26 सितम्बर - उस दिन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर , दिल्ली में सिर्फ मेरी पुस्तक "लाल- पीली लड़की” का विमोचन मात्र नहीं था, बल्कि मेरे लिए एक उत्सव था- रंगों और शब्दों से बनाई कृतियों का उत्सव और मैं उस उत्सव को जी रही हूँ अभी तक , जैसे वो सूफी लोग नाचते हैं न गोल- गोल एक सफ़ेद लम्बा चोंगा पहन कर, मैं भी खुद में मगन नाच रही हूँ वृत्ताकार…अपने भाव- जगत में मगन…! बस फर्क ये है कि मेरा चोंगा सफेद नहीं है रंग- बिरंगा है। मेरी एक दुनिया है जिसे मैंने रंगों, शब्दों और सुरीली स्वर- लहरियों से सजाकर , नकारात्मकता व भीड़ से दूर रहकर , जब मौका मिला जीवन को उत्सव की तरह जीने की कोशिश की और अब अध्यात्म की धारा में प्रवाहित होने का प्रयास चालू है।
कभी मैंने अपनी कहानी "पीला- दरवाजा “ कहीं छापने के लिए भेजी तो सम्पादक महोदय ने लौटाते हुए कहा " आपकी कहानी में फिलॉस्फी नहीं है “
…मतलब ? एक गर्भवती युवा स्त्री जिसका पति चुपचाप बिना बताए भागकर साधु बन गया , जिसका सालों पता नहीं कि वह जिन्दा है या मर- खप गया , यदि आपको उस स्त्री की दमनकारी तीखी घुटी चीख की विकट त्रासदी में, पीले दरवाजे के पीछे घुटी जिंदगी में कोई ग्लैमरस फिलॉस्फी नहीं नजर आई तो आप मना कर देते, पर ऐसा तिरस्कृत करता सा निर्णय…?
खैर आपको पूरा हक है यह अधिकार आपके पास है , आप सम्पादक हैं, तो सब चलता है। लेकिन पीला दरवाजा कहानी पर लोकार्पण वाले दिन आ. विदुषी अनामिका जी ने जिस तरह रंगों में डुबकी मार पहले लाल व पीले रंग की खूबसूरत समीक्षा की वह कोई ऐसा व्यक्ति ही कर सकता है जो रंगों के प्रति सम्वेदनशील हो और फिर मेरी कहानी " पीला - दरवाजा “ के पीले रंग को थामा और उसकी फिलॉस्फी पर गहन चर्चा की , मैं उन सम्पादक महाशय को याद कर रही थी , सोच रही थी कि कोई उनको सुनवाए, समझाए कि फिलॉस्फी कहानी में ढूँढने के लिए उससे गहरा सम्वाद करना होता है और यह संवाद वही कर सकता है जिसने जीवन के सब रंगों को आत्मसात किया हो।
अनामिका जी ने पीला दरवाजा कहानी पर बात करते समय "The Yellow Wallpaper” कहानी का जिक्र किया —यह अमेरिकी लेखिका Charlotte Perkins Gilman की प्रसिद्ध कहानी है, जो पहली बार 1892 में प्रकाशित हुई थी। आज मैंने वह कहानी पढ़ी, कहानी मन को छू गई। मैं उसका हिन्दी में अनुवाद देने का प्रयास कर रही हूँ आप भी पढ़ें, निश्चित ही ऐसी कहानियाँ हमें समृद्ध करती हैं-
The Yellow Wallpaper
(कहानी का सार)
कहानी की नायिका एक महिला है जो बच्चे के जन्म के बाद मानसिक और भावनात्मक परेशानी से गुजर रही है। उसका पति John, जो डॉक्टर है, उसे आराम करने की सलाह देता है और उसे एक पुराने घर के ऊपर के कमरे में लगभग अलग-थलग रखता है।
उस कमरे की दीवारों पर पीले रंग का विचित्र वॉलपेपर है। शुरुआत में नायिका को उसका पैटर्न बदसूरत और परेशान करने वाला लगता है। लेकिन धीरे-धीरे वह उस वॉलपेपर को बहुत ध्यान से देखने लगती है।
उसे लगता है कि वॉलपेपर के पीछे एक स्त्री फँसी हुई है, जो बाहर निकलने की कोशिश कर रही है। जैसे-जैसे नायिका स्वयं अकेली, नियंत्रित और कैद महसूस करती है, वह उस स्त्री से अपना संबंध जोड़ने लगती है।
अंत में वह वॉलपेपर फाड़कर उस स्त्री को मुक्त करने की कोशिश करती है—और प्रतीकात्मक रूप से अपने भीतर की कैद से भी मुक्त होने का प्रयास करती है।
कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात
यह केवल मानसिक बीमारी की कहानी नहीं है। पीला वॉलपेपर उस सामाजिक व्यवस्था का प्रतीक है जिसमें स्त्री की स्वतंत्रता, रचनात्मकता और अपनी इच्छा को दबा दिया जाता है।
नायिका स्वयं लेखिका है, लेकिन उसका पति उसे लिखने तक से रोकता है। इसलिए वॉलपेपर धीरे-धीरे उसके लिए एक ऐसी दुनिया बन जाता है जिसमें उसकी दबाई हुई चेतना दिखाई देने लगती है।
“दीवार के पीछे फँसी स्त्री” वास्तव में स्वयं नायिका का ही प्रतिबिंब है।
इस कहानी में स्त्री की आंतरिक स्वतंत्रता, पहचान और सामाजिक बंधनों के स्तर पर एक दिलचस्प साहित्यिक संवाद बन सकता है।
फोटो;
1- पीला दरवाजा कहानी पर बनाई पेंटिंग
2-अपनी एक पेंटिंग की फोटो दे रही हूँ , यहां आप लाल रंग को मानसिक रूप से पीले में कन्वर्ट कर लीजिएगा 😊


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