दरिया नहीं कोई
जो तुझमें समा जाऊँगी
रे सागर,
तिरे सीने पे अपने
कदमों के निशाँ
छोड़ जाऊँगी…!!
— उषा किरण
मन की उधेड़बुन से उभरे विचारों को जब शब्द मिले
तो कुछ सिलवटें खुल गईं और कविता में ढल गईं
और जब शब्दों से भी मन भटका
तो रेखाएं उभरीं और
रेखांकन में ढल गईं...
इन्हीं दोनों की जुगलबन्दी से बना है ये
ताना- बाना
यहां मैं और मेरा समय
साथ-साथ बहते हैं
दरिया नहीं कोई
जो तुझमें समा जाऊँगी
रे सागर,
तिरे सीने पे अपने
कदमों के निशाँ
छोड़ जाऊँगी…!!
— उषा किरण
हाँ तो… यह बनारस की पृष्ठभूमि में शंकर और मुक्ति के प्रेम की कहानी है। फ़िल्म की शुरुआत काफ़ी रोचक तरीके से होती है। मुक्ति एक मनोविज्ञान की...
भावपूर्ण अभिव्यक्ति उषा जी !!!!!
जवाब देंहटाएंआभार रेणु जी
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