ताना बाना

मन की उधेड़बुन से उभरे विचारों को जब शब्द मिले

तो कुछ सिलवटें खुल गईं और कविता में ढल गईं

और जब शब्दों से भी मन भटका

तो रेखाएं उभरीं और

रेखांकन में ढल गईं...

इन्हीं दोनों की जुगलबन्दी से बना है ये

ताना- बाना

यहां मैं और मेरा समय

साथ-साथ बहते हैं

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2025

सरेराह चलते-चलते

 



राहों से गुजरते कुछ दृश्य आँखों व मन को बाँध लेते हैं । जैसे सजी- धजी , रंग- बिरंगी सब्ज़ियों या फलों की दुकान या ठेला, झुंड में जातीं गाय या बकरियाँ, सरसों के खेत हों या फिर सिर पर घास का गट्ठर ले जाती , एक हाथ में हँसिया पकड़े रंग- बिरंगे परिधान पहने ग्रामीण महिलाएं। कोयल की कूक, सरेराह झगड़ते लोग…। 

कभी - कभी कुछ झगड़े देख कर मन करता है गाड़ी रोक उतर जाऊँ और उनको झगड़ने से रोक दूँ या क्यों न मजा ही लूँ कि झगड़े की क्या वजह थी और आखिर हल क्या निकला ? देर तक फिर मेरे कल्पना के घोड़े दौड़ते रहते हैं ।कई बार तो घर आकर भी वही सब दिमाग में घूमता रहता है।

कुछ दिन पहले गुड़गाँव से लौटते समय टोल पर अपनी बारी का इंतजार करती खड़ी एक नई- नवेली चमचमाती गाड़ी को दूसरी गाड़ी ने लापरवाही से पीछे से ठोंक दिया। गाड़ी अच्छी खासी डैमेज हो गई। गाड़ी इतनी नई थी कि उसकी सजावट भी नहीं उतरी थी। मेरा ही जी धक् से रह गया। लगा अब जम कर झगड़ा, गाली-गलौज व मारपीट तो होनी निश्चित ही है। मैं चूँकि दूसरी लाइन में थी तो दम साधे देख रही थी। 

गाड़ी से दो सज्जन पुरुष ( जो वाकई सज्जन ही थे) उतरे और पीछे वाली से हड़बड़ाता एक ड्राइवर नुमा कोई व्यक्ति उतरा। वे आराम से बात करने लगे। गाड़ी कितनी डैमेज हुई ये भी देखते जा रहे थे। उनके मुंह उतरे हुए थे पर बहुत शान्त भाव से बातें करते रहे। उनकी मुखमुद्रा या भाव भंगिमा में जरा भी ग़ुस्सा नज़र नहीं आ रहा था इसी बीच हमारी गाड़ी चल पड़ी और मेरा मन हुआ यहीं उतर जाऊं बल्कि पास जाकर बात सुनूँ बल्कि पूछ ही लूँ कि भाईसाहब आप कौन सी साधना , योग करते हैं? कैसे उतरा ये बुद्धत्व , ये समभाव ? अमूमन तो ऐसे हादसों का अगला दृश्य सात पुश्तों को कोसते व माँ बहन के लिए बकौती करती गाली- गलौज व मार पीट का ही होता है । ये ऐसे हादसे के बाद इतनी शान्ति से कौन बात करता है भाई…कुछ तो लड़ लो …थोड़ा सा तो शोर मचाओ भई। बच्चे का खिलौना तक टूटने पर लड़ने वाले तो एक दूसरे का खून तक कर देते हैं और एक तुम हो कि…..पर कहाँ…हमारी गाड़ी चल पड़ी, जीवन तो चलने का नाम है तो चल कर आ गए घर।कौन किसी के लिए रुकता है जो हम ही रुक जाते। 

इस बात को एक महिना हो चुका है और मेरे मन ने प्रश्नों की बौछार से परेशान कर रखा है-

- वे लड़े क्यों नहीं?

- क्या वे आधुनिक लिबास में साधु थे ?

- क्या वे पूर्व परिचित थे ?

- क्या मालिक कोअपनी गाड़ी खुद पसन्द नहीं थी कि ठुक गई तो ठुकने दो …!

- तगड़ा इन्श्योरेंस होगा ?

-क्या वो दब्बू व डरपोक आदमी थे जो लड़ने में डर रहे थे ? 

- क्या वे सज्जन किसी दुश्मन की गाड़ी उधार पर लाए थे ?……वगैरह…वगैरह…!


    अच्छा, चलें कुछ काम देखें…बकौल मेरे पति के  …खाली दिमाग शैतान का घर”😊

बुधवार, 26 फ़रवरी 2025

आस्था की डुबकी

 


आस्था की डुबकी 🙏

बेशक हम सब धर्मों का दिल से सम्मान करते हैं, लेकिन  हैं पक्के सनातनी; तो कुम्भ ना नहाएं ये हो नहीं सकता था। हालाँकि हमें इस पर जरा भी विश्वास नहीं कि सब कुम्भ नहनियाँ लोगों की स्वर्ग में सीट पक्की हो गई और कुछ उत्साही तो मोक्ष तक का दावा कर रहे हैं । तो भोले सन्तों, भगवान इतने मूर्ख नहीं कि तुम्हारे कर्मों की गठरी को भी तुम्हारी डुबकी के संग संगम में डुबो दें। वो तो पाप- पुण्य भोगने ही पड़ेंगे, भगवान तक प्रारब्ध के नियमों से नहीं बच सके, राम भगवान के पिता नहीं बच सके तो भई तुम तो हो किस खेत की मूली ? रही मुक्ति की बात तो कई जन्मों की साधना से भी जिस मुक्ति के लिए कठिनतम साधना के बाद भी जो साधु सन्तों को भी मिलनी मुश्किल है , उसका दावा शॉर्टकट की दो डुबकी से तो न हि ठोंको तो बढ़िया है। 


सोच रहे होंगे कि उषा किरण तो तुम क्या वहाँ पर लहरें गिनने गई थीं? हाँ वही …. आस्था के पावन सैलाब की लहरों संग बहने गए थे,  समष्टि के सैलाब में व्यष्टि को कुछ पल के लिए डुबोने गए थे, असंख्य भक्तों के बीच एक भक्त की हैसियत से शामिल होने गए थे। 


सुना है सामूहिक भक्ति में बहुत शक्ति होती है तो उस समूह में शामिल होने गए थे। तुमको कहना है भेड़चाल तो कहते रहो, हमें क्या फर्क पड़ता है…हमने देखा वहाँ जाकर अपार सकारात्मक ऊर्जा का सैलाब, जाग्रत चेतना का प्रकाश, भक्ति, तप, समानता का माहौल , जहाँ न कोई अमीर था न गरीब, न जात न पाँत , उत्साह, सनातन की ताकत, तप की प्रबलता। दूर शहरों, गांव देहात से पधारे अनगिनत लोग। न थकन , न कमजोरी, न भूख न प्यास बस एक ही धुन चरैवेति…चरैवेति…हर हर गंगे…हर हर महादेव का जयघोष …🙏


स्टेशन से काफी दूर तक हम भी जन सैलाब का हिस्सा बनकर कुछ देर तक पैदल चले तो  मन में जो थोड़ा सा भय था वह भी भय दूर हो गया। बल्कि मन इतना प्रफुल्लित, इतना भावविभोर था कि बार-बार आँखें भर आ रही थीं। आमजन के साथ कदम मिलाकर चलते हुए भारत बहुत दिल के करीब नजर आया।चेहरों पर एक सा निर्लिप्त सा भाव लिए लक्ष्य की तरफ आराम- आराम से सिर पर पोटलियाँ रखे, कंधों पर छोटे बच्चे बैठाए , मेहमतकश लचीले शरीर से एक लय में चलते भक्त लोग। चलते-चलते थक गए तो सड़कों के  किनारे लगे टैंट में ही पोलीथीन या चादर बिछा कर घर से लाई रोटी खा ली और पोटली का तकिया लगा कर झपक लिए या स्टेशन पर ही किसी कोने में या घाट पर ही किसी कोने में कुछ देर को पीठ सीधी कर ली और फिर चल दिए। जहाँ मौका मिला वहीं से डुबकी लगा ली और खरामा- खरामा वापिस । न होटल बुकिंग की चिन्ता न लन्च- डिनर का टेंशन, न हि किसी वी आई पी घाट के जुगाड़ की चिन्ता। हमारे टैक्सी ड्राइवर ने पुल पर जा रहे सैकड़ों लोगों की तरफ इशारा कर बताया कि यह नैनी पुल है, इस पर भी वाहन न मिलने पर  कई किलोमीटर पैदल ही चलके कुम्भ में पहुंच रहे हैं लोग।

खैर हम भी अपनी आधी-अधूरी व्यवस्था की डोर थाम बढिया स्नान कर आए तो अब सोच रहे हैं कि जिस प्रकार की बाकी सुंदर व्यवस्था सहसा हुई, वो कैसे संभव हो सका ? फिर उसने एक बार अहसास कराया कि ' तू चल तो, मैं हूँ तेरे पीछे…..’ तब अनायास हाथ असीम श्रद्धा से जुड़ जाते हैं।और हाँ, एक जरूरी बात बता दें , पानी एकदम साफ था, कहीं गंदगी नहीं मिली हमें।


पहले भी  हरिद्वार कुम्भ में 'कृति आर्टिस्ट एसोसिएशन’ के साथ मिलकर वर्कशॉप में पेंटिंग बनाकर हम लोगों ने घाट पर ही चित्र प्रदर्शनी लगाई थी, उसका अपना आनन्द था और परिवार के साथ का अपना अलग आनन्द रहा…!!! 

—उषा किरण 

बुधवार, 19 फ़रवरी 2025

दादी



मैंने अपने बाबा दादी को नहीं देखा । बाबा को तो ताता जी( पापा) ने भी नहीं देखा जब वे कुछ महिने के थे तभी उनका स्वर्गवास हो गया था। ताताजी की परवरिश दादी ने ही की। सारी उम्र उनकी अलमारी में सामने ही दादी की फोटो रहती थी। उनका जिक्र होते ही ताता की आँखें नम हो जाती थीं ।

सुना है कि वे बहुत दबंग व बुद्धिमान थीं। घर में और गाँव में भी सब उनसे डरते थे या कहें लिहाज करते थे। गाँव में यदि कोई मसला होता था तो लोग उनको बुला ले जाते थे और वे जो फैसला करती थीं वो सर्वमान्य होता था। हमारे ताता जी भाइयों में सबसे छोटे थे। गाँव में अम्माँ पहली बहू थीं जो पढ़ी लिखी थीं और अफसर की बेटी थीं । हारमोनियम पर गाने गाती थीं और बहुत सुन्दर थीं। सुना है तब बहुत लम्बे बाल और सुर्ख गाल थे उनके और हमारी दादी की सबसे प्यारी बहुरिया थीं वे।

दादी जब बीमार हुईं तो उन्होंने बता दिया था कि वे पूर्णमासी को चली जाएंगी क्योंकि सपने में बाबा बता गए थे बेटों की सेवा का थोड़ा सुख और ले लो फिर पूर्णमासी को हम साथ ले जाएंगे।

पूर्णमासी वाले दिन सुबह से दादी की तबियत में बहुत सुधार था। सब चैन की साँस ले रहे थे। लेकिन दादी ने शोर मचा दिया कि जल्दी खाना बनाओ और सब लोग जल्दी खा लो। खाना बनते ही सबसे पहले जो युवा सेवक घर के काम के लिए नियुक्त था कहा पहले इसे खिलाओ। बोलीं मैं चली गई तो तुम सब तो रोने-धोने में लगे रहोगे ये बेचारा भूखा रह जाएगा। वो मना करता रहा पर अपने  सामने बैठा कर उसे खूब प्रेम से खिलाया -पिलाया फिर सबको कहा तुम सब भी जल्दी खाओ।

सबके खाना खाने के कुछ देर बाद ही साँस उखड़ने लगी और उन्होंने सदा के लिए अपनी आँखें मूँद लीं । ऐसी पुण्यात्मा थीं हमारी दादी। बेशक मैंने उनको नहीं देखा परन्तु ताउम्र मेरे मन में उनके लिए विशेष सम्मान रहा। उनको मेरा शत- शत नमन🙏

********

अभी मीरा ( मेरी पोती) ने दादी कहना सीखा है …ये सम्बोधन मुझे अन्दर तक तृप्त करता है। मुझे दादी नहीं मिलीं पर मैं बनी मीरा की दादी…भगवान का लाख शुक्रिया 🙏😊

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025

प्रेम



कह देना

इतना आसान होता है क्या ?

किसी से कह देने से पहले 

जरूरी होता है खुद से कहना

और जब दिल सुनना ही न चाहे

बार- बार एक ही जिद-

प्रेम कहा नहीं,जिया जाता है

प्रेम कहा नहीं,ओढ़ा जाता है

प्रेम कह देने से मर जाता है 

प्रेम पा लेने से सड़ जाता है

प्रेम है तो उसे बहने दो

गुप्तगोदावरी सा अन्तस्थल में…

और यदि तुमको प्रेम है मुझसे 

तो तुम भी न कहना 

प्रेम यदि है तो मौन रहो

कुछ न कहो 

प्रेम में हो जाना चाहता  है मन 

खुद गुलमोहर 

या कि अमलतास !

बस उसे चुपचाप 

खुद पर बीत जाने दो

बिल्कुल किसी मौसम की तरह...!!

    —उषा किरण 🌼🌿

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2025

चेहरा




अचानक से जब मिलकर कोई

परिचित सा  मुस्कुराता है 

बतियाता है…

तो चौंक जाती हूँ 

उलझन में सोचती हूँ 

कैसे …कैसे पहचाना मुझे 

तब धीरे से याद दिलाती हूँ 

एक चेहरा भी है तुम्हारे पास

मैं हैरानी से शीशे के सामने जाकर

खड़ी हो जाती हूँ 

बादलों की धुंध में डूबे उस चेहरे को

देर तक घूरती हूँ 

और पूछती हूँ खुद से 

क्या वाकई….??

      **

— उषा किरण 🍃

फोटो; गूगल से साभार

रविवार, 26 जनवरी 2025

रजनीगंधा, फिल्म समीक्षा


                               रजनीगंधा

                                       ———

- निर्देशक :  बासु चटर्जी 

- पटकथा:  बासु चटर्जी 

- कहानी: मनु भंडारी;  'यही सच है’ कहानी पर आधारित 

- मुख्य कलाकार:  विद्या सिन्हा, अमोल पालेकर, दिनेश ठाकुर 

- छायांकन:  के. के. महाजन

- संगीत:  सलिल चौधरी

- गीत के बोल:  योगेश       

- पुरस्कार : सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक( पुरुष) के लिए मुकेश को राष्ट्रीय पुरस्कार 

- 1975 में फ़िल्मफ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ क्रिटिक अवार्ड    

बासु चटर्जी द्वारा निर्देशित हिंदी फ़िल्म रजनीगंधा की रिलीज़ को 50 साल पूरे हो गए हैं। बासु चटर्जी को कुछ हटकर फ़िल्में बनाने के लिए  जाना जाता है।उनकी फ़िल्मों का विषय प्राय: भारतीय मध्यम वर्ग ही होता था। सन् 1974 में बनी मसाला फ़िल्मों की तड़क-भड़क से परे, एक सीधी-सादी मिडिल क्लास लड़की की सर्वथा अनछुए विषय को चित्रित करती फ़िल्म`रजनीगंधा’ सुप्रसिद्ध लेखिका मन्नु भंडारी की कहानी`यही सच है’ पर आधारित है।इस मनोवैज्ञानिक प्रेम कहानी पर बनी इस फ़िल्म में बासु चटर्जी ने सर्वथा दो नवीन कलाकारों अमोल पालेकर व विद्या सिन्हा को लेकर यह फ़िल्म बनाई थी। 

70 के दशक में हिंदी सिनेमा का मिडिल क्लास की तरफ़ लौटना सुखद था, क्योंकि इस दौर में  फ़िल्में आम मानव के मानस व ज़िंदगी से ज़्यादा जुड़ीं। जितनी खूबसूरत मनु भंडारी की ' यही सच है’ कहानी थी उतना ही लाजवाब बासु चटर्जी ने इस फ़िल्म का निर्माण किया है।कथानक में कुछ परिवर्तन व्यावहारिक दृष्टि से उन्होंने किए हैं, परन्तु उससे मूल कहानी का सौंदर्य कहीं भी नष्ट नहीं होता है।यह फ़िल्म इतनी सादगी से बनी है कि सीधे दर्शकों के दिल में उतर जाती है।

यह फ़िल्म बन तो गई लेकिन इसे कोई डिस्ट्रीब्यूटर न मिलने के कारण छह महिनों तक डिब्बे में बन्द पड़ी रही। फिर ताराचन्द बड़जात्या ने इसको ख़रीद कर रिलीज़ किया।पहले तो यह कुछ ख़ास नही चली परन्तु बाद में  सिल्वर जुबली हिट रही और फ़िल्मफ़ेयर  सर्वश्रेष्ठ  क्रिटिक्स फिल्म का अवार्ड मिला।

यह फ़िल्म अपने समय से आगे की बात कहती है। फ़िल्म की कहानी दो पुरुषों के प्रेम के मध्य  नायिका दीपा की डाँवाडोल मन:स्थिति को  दर्शाती है। एक पुरुष का दो प्रेमिकाओं या पत्नियों के बीच की उलझन, खटपट या चयन को लेकर कई फ़िल्में बनी हैं परन्तु हमारी संस्कृति में एक स्त्री का दो पुरुषों को एक साथ प्रेम करना जैसे सम्वेदनशील विषय पर फ़िल्म बनाने का साहस बासु चटर्जी जैसे प्रयोगधर्मी व  मंजे हुए  निर्देशक के लिए ही संभव था। नायिका प्रधान इस फ़िल्म में एक स्त्री की इस उलझी हुई मानसिकता को पहली बार  मनोवैज्ञानिक तरीक़े से फ़िल्माया गया है; जहाँ नायिका पूर्व प्रेमी को सहसा पाकर कभी सोचती है कि `सत्रह साल की उम्र में किया प्यार निरा बचपना होता है’, तो कभी सोचती है कि `पहला प्यार ही सच्चा प्यार है’।कई बार हम खुद को ही नहीं पढ़ पाते और हमारा मन व बुद्धि, भावना व व्यावहारिकता के मध्य या वर्तमान व अतीत के बीच डोलता रहता है। फ़िल्म में विद्या सिन्हा ने इस उलझन को उम्दा अभिनय से जीवंत कर दिया है।

दीपा मनोविज्ञान में एम.ए. के बाद रिसर्च कर रही है।संजय ( अमोल पालेकर) से प्यार करती है जो बहुत सीधा- सादा, मस्त स्वभाव का भला सा इंसान है।दोनों भविष्य में शादी की योजना बना रहे हैं, लेकिन संजय अपने प्रमोशन को लेकर ऑफिस की राजनीति से हर समय परेशान रहता है और दीपा को पूर्ण समय व ध्यान न देकर, अपनी धुन में उसकी उपेक्षा कर जाता है; जिसके कारण वह प्राय: उदास हो जाती है। स्त्री जिससे प्रेम करती है, चाहती है कि उसका प्रेमी भी उसको वरीयता दे। अपना पूरा समय, सुरक्षा व प्यार का इज़हार करे।यह वह समय था जब स्त्री मात्र पुरुष की अनुगामिनी न रह कर अपनी अस्मिता व भावनाओं के प्रति भी जागरूक हो गई थी। 

इसी बीच दीपा जॉब के इंटरव्यू के लिए मुंबई जाती है, जहाँ उसका पूर्व प्रेमी नवीन मिलता है, जो उसकी हर तरह से मदद करता है वह दीपा को खूब समय व ध्यान देता है। उसकी प्रत्येक ज़रूरत के लिए सजग रहकर प्रयासरत रहता है। उसमें महानगर वाली स्मार्टनेस है, दीपा उसके स्टाइल व व्यवहार से प्रभावित होकर  पुन: नवीन की तरफ़ खिंचने लगती है। उसका मन प्रतीक्षारत है कि नवीन पुन: उससे अपने प्रेम का इज़हार करे, लेकिन वह ऐसा कुछ नहीं कहता जिससे प्रतीत हो कि वह भी पुन: खोए हुए प्रेम में वापिस लौटना चाहता है।दिल्ली से लौटते समय नवीन से बिछड़ते हुए दीपा के मन का अनुराग व तड़प उसके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई देता है।

दीपा के मन में वर्तमान प्रेमी व पूर्व प्रेमी को लेकर अन्तर्द्वन्द्व चल रहा है। इसी उलझन में वह खुदको तर्क देती है कि 'पहला प्यार ही सच्चा प्यार होता है’ और दिल्ली लौटते हुए फ़ैसला कर लेती है कि वह नवीन को ही चुनेगी। संजय कुछ दिनों के लिए कहीं शहर से बाहर गया है। वह नवीन को पत्र लिखकर अपने प्यार का इज़हार करती है और व्याकुल होकर उसके उत्तर की प्रतीक्षा करती है।लेकिन उत्तर में नवीन के पत्र में मात्र  चार पंक्तियों में जॉब लगने की बधाई पढ़कर वह निराशा में डूब कर सोचती है कि `क्या यह उसका मात्र भ्रम था, नवीन के मन में  क्या उसके लिए कोई कोमल अनुभूति नहीं है?’, उसका स्वाभिमान आहत होता है। वह हाथ में पत्र थामे स्तब्ध सी खड़ी हुई है, इसी बीच संजय खिले हुए रजनीगंधा के  फूलों के साथ  प्रसन्नता व उत्साह से आकर अपने प्रमोशन की सूचना देता  है तो उसकी निश्चल हंसी देख दीपा के मन में उसके लिए पुनः प्रेम का संचार होता है, वह दौड़कर उसको गले से लगा लेती है।

प्रेम के कई रूप हैं। प्रेम की उलझी गुत्थियों पर न जाने कितना साहित्य रचा गया और अनगिनत फ़िल्में भी बनी हैं । मनु भंडारी की इस कहानी में भी प्रेम के अनोखे रूप को दर्शाया गया है।दो में से एक प्रेमी को चुनने का द्वन्द्व जिस तरह दर्शाया गया है वह अद्भुत है।इसी कहानी पर बनी यह फ़िल्म एक सवाल छोड़ जाती है कि क्या यह संभव है कि कोई एक साथ, एक ही समय में दो व्यक्तियों के साथ प्रेम कर सकता है? यह एक ऐसा प्रश्न है जो यदाकदा उठता रहा है।

फ़िल्म के प्रारंभ में ही दीपा सपना देखती है कि वह ट्रेन से जा रही है और सहसा उतर जाती है, स्टेशन पर कोई नज़र नहीं आने पर डरकर पुन: ट्रेन के पीछे भागती है और गिर जाती है। ट्रेन से उसे देखकर लोग हंस रहे हैं।वह  प्राय: यह सपना भी देखती है कि वह चलती टैक्सी से गिर गई है।यह दृश्य बासु चटर्जी ने दीपा के मनोवैज्ञानिक पहलू को ध्यान में रखकर बहुत सोच समझकर समझदारी से जोड़ा है। ये सपने उसके अवचेतन में व्याप्त असुरक्षा की भावना को दर्शाते हैं।

 दीपा अपने करियर को लेकर बहुत सजग है।वह अपने जीवन में सैटिल हो जाना चाहती है। संजय की लापरवाही के कारण उसकी प्रतीक्षा में बेचैन होने पर झुँझलाकर सोचती है कि मुझे अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए।वह नौकरी हेतु इंटरव्यू देने मुंबई भी जाती है। परन्तु अन्त में वह पत्र में नवीन  की तटस्थ प्रतिक्रिया  से आहत होकर निश्चय करता है कि 'मुझे मुंबई नहीं जाना है।’ वह जीवन-यात्रा में नौकरी व नवीन जैसे प्रेमी की अपेक्षा संजय जैसे साथी को चुनती है क्योंकि प्राय: लड़किएं अपने पति व प्रेमी में मानसिक, भावनात्मक, आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा चाहती हैं।

 आज से पचास वर्ष पूर्व सत्तर के दशक में दर्शक या पाठक की मानसिकता को ध्यान में रखकर आदर्श पारंपरिक भारतीय स्त्री की छवि के अनुरूप ही अन्त दिखाया है। लेकिन यदि आज के सन्दर्भ में  देखा जाए तो शायद आज की दीपा नौकरी को वरीयता देती। लेकिन फिर भी फ़िल्मकार के साहस की सराहना करनी होगी कि उन्होंने उस दौर में ऐसे बोल्ड विषय को चुना।

मन्नु भंडारी की कहानी कानपुर व कोलकाता इन दो शहरों में डायरी शैली में लिखी गई है। जबकि फ़िल्म में इन शहरों की जगह दिल्ली व मुंबई कर दिया है, निशीथ का नाम बदल कर भी नवीन कर दिया है।फ़िल्म में दीपा की सखी के व्यक्तित्व में भी मुंबई शहर के हिसाब से परिवर्तन किया गया है।कहानी की इरा की तुलना में फ़िल्म की इरा ज्यादा खुले ख़्यालों की है। वह कामकाजी है, बच्चे के पक्ष में नहीं है जबकि मन्नू भंडारी की इरा एक बच्चे की माँ व घरेलू स्त्री है। बासु चटर्जी ने उसके माध्यम से महानगरीय सोच व संस्कृति का स्त्री के जीवन में पड़ते दबाव को दिखाया है।

 नवीन विज्ञापन फ़िल्में बनाता है।उसके जीवन में मॉडलिंग की दुनियाँ का ग्लैमर व आधुनिक संस्कृति की चमक- दमक की छाप है, जिससे भी दीपा उसकी तरफ़ आकर्षित होती है।लेकिन 

बाद में जब नवीन उसके प्रेम का प्रतिकार न देकर उपेक्षा करता है तो वह संजय को चुनती है।

साहित्यिक कृति पर जब कोई फ़िल्म बनती है तो मूल कृति से सदा उसको तुलना के तराज़ू में तौला जाता है।हालाँकि मूल कहानी से फ़िल्म में कुछ बदलाव किए गए हैं क्योंकि दोनों अलग-अलग विधा हैं। सिनेमा में आम दर्शकों की रुचि व मनोरंजन का भी ध्यान रखना होता है। यह बदलाव उचित ही प्रतीत होता है; उससे कहानी की मूल सम्वेदना पर प्रभाव नहीं पड़ा है।

अमोल पालेकर की यह प्रथम हिन्दी फ़िल्म थी।अपने किरदार की मासूमियत व सादगी को उन्होंने बहुत अच्छी तरह निभाया है। वे अपने प्रमोशन पर फ़ोकस्ड और ईमानदार मगर लापरवाह प्रेमी की भूमिका में खूब जमे हैं। वहीं विद्या सिन्हा की भी यह प्रथम फ़िल्म होने पर भी मध्यमवर्गीय लड़की के उदासी, हर्ष, प्रेम, अन्तर्द्वन्द्व आदि भावों को बहुत सहजता से निभाया है। उनकी सादगी व चेहरे की मोहकता बाँध लेती है।ख़ासकर तब, जब वे उदास होती हैं तो चेहरे पर लावण्य निखर आता है। कहीं- कहीं संवाद अदायगी में उनकी हड़बड़ाहट दिखाई देती है ,जैसे जब वे संजय से फ़ोन पर बात करती हैं। यह कहीं निर्देशन की कमी है, अभिनय में कमी नहीं है।और भी  कहीं- कहीं मामूली सी निर्देशन की कमियाँ नज़र आती हैं, जैसे अमोल पालेकर का डार्क पिंक शर्ट व दिनेश ठाकुर का चटक औरेंज शर्ट को कई दृश्यों में कई बार पहनना, जो कि उनकी पर्सनालिटी से मैच भी नहीं खाती हैं। एक दो दृश्य में विद्या सिन्हा की साड़ी के नीचे से बिना मैच का पेटिकोट का दिखाई देना अखरता है, परन्तु इतनी सारी खूबियों के बीच उनकी अवहेलना की जा सकती है। दिनेश ठाकुर भी लगातार सिगरेट फूंकते, गॉगल्स लगाए, चुस्ती भरे हाव-भाव से अपने रोल के हिसाब से सही अभिनय कर गए हैं।

फ़िल्म में मात्र दो ही गाने हैं। लता मंगेशकर द्वारा गाया-

`रजनीगंधा फूल तुम्हारे महके यूँ ही जीवन में…’ इस गाने के बोल व धुन दोनों ही बहुत सुन्दर हैं। यह गीत दीपा के मन में महकते प्रेम के भावों को बहुत सुन्दर तरीक़े से अभिव्यक्त करता है। मुकेश द्वारा गाया दूसरा गीत-

`कई बार यूँ भी देखा है,ये जो मन की सीमा रेखा है 

मन तोड़ने लगता है,  अनजानी प्यास के पीछे, 

अनजानी आस के पीछे मन दौड़ने लगता है…’

यह पूरा गीत नायिका के मन की डाँवाडोल स्थिति को बाखूबी दर्शाता है। दीपा, नवीन के साथ टैक्सी में जा रही है और पार्श्व में यह गीत बजता है। कभी वह मन में संजय को याद करती है तो कभी अतीत में नवीन के साथ बिताए पलों को याद करती है। दीपा का आँचल नवीन के हाथ को छू रहा है और उसकी खोई- खोई आँखें उसके मन की उलझन को  बयाँ कर रही हैं। 

    `…जानूँ ना, जानूँ ना, उलझन ये जानूँ ना

         सुलझाऊँ कैसे, कुछ समझ न पाऊँ 

         किसको मीत बनाऊँ, किसकी प्रीत भुलाऊँ…’

योगेश के लिखे दोनों ही गीत फ़िल्म की कहानी का एक अनिवार्य अंग प्रतीत होते हैं। म्यूज़िक सलिल चौधरी का है।इस गाने के लिए मुकेश को वर्ष 1974 के  सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ।

पूरी फ़िल्म में कभी खिलते तो कभी मुरझाते, दीपा के मन में पलते प्रेम के प्रतीक रजनीगंधा के फूलों की सुगन्ध छाई  रहती है।कहीं अव्यक्त रूप से कहानी कहती है कि एक साथ दो लोगों को चाहना वैसे ही है जैसे एक साथ दो फूलों की सुगन्ध व सौंदर्य को चाहना। 

मुझे ध्यान है कि इस फ़िल्म के बाद रजनीगंधा के फूलों के प्रति लड़कियों का आकर्षण बहुत बढ़ गया था।सालों बाद भी यह फ़िल्म दर्शकों के मन में रजनीगंधा की सुगन्ध के रूप में छाई रही। 

                                                                                        — —उषा किरण

गुरुवार, 16 जनवरी 2025

यादों के गलियारों से

 


बचपन में ख़ुशमिज़ाज बच्ची तो कभी नहीं थे…घुन्नी कहा जा सकता था…पर मजाल कोई कह कर तो देखता ,फिर तो सारे दिन रोते…फैल मचाते।

याद है …जब नौ - दस बरस के होंगे मुन्नी जिज्जी,हमारी फुफेरी बहन बड़े चाव से हम भाई- बहनों को अपने गाँव ले गईं …खूब आम के बाग थे, हवेलीनुमा बड़ा सा घर आंगन, खूब सारे लोग…और बीच आँगन में ठसकदार उनकी मोटी सी सास खटिया पर बैठी पंखा झलते हुए सबको निर्देश दे रही थीं । 

खूब प्लानिंग हुई कि नदी पर जाकर पहले नहाएंगे, फिर गाँव का फेरा लेंगे, फिर आलू की कचौड़ी के साथ आम खाए जाएंगे। जिज्जी के पाँच बच्चे और उनकी देवरानी के चार…सब हम लोगों के आगे- पीछे खुशी व उत्साह से भागे फिर रहे थे। 

तभी कयामत हो गई…हम किचिन की जगह टॉयलेट में गल्ती से घुस गए। ख़ुशमिज़ाज जिज्जी के तो वैसे ही हर समय दाँत बाहर ही रहते थे, वो बड़ी जोर से ही- ही करके हंस दीं और उनके साथ पला भर बच्चे भी हंस पडे़…हम घक्क…इतनी बेइज्जती ! भाग कर कमरे में जाकर  बैड पर उल्टे लेट कर  रोने लगे और ज़िद पकड़ ली घर जाना है। सारा घर मना कर थक गया …जिज्जी, जीजाजी ने बहुत मनाया चलो बाग घूम कर आते हैं, नदी में नहाते हैं पर मजाल जो तकिए से मुँह बाहर निकाला हो …न खाया कुछ न पिया । जिज्जी की सास लगातार जिज्जी को डाँट रही थीं कि-

"ऐसी कैसी है हंसी तुम्हारी …हर समय खी-खी…बेचारी बच्ची…!” 

दूसरे दिन बहुत भारी मन से जीजाजी हम लोगों को वापिस छोड़ आए। बड़ी बहन ने जितना हो सकता था खूब दाँत किटकिटाए…सालों उनका कोप - भाजन बनना पड़ा, पीठ पर घूँसा भी पड़ा…खुद को भी खुद ने बहुत लताड़ा। 

जिज्जी के गाँव फिर कभी जाना नहीं हुआ । जो कान्ड कर आए थे फिर शर्म के कारण हिम्मत ही नहीं पड़ी दुबारा जाने की । सुना है जिज्जी की सास ने हमको सालों याद किया और हम उनको बहुत भाए…कमाल है ? 

ऐसा नहीं था कि खुद रुकना नहीं चाहते थे , पर जिद रुपी शैतान ने बचपन में हमेशा हमारे मन पर कब्जा किया …जकड़ कर रखा। जैसे - जैसे बड़े  हुए अपने मन के अड़ियल घोड़े की लगाम कसी, उस पर क़ब्ज़ा किया और कई बार मन की न सुन कर जीवन में बहुत कुछ खोया…हार दोनों  तरह से हमारी  ही…!

खैर अब तो बहुत ही सयाने हो गए हैं…कोई शक ????? 😂



यूँ भी….

किसी के पूछे जाने की किसी के चाहे जाने की  किसी के कद्र किए जाने की चाह में औरतें प्राय:  मरी जा रही हैं किचिन में, आँगन में, दालानों में बि...