ताना बाना

मन की उधेड़बुन से उभरे विचारों को जब शब्द मिले

तो कुछ सिलवटें खुल गईं और कविता में ढल गईं

और जब शब्दों से भी मन भटका

तो रेखाएं उभरीं और

रेखांकन में ढल गईं...

इन्हीं दोनों की जुगलबन्दी से बना है ये

ताना- बाना

यहां मैं और मेरा समय

साथ-साथ बहते हैं

शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

फलक

 



तुम देना मुझे एक कोरा फलक

मैं  धनक के रंगों में उंगली डुबो कर

बना दूँगी सब्र और सुकूँ से रौशन

एक नई कायनात

एक ऐसा जहाँ, जहाँ वे सब होंगे

जिनका सुकून, छत और जमीन 

छीनी जा चुकी है वहशियाना हवस 

और लालच के हाथों

मैं अपनी तूलिका से बना दूँगी वहाँ 

महकते फूल सितारे दमकता चाँद 

और खूब सारे हंसते खिलखिलाते 

चेहरे मासूम बच्चों के…!!

—उषा किरण 

फलक

  तुम   देना   मुझे   एक   कोरा   फलक मैं    धनक   के   रंगों   में   उंगली   डुबो   कर बना   दूँगी   सब्र   और   सुकूँ   से   रौशन एक   नई ...