सब रंगें जिसमें न कोई भेदभाव रह पाए

न कोई भेदभाव रह पाए, भीगें प्रेमरस में

बम गोलियों को झोंके होलिका दहन में


तेरे मेरे की न होवे अंधाधुंध होड़ बावली 

हम सब पहले खेलें रंग फिर मिल खाएं 

गुझिया केक सिवईं और दार नी पोरी 

आओ हम सब मिल इक ऐसा जग बनाएं 

बच्चे हों बेख़ौफ़ नित नए इन्द्रधनुष रचाएँ 


हाथों में हों  हाथ आँखों में विश्वास जगे,

सूखे मन में फिर से आशा का पलाश जगे।

मन के आँगन में मानवता के दीप जलाएँ

मन का आकाश धुले द्वेष की धुँध छँट जाए


प्रेम करुणा सद्भाव का ऐसा रंग बनाएं

सब रंगें जिसमें न कोई भेदभाव रह पाए

न कोई भेदभाव रह पाए, भीगें प्रेमरस में

"सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:”

तन- मन भीगे प्रेम में हम मगन हो गाएँ !!

—उषा किरण 

फोटो; AI की मेहरबानी 😊

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

फ़िल्म तेरे इश्क़ में — मेरे चश्मे से


हाँ तो… यह बनारस की पृष्ठभूमि में शंकर और मुक्ति के प्रेम की कहानी है। फ़िल्म की शुरुआत काफ़ी रोचक तरीके से होती है।

मुक्ति एक मनोविज्ञान की रिसर्च स्कॉलर है, जिसका पी-एच.डी. का वाइवा चल रहा होता है। उसका शोध विषय - "बिगड़े व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक तरीकों से सुधारना” है। क्या किसी बिगड़ैल व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक तरीकों से सुधारा जा सकता है।

उसी समय शंकर वहाँ आकर बेहद गुंडागर्दी करता है और पूरा मामला बिगाड़ देता है। टीचर्स बेहद नाराज हो जाते हैं । मुक्ति इसे एक चुनौती की तरह लेती है और ठान लेती है कि वह हर कीमत पर शंकर को सुधारेगी, ताकि उसकी थीसिस पास हो जाए और उसे डिग्री मिल सके।उसे सुधारने के क्रम में शंकर को उससे जुनून की हद तक प्यार हो जाता है… और इसी तरह कहानी आगे बढ़ती है।

कृति सैनन की खूबसूरती ने मुझे बाँधे रखा, वरना कहानी कोई बहुत खास नहीं है। कथानक पर ध्यान दें तो फ़िल्म में मुक्ति का चरित्र कुछ भटका-सा लगता है।एक कलेक्टर की बेटी, जो अपने और एक गुंडे-मवाली के बीच के अंतर को समझते हुए शंकर के प्यार को अस्वीकार कर आगे बढ़ जाती है, अचानक शंकर की हालत देखकर प्यार में या गिल्ट में इस कदर पागल हो जाती है कि फेरों से उठ जाती है। वह खुद को नशे में इस तरह झोंक देती है कि न तो उसे अपनी परवाह रहती है, न मरते पिता की, न समझदार और प्रेम करने वाले पति की, न ही पेट में पल रहे बच्चे की।

एक अपराधबोध (गिल्ट) क्या सचमुच इतना अटूट प्यार बन सकता है?

क्या प्यार इतना ख़ुदगर्ज़ हो सकता है?

आज ऐसे ही जुनूनी, मर्यादाविहीन , ख़ुदगर्ज़ , विकृत इश्क अख़बारों में दर्ज नहीं हो रहे हैं?

कई जगह फ़िल्म तर्कसंगत नहीं लगती। बाद में डिलीवरी के समय खून से लथपथ मुक्ति का दृश्य इतना लंबा खींचा गया है कि मन घबरा उठता है।

वह सब अलग बात है, पर मेरी सुई जाकर तो अटकती है—बनारस के घाट पर।

शंकर के प्रेम की कीमत चुकाते पिता की मृत्यु हो चुकी है।उनके अंतिम संस्कार के लिए वह बनारस के घाट पर अधमरा-सा बैठा है। तभी एक पंडित उसे रोककर कहता है—

“वाह रे भोले, दुनिया को देता है, खुद को ही नहीं दे पाया—मुक्ति?”

“मुक्ति नाम है उसका। चाहे मर या मार—न मिलेगी।”

“प्रेम में मृत्यु है, मुक्ति नहीं।”

शंकर तड़पकर कहता है—

“बचा लो मुझे… यदि मरकर भी दर्द कम नहीं हुआ तो क्या करूँगा?”

पंडित कहता है—

“दर्द तो तेरा कैसे भी कम नहीं होगा, किसी का कम नहीं होता। उठ और अपने प्यार के ताप को पास से देख। अपने बाप का जलता सिर देख…हाथ-पैर, दिल गुर्दा सब जलते देख। 

मर जाओगे, पंडित, मुक्ति नहीँ मिलेगी, न यहां और न हि वहां…

मुक्ति के पीछे भाग मत। अपने इश्क़ में इतना जल कि मुक्ति तेरे पैरों में गिरकर भीख माँगे कि स्वीकार कर लो मुझे।

और बाकी तू चिंता मत कर—बनारस तेरा पिंडदान कर देगा। हर आशिक़ का करता है!”

हीरोइन का नाम है मुक्ति, हीरो का नाम है शंकर, और स्थान है बनारस का मणिकर्णिका घाट—मेरा दिमाग़ बस यहीं अटक गया है…

पंडित कहता है—

“वाह रे भोले, दुनिया को देता है, खुद को नहीं दे पाया मुक्ति।”

“प्रेम में मृत्यु है, मुक्ति नहीं।”

“मुक्ति के पीछे भाग मत…”

फ़िल्म सामने चल रही थी और मेरे मानस में सती-प्रकरण चल रहा था— 

प्रेम में पति का अपमान सहन न कर पाने पर सती जल गईं।

प्रेम में उद्विग्न—सती के न रहने से बावले होकर उनकी जली देह को कान्धे पर लिए सारे जगत में भटकते शिव। मन में चैन नहीं, असह्य पीड़ा है—उससे मुक्ति नहीं।

प्रेम में शिव को भी मुक्ति नहीं।

ये मोह, प्रेम, ये शिव की नगरी बनारस…

मणिकर्णिका पर निरंतर जलती धूँ-धूँ करती देह…सब नश्वर है।

मानो बनारस -घाट कह रहा है…संसार से प्रेम करने पर यही मिलती है—मृत्यु, मुक्ति नहीं।

जाने कहाँ-कहाँ भटकता हुआ मन अंततः शंकर के अद्वैतवाद पर आकर उद्घोष करता है-

"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या…”

पंडित कहता है—“तुझे मुक्ति नहीं मिलेगी।”

लेकिन मन धीरे से यह भी कहता है—

जिसे मुक्ति की भी परवाह नहीं, क्या वह पहले से मुक्त नहीं?

मुक्ति, शंकर और बनारस का मणिकर्णिका घाट…मेरे विचार से यह फिल्म वही नहीं है जो दिखती है—वह हमसे कुछ और, बहुत कुछ कहना चाहती है।  कई बार कोई कहानी , फिल्म या कोई पेंटिंग कई पर्तें उघाड़ती है…वह हमसे कई तरह से , कई भाषाओं में संवाद करती है, सबसे एक तरह से नहीं…आत्म-मंथन की आवश्यकता है।


खैर… यह तो मेरा चिंतन है। आपकी आप जानें। फिल्म बनाने वाले अपनी जानें, मेरा मन तो छानकर  अपने मन की  बात निकाल लेता है…मेरे विचारों से सहमत होना आपके लिए कतई आवश्यक नहीं…जय भोले🙏🌿


खैर… यह तो मेरा चिंतन है। आपकी आप जानें। फिल्म बनाने वाले अपनी जानें, मेरा मन तो छानकर  अपने मन की  बात निकाल लेता है…मेरे विचारों से सहमत होना आपके लिए कतई आवश्यक नहीं…जय भोले🙏🌿

—उषा किरण 

 26 सितम्बर - उस दिन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर , दिल्ली में सिर्फ मेरी पुस्तक "लाल- पीली लड़की” का विमोचन मात्र नहीं था, बल्कि मेरे लिए एक...