TANA BANA
मन की उधेड़बुन से उभरे विचारों को जब शब्द मिले
तो कुछ सिलवटें खुल गईं और कविता में ढल गईं
और जब शब्दों से भी मन भटका
तो रेखाएं उभरीं और
रेखांकन में ढल गईं...
इन्हीं दोनों की जुगलबन्दी से बना है ये
ताना- बाना
यहां मैं और मेरा समय
साथ-साथ बहते हैं
26 सितम्बर - उस दिन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर , दिल्ली में सिर्फ मेरी पुस्तक "लाल- पीली लड़की” का विमोचन मात्र नहीं था, बल्कि मेरे लिए एक...